केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | राजस्थान उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस कुलदीप माथुर |
| मुख्य धाराएं | IPC धारा 376(2)(n), 420, 450, 366, 323 |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या शादीशुदा महिला से शादी का वादा कर संबंध बनाना दुष्कर्म (Sec 376 IPC) की श्रेणी में आता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। यदि दोनों पक्ष जानते हैं कि महिला का पहला विवाह अस्तित्व में है, तो शादी का वादा कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं है और इसे सहमति को दूषित करने वाला भ्रम नहीं माना जा सकता। |
| अंतिम आदेश | आरोपी के खिलाफ तय आरोप रद्द, पुनरीक्षण याचिका स्वीकार (Discharged)। |
Already Marriage Consent: शादी का झूठा वादा करके दुष्कर्म (Rape on False Promise of Marriage) के आरोपों से जुड़े मामलों में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्याख्या दी है।
जस्टिस कुलदीप माथुर की एकल पीठ ने बीकानेर की अतिरिक्त सत्र अदालत (महिला अत्याचार मामले) द्वारा आरोपी के खिलाफ धारा 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार) सहित IPC की अन्य धाराओं (450, 420, 366, 323) के तहत तय किए गए आरोपों (Charges) को रद्द करते हुए आरोपी को बरी (Discharge) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि दोनों पक्षों (महिला और पुरुष) को यह भली-भांति ज्ञात है कि महिला की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो सामान्यतः यह नहीं माना जा सकता कि महिला को केवल शादी के वादे के झांसे में रखकर शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाया गया था।
मामला क्या था? (Case Background)
एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला पहले से शादीशुदा थी और ससुराल से निकाले जाने के बाद अपने मायके में रह रही थी। एफआईआर दर्ज कराने से करीब 10 महीने पहले उसकी मुलाकात आरोपी से हुई। आरोप लगाया गया कि शादी का झांसा देकर आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। एक दिन आरोपी ने विवाह के सिलसिले में महिला से उसका पहचान पत्र (Aadhaar Card) मंगवाया, लेकिन बाद में शादी करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया गया।
आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि महिला वयस्क और परिपक्व है, जिसे अपनी वैवाहिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। 10 महीने तक चले लगातार संबंधों से साफ है कि यह सहमति से बना संबंध (Consensual Relationship) था।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “कानूनन अवैध वादा सहमति को दूषित नहीं कर सकता”
जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने IPC की धारा 376(2)(n) और सुप्रीम कोर्ट के मिसालों का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित मुख्य विधिक बिंदु तय किए।
पहली शादी के रहते दूसरा विवाह कानूनी रूप से अमान्य
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले प्रमोद कुमार नवरत्न बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि पहली शादी के जारी रहते दूसरी शादी को कानून मान्यता नहीं देता। पीठ ने कहा, वर्तमान मामले में यह स्वीकार्य तथ्य है कि शिकायतकर्ता कानूनी रूप से विवाहित थी और उस समय तक तलाक की कोई डिग्री प्राप्त नहीं की गई थी। परिणामस्वरूप, शादी के किसी भी कथित वादे को तब तक कानूनी रूप से पूरा नहीं किया जा सकता था जब तक कि मौजूदा विवाह को कानून के अनुसार भंग न कर दिया गया हो। इसलिए प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि शिकायतकर्ता की सहमति केवल एक कानूनी रूप से लागू करने योग्य शादी के वादे पर प्राप्त की गई थी।
धारा 376(2)(n) में ‘बार-बार’ (Repeatedly) का अर्थ
अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 376(2)(n) के तहत ‘बार-बार’ बलात्कार का तात्पर्य अलग-अलग समय पर किए गए अपराध से है, न कि लंबे समय से चले आ रहे आपसी सहमति के संबंधों से जो बाद में बिगड़ गए हों।
संबंधों में खटास आने पर दर्ज कराई गई FIR
अदालत ने पाया कि महिला ने लंबे समय तक स्वेच्छा से संबंध बनाए रखे और जब दोनों के रिश्ते खराब हो गए, तब यह एफआईआर दर्ज कराई गई।
निर्णय (Court Verdict)
हाई कोर्ट ने माना कि महिला की सहमति किसी भ्रम (Misconception of Fact) में नहीं ली गई थी क्योंकि वह अपनी वैवाहिक स्थिति और उसके कानूनी परिणामों से पूरी तरह वाकिफ थी। इसके आधार पर राजस्थान हाई कोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा तय किए गए सभी आरोपों को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ता को बरी कर दिया।

