केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | राजस्थान उच्च न्यायालय का निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस रेखा बोराणा (Justice Rekha Borana) |
| संबंधित अधिनियम | दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016 – Section 20) |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या प्रोबेशनर कर्मचारी को सेवा के दौरान दिव्यांग होने पर नौकरी से निकाला जा सकता है? |
| अदालत का फैसला | नहीं। प्रोबेशनर भी ‘कर्मचारी’ है और उसे नौकरी से निकालने के बजाय दूसरे पद पर समायोजित करना अनिवार्य है। |
| राहत/निर्देश | सेवा समाप्ति रद्द; तत्काल प्रभाव से पुनर्नियुक्ति/बहाली का आदेश। |
RPwD Act: दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और प्रशासनिक न्यायशास्त्र में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रोबेशन अवधि (Probation Period) पर तैनात सरकारी कर्मचारी भी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) के तहत पूर्ण सुरक्षा का हकदार है।
जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने 100% दिव्यांगता का शिकार हुए एक पुलिस कांस्टेबल की सेवा समाप्ति के आदेश को पूरी तरह गैर-कानूनी करार देते हुए उसे रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि नियमित चयन प्रक्रिया से नियुक्त व्यक्ति को केवल इसलिए ‘कर्मचारी’ मानने से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी सेवा का स्थायीकरण (Confirmation) नहीं हुआ था।
मामला क्या था? (Case Background)
- घटनाक्रम: याचिकाकर्ता को 3 जून 2013 को राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियमित चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त किया गया था। प्रोबेशन अवधि के दौरान 29 जून 2014 को एक दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके बाद उसे 100% स्थायी दिव्यांगता का प्रमाण पत्र मिला।
- राज्य सरकार/पुलिस विभाग की कार्रवाई: विभाग ने यह कहते हुए उसकी सेवाएं समाप्त (Terminate) कर दीं कि वह दिव्यांगता के कारण कांस्टेबल के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो गया है।
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता ने RPwD Act, 2016 की धारा 20(4) के दूसरे प्रावधान का हवाला दिया। नियम के अनुसार, यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांगता का शिकार होता है, तो उसे नौकरी से निकाला नहीं जा सकता। उसे या तो किसी अन्य उपयुक्त पद पर समायोजित (Adjust) किया जाना चाहिए या फिर सेवानिवृत्ति की आयु (Superannuation) तक सेवा में माना जाना चाहिए।
- राज्य का पक्ष: राज्य सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि वह घटना के समय केवल एक ‘प्रोबेशनर-ट्रेनी’ था और स्थायी कर्मचारी नहीं था, इसलिए वह धारा 20 के लाभों का दावा नहीं कर सकता।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण एवं मुख्य बिंदु
जस्टिस रेखा बोराणा ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए RPwD अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के मिसालों का विश्लेषण किया।
धारा 20(4) के तहत ‘कर्मचारी’ (Employee) की व्यापक परिभाषा
उच्च न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 20 किसी विशेष वर्ग के कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। नियमित भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त हुआ व्यक्ति पूरी तरह से ‘कर्मचारी’ की श्रेणी में आता है, चाहे उसकी सेवा स्थायी हुई हो या वह प्रोबेशन पर हो।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले ‘वी.पी. अहूजा बनाम पंजाब राज्य’ (V.P. Ahuja v. State of Punjab & Ors.) का उल्लेख किया, जिसमें तय किया गया था कि एक प्रोबेशनर भी संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा का हकदार है तथा उसकी सेवाओं को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत की सख्त टिप्पणी
पीठ ने राज्य के रुख पर टिप्पणी करते हुए कहा, यह समझ से परे है कि नियमित चयन प्रक्रिया के बाद नियुक्त याचिकाकर्ता 2016 के अधिनियम की धारा 20 के दायरे में क्यों नहीं आएगा? अधिकारियों का यह निष्कर्ष कि प्रोबेशनर होने के कारण वह धारा 20 का लाभ पाने का हकदार नहीं है, इस अदालत की राय में कानून के पूर्णतः विपरीत है।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश (Court Directives)
- सेवा समाप्ति का आदेश रद्द: उच्च न्यायालय ने कांस्टेबल की सेवा समाप्ति के आदेश को RPwD अधिनियम की धारा 20 का उल्लंघन मानते हुए रद्द (Set Aside) कर दिया।
- पुनर्बहाली का निर्देश: राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से सेवा में वापस बहाल (Reinstate) किया जाए और उसे लगातार सेवा में माना जाए।
- अन्य लाभ: याचिकाकर्ता को अधिनियम की धारा 20 के तहत देय सभी वैधानिक लाभों और वैकल्पिक पद पर समायोजन का पात्र घोषित किया गया।

