Thursday, November 5, 2026
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Female Infanticide: आजादी के 80 साल बाद भी लोग बेटे की चाहत रखते हैं, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है; दूसरी बेटी पैदा होने पर यह किया, पढ़िए

अपराध का तरीका और एएनएम/आशा वर्कर की सतर्कता

  1. साजिश और क्रूरता: अभियोजन पक्ष के अनुसार, परिवार में दूसरी बेटी पैदा होने से नाराज दादा और परिजनों ने नवजात शिशु को पानी के टब में डुबा दिया। बच्ची ऊपर न तैर सके, इसके लिए उसकी पीठ पर भारी ईंट रख दी गई।
  2. झूठी कहानी और जल्दबाजी में अंतिम संस्कार: हत्या के बाद परिवार ने मनगढ़ंत कहानी बनाई कि आधी रात को खुला दरवाजा देखकर कोई आवारा जानवर बच्ची को उठाकर ले गया। इसके बाद परिजनों ने पुलिस को सूचना दिए बिना शव का जल्दबाजी में अंतिम संस्कार/दफनाने का प्रयास किया।
  3. आशा (ASHA) वर्कर की सतर्कता से खुला राज: स्थानीय आशा वर्कर को परिवार की हरकतों पर संदेह हुआ। जब परिवार ने पुलिस में मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया, तो आशा वर्कर ने सीधे पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने मामला दर्ज कर बच्ची के शव को कब्र से बाहर निकलवाया (Exhumed)। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण पानी में डूबना (Drowning) पाया गया।

नागपुर: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कन्या भ्रूण हत्या/शिशु हत्या (Female Infanticide), समाज में व्याप्त गहरी लैंगिक विषमता और पुत्र-मोह की रूढ़िवादी मानसिकता पर एक अत्यंत मार्मिक और सख्त टिप्पणी की है।

जंगली जानवर द्वारा ले जाने की झूठी कहानी बनाकर दबाने का प्रयास किया

न्यायमूर्ति एम.एम. नेर्लीकर की एकल पीठ ने आरोपी गोपीनाथ जानकू प्रधान की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह घटना इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे एक परिवार में दूसरी बेटी पैदा होने मात्र से उसे मौत के घाट उतार दिया गया और बाद में इसे जंगली जानवर द्वारा ले जाने की झूठी कहानी बनाकर दबाने का प्रयास किया गया। अदालत ने फैसला सुनाया है कि स्वतंत्रता के आठ दशक बीत जाने के बावजूद भारतीय समाज में बालिकाओं के प्रति ऐसी नफरत और पूर्वाग्रह का जिंदा रहना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में अपनी एक महीने की नवजात पोती की टब में पानी में डुबोकर और पीठ पर भारी ईंट रखकर हत्या करने के आरोपी दादा की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया [गोपीनाथ जानकू प्रधान बनाम महाराष्ट्र राज्य]।

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उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां

1. ‘आजादी के 80 साल बाद भी बेटे की चाहत कायम’ पितृसत्तात्मक मानसिकता और बालिकाओं के खिलाफ अपराधों पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति एम.एम. नेर्लीकर ने कहा: “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी आजादी के 80 साल बीत जाने के बाद भी इस देश में लोग बेटे की चाहत (Preference for male child) रखते हैं। यह मामला एक नवजात बालिका की हत्या का एक क्लासिक उदाहरण है, जिसे केवल इसलिए मार डाला गया क्योंकि वह अपने माता-पिता की दूसरी बेटी थी और परिवार किसी भी सूरत में दूसरी बेटी नहीं चाहता था।”

2. घर के भीतर हुई हत्या और साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 की प्रयोज्यता

  • आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि हत्या से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य नहीं है और चूंकि बच्ची की मां को जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता (Parity) के आधार पर दादा को भी रिहा किया जाए।
  • अदालत ने समानता के तर्क को खारिज करते हुए रेखांकित किया कि यह जघन्य कृत्य आरोपी के अपने घर की चारदीवारी के भीतर अंजाम दिया गया था। भारतीय साक्ष्य अधिनियम/बीएसए की धारा 106 के अनुसार, जो तथ्य विशेष रूप से परिवार के सदस्यों के ज्ञान में थे, उसका स्पष्टीकरण देना आरोपी का दायित्व था।
  • अपराध के तौर-तरीके (Mode and manner) और बच्ची को मारकर रात के अंधेरे में आनन-फानन में दफनाने के आचरण को देखते हुए अदालत ने जमानत देने से साफ इनकार कर दिया।

सतर्क आशा (ASHA) वर्कर ने उजागर किया षड्यंत्र

  • वारदात की वीभत्सता: गढ़चिरौली जिले में घटित इस मामले में अभियोजन के अनुसार, एक माह की नवजात बच्ची को पानी से भरे टब में डुबोया गया और वह हिल-डुल न सके, इसलिए उसकी पीठ पर भारी ईंट रख दी गई, जिससे दम घुटने (Drowning) से उसकी तड़प-तड़पकर मौत हो गई।
  • जानवर ले जाने की मनगढ़ंत कहानी: हत्या के बाद परिवार ने नाटक रचा कि आधी रात को घर का दरवाजा खुला रहने के कारण कोई जंगली जानवर कमरे में घुसा और बच्ची को खींचकर ले गया। इसके बाद पुलिस को सूचित किए बिना आनन-फानन में शव को दफना दिया गया।
  • आशा वर्कर की सजगता: गांव की स्थानीय मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ASHA Worker) को जब अचानक नवजात की मौत और गुप्त अंत्येष्टि की सूचना मिली, तो उसे गहरा संदेह हुआ। उसने परिवार को चेतावनी दी कि यह एक पुलिस केस है और तुरंत रिपोर्ट करें। परिवार के इनकार करने पर उसने सीधे स्थानीय पुलिस को सतर्क किया।
  • कब्र खोदकर शव निकाला गया: पुलिस ने मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में बच्ची के शव को कब्र से बाहर निकाला (Exhumation)। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ पुष्टि की कि बच्ची की मौत पानी में डूबने (Asphyxia due to drowning) से हुई थी, जिससे परिवार का झूठा दावा पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: गोपीनाथ जानकू प्रधान बनाम महाराष्ट्र राज्य [आपराधिक जमानत आवेदन – बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर पीठ)]
  • प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1) (हत्या / पूर्ववर्ती धारा 302 IPC), धारा 61 (आपराधिक षड्यंत्र / पूर्ववर्ती 120B IPC), एवं धारा 238 (साक्ष्य मिटाना / पूर्ववर्ती 201 IPC); भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 106 (विशिष्ट ज्ञान वाले तथ्यों का भार); भारत का संविधान – अनुच्छेद 15(3) एवं अनुच्छेद 21 (बालिकाओं के जीवन और गरिमा की सुरक्षा)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • त्रिमूर्ति बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (सुप्रीम कोर्ट) — ‘जब कोई अपराध घर के भीतर घटित होता है, तो वहां रहने वाले सभी सक्षम सदस्यों पर घटना की यथोचित व्याख्या देने का विधिक दायित्व होता है।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • आवेदक (अभियुक्त दादा) की ओर से: अधिवक्ता यू.ई. काजी
    • राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) यू.आर. फासते
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. नेर्लीकर (बॉम्बे उच्च न्यायालय)

Female Infanticide:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर पीठ)
न्यायाधीशजस्टिस एम.एम. नेर्लिकर (Justice MM Nerlikar)
मूल मामलागढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में 1 महीने की बच्ची की टब में डुबाकर हत्या
मुख्य आरोपीगोपीनाथ जानकू प्रधान (बच्ची का दादा)
हत्या का कारणपरिवार में दूसरी बेटी का जन्म होना
कोर्ट का फैसलाआरोपी दादा की जमानत याचिका खारिज
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