केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | बॉम्बे उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले |
| संबंधित कानून | नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 एवं 142 |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या मृतक पेयी का कानूनी वारिस (Legal Heir) बिना ‘Payee’ या ‘Holder in Due Course’ बने धारा 138 का केस दर्ज करा सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। धारा 142 के तहत केवल पेयी या होल्डर इन ड्यू कोर्स ही केस कर सकता है। कानूनी वारिस सीधे आपराधिक केस दर्ज नहीं करा सकता। |
| अंतिम आदेश | तीन आपराधिक शिकायतें और मजिस्ट्रेट का समन आदेश रद्द (Quashed)। |
NI Act: नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 और कानूनी वारिसों (Legal Heirs) के अधिकारों पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक फैसला सुनाया है।
जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले की पीठ ने डॉ. सागर रघुनाथ फटके के खिलाफ दर्ज तीन आपराधिक शिकायतों और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश (Process Order) को निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने माना है कि मृतक पेयी (जिसके नाम चेक जारी हुआ था) का कानूनी वारिस केवल उत्तराधिकार के आधार पर धारा 138 के तहत चेक बाउंस की आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता, जब तक कि वह स्वयं ‘पेयी’ या ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ (सम्यक अनुक्रम धारक) न हो।
मामला क्या था? (Case Background)
- यह मामला देवरुख (महाराष्ट्र) के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) की अदालत में दर्ज शिकायतों से जुड़ा था।
- ऋण और चेक का मामला: शिकायतकर्ता नंदिनी अशोक राव के अनुसार, आरोपी (डॉ. सागर फटके) ने 2015 में उनके पति अशोक राव से ₹18 लाख रुपये उधार लिए थे और पुनर्भुगतान के लिए ₹6-6 लाख रुपये के तीन चेक जारी किए थे।
- पति का निधन: चेक बैंक में जमा करने से पहले ही अशोक राव का निधन हो गया।
- बैंक में जमा और बाउंस: पति की मृत्यु के बाद, विधवा (नंदिनी) ने उन चेकों को अपने और अपने दिवंगत पति के संयुक्त खाते (Joint Account) में जमा कर दिया। चेक “खाते में पर्याप्त राशि न होने” (Insufficiency of Funds) के कारण बाउंस हो गए।
- कानूनी नोटिस और शिकायत: नंदिनी ने वैधानिक मांग नोटिस भेजा और धारा 138 NI Act के तहत 3 शिकायतें दर्ज कराईं, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेते हुए आरोपी को समन जारी कर दिया।
- आरोपी की चुनौती: आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि शिकायतकर्ता न तो चेक की पेयी (Payee) है और न ही होल्डर इन ड्यू कोर्स, इसलिए वह आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने की हकदार नहीं है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “धारा 142 NI Act का दायरा”
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने NI Act की धाराओं 7, 8, 9, 138 और 142 का गहन विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष दिए।
केवल पेयी या होल्डर इन ड्यू कोर्स ही दर्ज करा सकता है केस
अदालत ने कहा कि NI Act की धारा 142 के तहत धारा 138 की आपराधिक शिकायत केवल उसी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई जा सकती है जो चेक का ‘पेयी’ (Payee) हो या ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ (Holder in Due Course) हो। मजिस्ट्रेट के आदेश का अवलोकन प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि इस प्रश्न पर विचार ही नहीं किया गया कि क्या शिकायतकर्ता ‘पेयी’ थी या ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’। आदेश इस गलत धारणा पर आगे बढ़ा कि चेक शिकायतकर्ता के नाम पर ही जारी किए गए थे।
कोई पृष्ठांकन (Endorsement) या कोर्ट का आदेश नहीं
अदालत ने नोट किया कि चेक अशोक राव के नाम पर थे। उनकी मृत्यु के बाद उन चेकों पर नंदिनी के पक्ष में कोई विधिक पृष्ठांकन (Endorsement) नहीं किया गया था। न ही नंदिनी के पास किसी सक्षम अदालत का ऐसा कोई आदेश या प्रमाणपत्र था जो उन्हें धारा 138 के तहत सीधे मुकदमा चलाने का अधिकार देता हो।
सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा
विष्णुकांत बनाम कैलाश और सुप्रीम कोर्ट के नरेश पॉटरीज बनाम आरती इंडस्ट्रीज फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि कानूनी वारिस अपने आप मृतक पेयी की जगह लेकर आपराधिक मुकदमा शुरू नहीं कर सकता। यदि वह राशि वसूलना चाहती है, तो उसे पहले सिविल कोर्ट जाकर अधिकार स्थापित करने वाली घोषणा/प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा।
निर्णय (Court Verdict)
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि नंदिनी अशोक राव धारा 138 NI Act के तहत शिकायतकर्ता बनने की वैधानिक पात्रता (Locus Standi) नहीं रखती थीं। इसलिए, उच्च न्यायालय ने तीनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए डॉ. सागर रघुनाथ फटके के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाहियों और जारी समन को पूरी तरह से निरस्त (Quashed) कर दिया।

