Wednesday, November 4, 2026
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Advocate Regular Bail: जमीन हड़पने और जालसाजी के आरोपी वकील की जमानत…वकील हैं तो आपको अपनी कृत्य की जानकारी जरूर होगी, जानिए केस

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय (2026)
केस TitleVikas Kumar v. Central Bureau of Investigation (CBI)
संबंधित अदालतपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
माननीय न्यायाधीशजस्टिस मनीषा बत्रा
जांच एजेंसीकेंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI – RC 12/2023 & RC 13/2023)
मुख्य आरोपफर्जी ट्रस्ट बनाकर जमीन हड़पना, फोरम शॉपिंग, बठिंडा कोर्ट में फर्जी याचिकाओं के जरिए गवाहों पर दबाव बनाना।
अदालत का फैसलाजमानत याचिका खारिज। वकील को कानूनी परिणामों की पूरी जानकारी थी; अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग गंभीर अपराध है।

Advocate Regular Bail: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने फर्जी दस्तावेज तैयार करने, अदालती कार्यवाही में हेरफेर करने और एक प्रतिष्ठित ट्रस्ट की करोड़ों की जमीन हड़पने के आपराधिक षड्यंत्र में शामिल एक वकील (Advocate) की नियमित जमानत याचिका (Regular Bail Petition) को खारिज कर दिया है।

जस्टिस मनीषा बत्रा की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता विकास कुमार (Vikas Kumar) की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक कानूनी पेशेवर होने के नाते याचिकाकर्ता को अपने कृत्यों और उनके परिणामों की भली-भांति जानकारी थी।

मामला क्या था? (Case Background)

  • यह मामला गुरू नानक विद्या भंडार ट्रस्ट, दरियागंज (नई दिल्ली) की जीरकपुर-पटियाला रोड स्थित लगभग 32 बीघा की अति-कीमती जमीन को फर्जी दस्तावेजों और आपराधिक षड्यंत्र के जरिए हड़पने के प्रयास से जुड़ा है।
  • सीबीआई (CBI) जांच: उच्च न्यायालय के 18 अक्टूबर 2023 के आदेश पर सीबीआई ने दो एफआईआर (RC-12 और RC-13) दर्ज कर जांच शुरू की थी। आरोप थे कि आरोपियों ने असली ट्रस्ट के नाम से मिलता-जुलता एक फर्जी/नकली ट्रस्ट बनाया, फर्जी कागजात तैयार किए और मार्च 2022 में सशस्त्र गुंडों के साथ जबरन जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की।
  • अदालती कार्यवाही में हेरफेर (Forum Shopping): सीबीआई जांच में सामने आया कि आरोपी वकील विकास कुमार ने पहले डेरा बस्सी की सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। जब वहां से अंतरिम राहत खारिज हो गई, तो उसने मामले को अपने नियमित प्रैक्टिस स्थल बठिंडा कोर्ट में स्थानांतरित करने की साजिश रची।
  • अवैध तरीके से गवाह और रिकॉर्ड समन करना: आरोपी वकील पर आरोप है कि उसने बठिंडा में 4 ऐसे मुकदमों (जिनमें घरेलू हिंसा का एक unrelated मामला भी शामिल था) का सहारा लिया, जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं था। उन मुकदमों की आड़ में उसने असली ट्रस्ट के बैंक अधिकारियों और गवाहों को कोर्ट में बुलवाकर झूठे बयान दर्ज कराने और वित्तीय जानकारी निकालने की साजिश रची।
  • मुख्य गवाह को धमकाना व प्रभावित करना: एक गवाह (प्रभदीप सिंह) ने कोर्ट को बताया कि उसके नाम पर फर्जी अर्जी लगाकर बैंक रिकॉर्ड समन कराए गए थे और उसने कभी वकील को इसके लिए अधिकृत नहीं किया था। गवाह ने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सौंपी, जिसमें आरोपी वकील सीबीआई जांच में सहयोग न करने के लिए दबाव बनाता सुना गया।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “पेशेवर ज्ञान का दुरुपयोग गंभीर अपराध”

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि वह केवल एक वकील के रूप में अपने क्लाइंट का प्रतिनिधित्व कर रहा था, उसका कोई निजी हित नहीं था, और वह जुलाई 2025 से हिरासत में है।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने सीबीआई और शिकायतकर्ता के तर्कों को स्वीकार करते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी और निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

वकील से कानून के सम्मान की अपेक्षा

न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की:

“पेशे से वकील होने के नाते, यह माना जाता है कि वह अपने द्वारा किए गए कृत्यों के परिणामों से भली-भांति अवगत है। उसने शिकायतकर्ता-ट्रस्ट के हितों को नुकसान पहुँचाने और न्यायिक परिणाम को प्रभावित करने के स्पष्ट इरादे से कानूनी कार्यवाहियों में हेरफेर किया। अपराध की गंभीरता और याचिकाकर्ता की सक्रिय भूमिका को देखते हुए वह जमानत का हकदार नहीं है।”

संगठित आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा

अदालत ने माना कि फर्जी ट्रस्ट के दस्तावेज तैयार करने से लेकर ‘फोरम शॉपिंग’ (Forum Shopping), बैंक गवाहों को गुमराह करने और सीबीआई के मुख्य गवाह को प्रभावित करने का प्रयास प्राथमिक दृष्टि (Prima Facie) में एक संगठित आपराधिक नेटवर्क (Organized Criminal Network) के गठन का संकेत देता है।

उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश (Court Order)

  • पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आरोपी वकील विकास कुमार की नियमित जमानत याचिका को पूर्णतः खारिज (Dismissed) कर दिया।
  • अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर की गई ये सभी टिप्पणियां केवल जमानत के बिंदु तक सीमित हैं और इसका असर निचली अदालत में चल रहे मुख्य ट्रायल के गुण-दोष (Merits) पर नहीं पड़ेगा।

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