Hindu Law: विवाह के प्रति घटती गंभीरता और केवल मनमुटाव या अरुचि के आधार पर तलाक की मांग करने वाली याचिकाओं पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाया है।
पति की तलाक की अपील को पूरी तरह से किया खारिज
हाईकोर्ट के जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की खंडपीठ ने मैसूर की फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए एक पति की तलाक की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा, हिंदू कानून (Hindu Law) के तहत विवाह कोई व्यावसायिक अनुबंध या समझौता नहीं है, बल्कि एक पवित्र धार्मिक और सामाजिक संस्कार है। एक बार विवाह हो जाने के बाद यह जीवनभर का बंधन बन जाता है। कोई भी पति या पत्नी केवल यह तर्क देकर विवाह से बाहर नहीं निकल सकते (Walk Away) या तलाक की मांग नहीं कर सकते कि वे अपनी जीवनसंगिनी/साथी में ‘दिलचस्पी खो चुके हैं’ (Lost Interest)।
मामला क्या है?: प्रेम विवाह के 20 साल बाद ‘दिलचस्पी खत्म’ होने की दलील
यह विधिक विवाद एक ऐसे दंपति से जुड़ा है जिनकी शादी को लगभग 22 साल हो चुके थे।
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) ने 15 दिसंबर 2003 को प्रेम विवाह (Love Marriage) और अंतरजातीय विवाह (Inter-caste Marriage) किया था। दोनों की एक बेटी भी है जो अब लगभग बालिग हो चुकी है।
2019 की कानूनी लड़ाई: विवाह के लगभग 16 साल बाद, 2019 में पहली बार पति ने तलाक याचिका दायर की, जबकि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ (Restitution of Conjugal Rights) की अर्जी लगाई। मैसूर की फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी और पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पति को साथ रहने का आदेश दिया था।
धारा 13(1A) के तहत दोबारा याचिका: फैमिली कोर्ट के आदेश के बावजूद पति पत्नी के साथ रहने नहीं गया। इसके बाद उसने धारा 13(1A) का सहारा लेते हुए कोर्ट में दोबारा अर्जी लगाई कि “समानिवास का आदेश पारित होने के एक साल बाद भी वे साथ नहीं रहे हैं, शादी पूरी तरह टूट चुकी है (Irretrievable Breakdown), और अब उसकी पत्नी में कोई रुचि नहीं बची है।
पक्षों की जिरह और पति का सच स्वीकार करना
फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान इस मामले की जमीनी हकीकत सामने आई।
पत्नी का पक्ष: पत्नी ने स्पष्ट किया कि उसने कभी पति या उसके सास-ससुर के साथ क्रूरता (Cruelty) नहीं की। वह अपने ससुराल वालों का पूरा ख्याल रखती थी। धार्मिक रीति-रिवाजों और ससुराल वालों की सलाह पर वे घर की पहली मंजिल पर रहते थे। उसने कभी अलग रहने या झगड़ा करने की जिद नहीं की।
पति का क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह): मुकदमे के दौरान सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पति ने अदालत में क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान खुद यह स्वीकार किया कि उसने फैमिली कोर्ट का आदेश आने के बावजूद पत्नी के साथ रहना इसलिए शुरू नहीं किया क्योंकि “अब उसकी अपनी पत्नी के साथ रहने में कोई रुचि या दिलचस्पी नहीं रह गई थी।”
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: अपनी खुद की गलती का फायदा नहीं उठा सकते
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने पति की इन दलीलों पर कड़ा एतराज जताया और कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित किया।
हिंदू विवाह की धार्मिक और वैधानिक प्रकृति
जस्टिस डी.के. सिंह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, हिंदू कानून के तहत विवाह एक संस्कार (Sacrament) है, कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं। एक बार जब पक्षकारों का विवाह हो जाता है, तो यह जीवनभर के लिए होता है। कोई भी व्यक्ति केवल इस आधार पर वैवाहिक रिश्ते से बाहर नहीं जा सकता कि उसकी दूसरे पक्ष में कोई दिलचस्पी नहीं बची है।
‘अपनी गलती का लाभ न उठाने’ का विधिक सिद्धांत (Taking Advantage of Own Wrong)
अदालत ने पाया कि पति ने खुद अपनी मर्जी से प्यार किया, शादी की, और बेटी का पिता बना। अब इतने सालों बाद जब पत्नी साथ रहने को तैयार है, तो वह खुद अदालत के आदेश के बावजूद साथ रहने नहीं गया। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति अपनी ही गलती (साथ न रहने का फैसला) का इस्तेमाल करके तलाक का लाभ नहीं उठा सकता।
अंतिम आदेश: फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी की तरफ से किसी भी तरह की क्रूरता या असहयोग का कोई सबूत नहीं है। केवल पति की इच्छा या ‘रुचि खत्म होने’ को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का आधार नहीं माना जा सकता।
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट, मैसूर (अतिरिक्त मुख्य न्यायाधीश) के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया और पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।
विधिक फैक्ट शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट बनाम हिंदू विवाह तलाक वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Division Bench), बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ |
| मूल वैधानिक अधिनियम | धारा 13(1A) एवं धारा 9, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 |
| अपील का आधार (पति द्वारा) | धारा 9 (Restitution) के बाद भी साथ न रहना व शादी में ‘दिलचस्पी न होना’ |
| याचिकाकर्ता (पति) के वकील | अधिवक्ता बेले आर. (Belle R) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | विवाह को ‘संस्कार’ मानते हुए तलाक की अपील पूरी तरह खारिज |
यह आदेश उन लोगों के लिए एक कड़ा कानूनी संदेश है जो वैवाहिक दायित्वों से बचने के लिए ‘मैरिज ब्रेकडाउन’ या ‘अरुचि’ का बहाना बनाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब तक कानून द्वारा तय कठोर आधार (जैसे क्रूरता, व्यभिचार, या परित्याग) साबित न हों, केवल व्यक्तिगत अरुचि के आधार पर दशकों पुराने रिश्ते और परिवार को खत्म नहीं किया जा सकता।

