केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | बॉम्बे उच्च न्यायालय (गोवा पीठ) का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय, गोवा पीठ (Bombay High Court – Goa Bench) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर |
| याचिकाकर्ता | दीनार तारकर रिसोर्सेज (इंडिया) प्रा. लिमिटेड व अन्य |
| संबंधित कानून | आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 276C(2) |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या आयकर भुगतान में केवल देरी होने पर धारा 276C(2) के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। आपराधिक मुकदमे के लिए ‘Mens Rea’ (गलत मंशा/इरादा) साबित करना जरूरी है। वास्तविक वित्तीय संकट के कारण हुई देरी कर चोरी नहीं है। |
| अंतिम आदेश | आपराधिक शिकायत एवं जारी समन/प्रोसेस आदेश रद्द (Quashed)। |
Income Tax Return Filling: आयकर अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमों के संबंध में बॉम्बे हाईकोर्उट (गोवा पीठ) ने एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है।
जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर की पीठ ने माना कि आपराधिक मुकदमे के लिए आपराधिक मंशा (Mens Rea) का होना अनिवार्य है और केवल भुगतान में विलंब या विफलता के कारण किसी पर आपराधिक कार्रवाई नहीं चलाई जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल स्वीकार्य कर देनदारी (Tax Liability) के भुगतान में देरी होना, जब तक कि कर चोरी का कोई जानबूझकर किया गया इरादा (Deliberate Intention) न हो, “कर चोरी का जानबूझकर किया गया प्रयास” (Wilful Attempt to Evade Tax) नहीं माना जा सकता।
मामला क्या था? (Case Background)
- यह याचिका दीनार तारकर रिसोर्सेज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (Dinar Tarcar Resources Pvt. Ltd.), इसके प्रबंध निदेशक (MD) और संयुक्त प्रबंध निदेशक द्वारा दायर की गई थी।
- शिकायत का आधार: आयकर विभाग ने कंपनी के खिलाफ आयकर अधिनियम की धारा 276C(2) के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कंपनी ने आकलन वर्ष 2012-13 के लिए अपनी स्वीकार्य कर देनदारी का भुगतान न करके जानबूझकर कर चोरी का प्रयास किया।
- कंपनी का पक्ष: याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि गोवा में खनन कार्यों के निलंबन (Suspension of Mining Operations) के बाद पैदा हुए वित्तीय संकट के कारण कर भुगतान में देरी हुई थी।
- बकाया का पूर्ण भुगतान: कंपनी ने बकाया कर का लगातार भुगतान किया, समय बढ़ाने की मांग की और ब्याज सहित पूरी राशि चुका दी, जिसके बाद आयकर विभाग ने ‘निल ड्यूज’ (Nil Dues Order) आदेश भी जारी कर दिया था।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “धारा 276C(2) में ‘Wilful’ का अर्थ आपराधिक मंशा है”
जस्टिस अमित एस. जमसांडेकर ने सुप्रीम कोर्ट के एस. सुंदरम पिल्लई बनाम वी.आर. पट्टाभिरमन फैसले का हवाला देते हुए धारा 276C(2) की व्याख्या की।
‘Wilful’ शब्द और आपराधिक मंशा (Mens Rea)
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘Wilful’ (जानबूझकर) शब्द एक मानसिक तत्व को पेश करता है और इसके लिए व्यक्ति के कार्यों के माध्यम से उसकी मनःस्थिति को देखना आवश्यक है। धारा 276-C(2) के तहत मुकदमा चलाने के लिए व्यक्ति का आचरण महत्वपूर्ण हो जाता है। व्यक्ति को जानबूझकर, इरादतन और सचेत रूप से कर भुगतान से बचने का प्रयास करना चाहिए था। इसमें अनजाने में किया गया कृत्य, आकस्मिक कृत्य, आकस्मिक चूक या वास्तविक असमर्थता शामिल नहीं है।
केवल ढुलमुल या अस्पष्ट आरोपों पर आपराधिक मुकदमा अमान्य
अदालत ने कहा कि चूंकि धारा 276C(2) एक दंडात्मक प्रावधान (Penal Provision) है, इसलिए शिकायत में अपराध के सभी घटकों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। केवल शिकायत में “जानबूझकर प्रयास” लिख देने से ही मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि उन विशिष्ट कृत्यों का उल्लेख न हो।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की यांत्रिक प्रक्रिया
अदालत ने पाया कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने सुप्रीम कोर्ट के पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मामले में तय सिद्धांतों के विपरीत, शिकायत का परीक्षण किए बिना यांत्रिक रूप से समन/प्रोसेस (Order Issuing Process) जारी कर दिया था।
निर्णय (Court Verdict)
हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का आचरण कर से बचने का नहीं, बल्कि बकाया चुकाने के नेक नीयत (Bona fide) प्रयासों को दर्शाता है। शिकायत दर्ज होने से पहले ही अधिकांश बकाया चुका दिया गया था।
इन निष्कर्षों के साथ, उच्च न्यायालय ने आपराधिक शिकायत और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रोसेस ऑर्डर को पूरी तरह से निरस्त (Quashed) कर दिया।

