केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विधिक निर्देश |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संदीप जैन |
| संबंधित कानून | संविधान का अनुच्छेद 21 (निजता/स्वतंत्रता का अधिकार), BNS की धारा 87 व UP धर्म परिवर्तन अधिनियम 2021 |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या वयस्क महिलाओं के स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन और विवाह के निर्णय में परिवार/पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। बालिग महिलाओं का अपनी मर्जी से धर्म चुनना और शादी करना उनका संवैधानिक अधिकार (Decisional Autonomy) है। |
| अंतिम निर्देश | राज्य और पिता को महिलाओं को कोर्ट के समक्ष पेश करने का कड़ा आदेश; पुलिस से अनुपालन रिपोर्ट तलब। |
Unlawful Conversion of Religion: बालिग महिलाओं के धर्म परिवर्तन और अपनी पसंद के जीवनसाथी को चुनने के अधिकार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है।
जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने 20 और 35 वर्ष की दो सगी बहनों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार और दो बहनों के पिता को निर्देश दिया है कि दोनों महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश किया जाए। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वयस्क महिलाएं स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करती हैं और विवाह का निर्णय लेती हैं, तो उनके पिता सहित कोई भी व्यक्ति उनके इस संवैधानिक अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
मामला क्या था? (Case Background)
- यह मामला दो वयस्क बहनों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने स्वेच्छा से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार करने का दावा किया है।
- स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन: महिलाओं का कहना है कि वे बालिग और स्वस्थ चित्त (Sound Mind) की हैं। उन्होंने बिना किसी दबाव, प्रलोभन या जबरदस्ती के अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म अपनाया है और अपनी पसंद के व्यक्तियों से शादी करने का फैसला किया है।
- पिता द्वारा FIR: महिलाओं का आरोप है कि उनके पिता उनके स्वतंत्र निर्णयों से नाराज थे। पिता ने 4 मई 2025 को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 (महिला को विवाह आदि के लिए मजबूर करने हेतु अपहरण/बहला-फुसलाकर ले जाना) के तहत उनके खिलाफ झूठी और दुर्भावनापूर्ण FIR दर्ज करवा दी।
- अवैध हिरासत का आरोप: याचिकाकर्ताओं के वकीलों (अधिवक्ता अली बिन सैफ और दिनेश कुमार यादव) ने तर्क दिया कि पिता ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर महिलाओं को अवैध रूप से घर में कैद कर दिया और उनकी स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर दिया।
- धर्म परिवर्तन कानून का तर्क: वकीलों ने तर्क दिया कि चूंकि धर्म परिवर्तन पूरी तरह से स्वैच्छिक था, इसलिए उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 (UP Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act) के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि इसमें बल, छल या प्रलोभन का कोई साक्ष्य नहीं है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “व्यक्तिगत स्वायत्तता और निजता का अधिकार”
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महिलाओं के मौलिक अधिकारों और स्वायत्तता पर जोर देते हुए कहा-
व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप अनुचित
जस्टिस संदीप जैन ने अपने आदेश में कहा, यदि ये दावे अंततः सही पाए जाते हैं, तो ऐसे व्यक्तिगत विकल्पों के प्रयोग में उत्तरदाता नंबर 4 (पिता) या किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया कोई भी हस्तक्षेप गरिमा, निजता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निर्णयात्मक स्वायत्तता (Decisional Autonomy) के उनके संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकारों का अनधिकृत अतिक्रमण होगा।
अदालत का प्राथमिक कर्तव्य
हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों महिलाएं वयस्क हैं और अपने धर्म, विवाह, निवास और जीवन के भावी मार्ग के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हैं। अदालत का पहला कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि क्या संबंधित व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से कार्य कर रहे हैं या किसी प्रकार के अवैध कब्जे या हिरासत में हैं।
उच्च न्यायालय के कड़े निर्देश (Court Directives)
- अदालत में पेशी का आदेश: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और पिता को निर्देश दिया कि दोनों महिलाओं को 6 अगस्त को अदालत के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से पेश किया जाए ताकि कोर्ट उनसे सीधे बातचीत कर उनकी स्वतंत्र इच्छा का आकलन कर सके।
- नोटिस और अनुपालन: राज्य प्राधिकारियों को पिता को 3 दिनों के भीतर नोटिस जारी करने का निर्देश दिया गया।
- गैर-अनुपालन पर व्यक्तिगत हलफनामा: यदि निर्धारित तिथि पर महिलाओं को पेश नहीं किया जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दाखिल कर कारण बताना होगा कि उन्हें सुरक्षित पेश करने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।

