केस मैट्रिक्स: Supreme Court Decision on Section 38 BNSS (Lawyer Presence During Interrogation)
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस संदीप मेहता |
| केस संदर्भ | राज्य बनाम आरोपी (आंध्र प्रदेश सरकार की अपील) |
| संबंधित कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS Section 38) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या BNSS की धारा 38 के तहत पूछताछ के पूरे समय वकील की उपस्थिति अनिवार्य है? |
| अदालत का फैसला | नहीं। धारा 38 केवल मिलने/परामर्श का अधिकार देती है; वकील को केवल आरोपी के दिखने योग्य सीमा (Within Sight) में रहने की अनुमति होगी। |
Lawyer Presence: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 38 के दायरे को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम कानूनी व्यवस्था दी है।
शीर्ष अदालत का यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा दायर एक अपील को स्वीकार करते हुए सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह प्रावधान गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार देता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि पूछताछ के पूरे सत्र के दौरान वकील का लगातार भौतिक रूप से उपस्थित (Continuous Physical Presence) रहना आवश्यक है।
मामला क्या था?: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के शर्त की चुनौती
- मूल विवाद: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक आरोपी की पुलिस हिरासत/न्यायिक हिरासत के दौरान यह अनिवार्य शर्त लगा दी थी कि आरोपी की पूछताछ के समय जेल में दो वकील नामांकित रहेंगे और पूछताछ के दौरान “किसी भी समय” एक वकील की मौजूदगी अनिवार्य होगी।
- राज्य सरकार की आपत्ति: आंध्र प्रदेश सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। राज्य का तर्क था कि पूछताछ के दौरान वकील की लगातार मौजूदगी से पुलिस जांच में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है और यह धारा 38 के प्रावधानों से परे है।
- सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: जस्टिस संदीप मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने राज्य सरकार की इस आशंका को जायज माना कि ऐसी कठोर शर्तें कस्टोडियल जांच (Custodial Investigation) में रुकावट बन सकती हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य विधिक व्याख्याएँ
BNSS की धारा 38 का वास्तविक अर्थ
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य आरोपी को परामर्श की सुविधा देना है, न कि जांच की निगरानी कराना। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: “इस प्रावधान का सीधा पाठ यह स्पष्ट करता है कि इसके तहत मिलने वाला अधिकार केवल पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है। इसका किसी भी तरह से यह अर्थ नहीं है कि पूछताछ के हर सत्र के दौरान वकील की लगातार, निर्बाध भौतिक मौजूदगी रहेगी—चाहे दृश्यता या सुनने की दूरी कुछ भी रखी गई हो।”
हाई कोर्ट के आदेश में संशोधन
अदालत ने माना कि हाई कोर्ट का “किसी भी समय वकील की उपस्थिति” का निर्देश धारा 38 की सीमा को पार कर गया था। “यह निर्देश कि ऐसी उपस्थिति ‘पूछताछ के दौरान किसी भी समय’ उपलब्ध होनी चाहिए, यदि इसे निरंतर उपस्थिति के निर्बाध अधिकार के रूप में समझा जाए, तो यह BNSS की धारा 38 की अपनी सीमा से आगे निकल जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम संशोधन (आदेश)
सुप्रीम कोर्ट ने वकील की उपस्थिति से जुड़ी शर्त को बरकरार तो रखा, लेकिन उसमें महत्वपूर्ण संशोधन कर दिया।
- दृष्टि सीमा के भीतर उपस्थिति: वकील को केवल उस सीमा में रहने की अनुमति होगी जहां से वह आरोपी को देख सकता हो (Within sight of interrogation)।
- निरंतर रुकावट पर रोक: पूछताछ प्रक्रिया के दौरान वकील को लगातार आरोपी के पास बैठने या व्यक्तिगत तौर पर बातचीत करते रहने का असीमित अधिकार नहीं होगा।

