Saturday, October 31, 2026
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Gautam Adani: डीप स्टेट की साजिश…अमेरिकी अदालत ने अदाणी SEC मामले में भारतीय मूल के व्यक्ति की हस्तक्षेप याचिका खारिज की, केस को पढ़ें

केस मैट्रिक्स: SEC v. Gautam Adani & Sagar Adani (Intervention Application)

पहलूविवरण
संबंधित अदालतयूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट फॉर द ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यू यॉर्क
माननीय न्यायाधीशजज निकोलस जी. गराउफिस (Judge Nicholas G Garaufis)
याचिकाकर्ताआशू शुक्ला (न्यू जर्सी निवासी)
मुख्य दावाअमेरिकी ‘डीप स्टेट’ द्वारा अदाणी के खिलाफ रची गई साजिश का आरोप
अदालत का निर्णययाचिका खारिज; भविष्य में शुक्ला की किसी भी नई फाइलिंग पर रोक।

Gautam Adani: गौतम अदाणी और सागर अदाणी के खिलाफ अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) द्वारा चलाए जा रहे रिश्वतखोरी मामले में एक नया मोड़ सामने आया है।

जज निकोलस जी. गराउफिस (Judge Nicholas G Garaufis) ने 15 जुलाई को पारित अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता मुकदमे में अपना कोई भी कानूनी या व्यक्तिगत हित (Legally Recognizable Interest) साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। न्यू जर्सी निवासी आशू शुक्ला (Ashu Shukla) द्वारा मामले में हस्तक्षेप करने और “अमेरिकी डीप स्टेट एक्टर्स” पर साजिश रचने का आरोप लगाने वाली याचिका को यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट (पूर्वी जिला, न्यू यॉर्क) ने सिरे से खारिज कर दिया है।

याचिकाकर्ता के दावे और सोशल मीडिया सबूत

  • ‘डीप स्टेट’ का आरोप: आशू शुक्ला (जिन्होंने बिना वकील के खुद पक्ष रखा) ने आरोप लगाया था कि यह मामला अदाणी से रिश्वत ऐंठने और वैश्विक निवेशकों व व्यापार को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी “डीप स्टेट एक्टर्स” और कुछ भारतीय अधिकारियों का एक समन्वित प्रयास (Coordinated Effort) है।
  • सोशल मीडिया पोस्ट बने सबूत: अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में जो 6 दस्तावेज संलग्न किए थे, उनमें से अधिकांश उसके अपने सोशल मीडिया पोस्ट थे और हैरान करने वाली बात यह थी कि इनमें गाजा संघर्ष से जुड़ा एक प्रस्तावित शांति प्लान भी शामिल था।
  • अदालत की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि शुक्ला के दावे केवल “अटकलों और निराधार तर्कों” पर आधारित हैं और इनमें कोई विश्वसनीयता नहीं है।

अमेरिकी अदालत (जज गराउफिस) के मुख्य निष्कर्ष

कोई कानूनी हित नहीं

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जिस “सार्वजनिक हित” या तीसरे पक्षों के नुकसान का जिक्र किया है, वह बेहद धुंधला (Nebulous) है और इसका याचिकाकर्ता के अपने कानूनी अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं है।

यूएस कोर्ट का आदेश: न्यायालय को यह विश्वास नहीं है कि यह प्रस्तावित हस्तक्षेप मामले के वास्तविक तथ्यों को स्पष्ट करने या कानूनी प्रश्नों के न्यायसंगत फैसले में कोई योगदान देगा। यदि कुछ होगा, तो यह इसका बिल्कुल उल्टा ही करेगा।

आगे की अर्ज़ियों पर बैन

अदालत ने ‘फेडरल रूल्स ऑफ सिविल प्रोसीजर’ के नियम 24 के तहत हस्तक्षेप याचिका खारिज करते हुए कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि आशू शुक्ला द्वारा इस मामले में दाखिल की जाने वाली किसी भी भविष्य की अर्ज़ी को स्वीकार न किया जाए।

बैकग्राउंड: अदाणी केस और DOJ का यू-टर्न

इस फैसले को समझने के लिए मामले की पृष्ठभूमि जानना ज़रूरी है।

  1. मूल आरोप: अमेरिकी सरकार के अभियोग (Indictment) में आरोप लगाया गया था कि भारत में 12 गीगावाट सौर ऊर्जा परियोजना के ठेके हासिल करने के लिए भारतीय अधिकारियों को लगभग ₹2,029 करोड़ ($265 मिलियन) की रिश्वत देने का वादा किया गया था।
  2. DOJ द्वारा केस वापस लेने की मांग: बाद में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने अदालत से सभी 8 आरोपियों के खिलाफ आरोप रद्द करने की मांग की। DOJ ने जुलाई में दाखिल अपने जवाब में इस मुकदमे को “नेम एंड शेम” (Name and Shame) कार्रवाई करार दिया, जिसे बाइडन प्रशासन के अंतिम दिनों में बिना किसी वास्तविक ट्रायल की उम्मीद के उजागर किया गया था।
  3. कोर्ट का रुख: जज गराउफिस ने 25 जून और 8 जुलाई को DOJ की अर्जी पर तुरंत राहत देने से इनकार करते हुए सरकार से यह आश्वस्त करने को कहा कि केस वापस लेने के पीछे कोई अप्रकाशित या गुप्त समझौता नहीं है। इसके लिए कोर्ट ने अदाणी से हलफनामा भी मांगा है।

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