Saturday, August 8, 2026
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Income-Based Sub-Quota: आरक्षण केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं… SC/ST/OBC में आय-आधारित उप-कोटे की याचिका, क्यों हुआ विरोध

संवैधानिक एवं कानूनी मैट्रिक्स (Constitutional Overview)

संवैधानिक अनुच्छेद / मामलामुख्य कानूनी प्रावधान
अनुच्छेद 341 एवं 342राष्ट्रपति की अधिसूचना द्वारा अनुसूचित जातियों (SC) एवं जनजातियों (ST) की पहचान।
अनुच्छेद 342Aसामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC/OBC) की पहचान।
इंद्रा साहनी केस (1992)OBC में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू; SC/ST को इससे बाहर रखा गया।
ई.वी. चिन्नैया केस (2005)संसद ही राष्ट्रपति द्वारा जारी SC/ST सूची में संशोधन या बदलाव कर सकती है।

Income-Based Sub-Quota: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण का आधार ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ापन है, न कि केवल आर्थिक स्थिति।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा दायर अपने जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) में केंद्र ने कहा कि याचिकाकर्ता आरक्षण नीति में बदलाव के लिए न्यायिक निर्देश (Writ of Mandamus) मांग रहे हैं, जबकि नीति निर्माण कार्यपालिका (Executive) के क्षेत्राधिकार का विषय है।

केंद्र सरकार की मुख्य दलीलें और संवैधानिक पक्ष

  1. ऐतिहासिक एवं सामाजिक पिछड़ापन मुख्य आधार: केंद्र ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 341 (SC), अनुच्छेद 342 (ST) और अनुच्छेद 342A (SEBC/OBC) के तहत जातियों/जनजातियों की पहचान उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर की गई है।
    • SC: अस्पृश्यता (Untouchability) का ऐतिहासिक दंश और सामाजिक असमानता।
    • ST: विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन।
    • OBC: सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन तथा सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व।
    सरकार ने कहा कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित इन सूचियों में केवल संसद (Parliament) ही संशोधन कर सकती है।
  2. क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत SC/ST पर लागू नहीं: केंद्र ने इंद्रा साहनी (Indra Sawhney), ई.वी. चिन्नैया (E.V. Chinnaiah), एम. नागराज (M. Nagaraj) और अशोक कुमार ठाकुर (Ashoka Kumar Thakur) मामलों में सुप्रीम कोर्ट के ही ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा:हलफनामे का अंश: “क्रीमी लेयर (आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग को बाहर करने) का सिद्धांत केवल OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित किया गया है। इसे SC और ST श्रेणियों पर लागू नहीं किया जा सकता।”
  3. कल्याणकारी योजनाओं में पहले से ‘मीन्स टेस्ट’ (Means Test) लागू: 정부(केंद्र) ने कहा कि शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण को छोड़कर, SC/ST और OBC के लिए चल रही अन्य विभिन्न कल्याणकारी/छात्रवृत्ति योजनाओं में पहले से ही आय सीमा (‘मीन्स टेस्ट’) शामिल है ताकि लाभ पात्रों तक पहुंचे।
  4. नीतिगत ढांचा और एंपीरिकल डेटा की आवश्यकता: सरकार ने तर्क दिया कि आरक्षण के भीतर आय-आधारित प्राथमिकताओं को पेश करने के लिए सभी लाभार्थी श्रेणियों का व्यापक सामाजिक-आर्थिक डेटा एकत्र करना और वैज्ञानिक अध्ययन (Empirical Study) करना आवश्यक है, जिसे अदालत के निर्देश से सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं की मांग क्या थी?

इन याचिकाओं में मांग की गई है कि आरक्षण का लाभ आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक अधिक समान रूप से पहुंचे और एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू किया जाए। पिछले साल 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने रमाशंकर प्रजापति और अन्य लोगों द्वारा दायर पीआईएल पर नोटिस जारी किया था, जिसमें इसे लागू करने का निर्देश मांगा गया था। 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उपाध्याय की एक पीआईएल पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। उपाध्याय ने तर्क दिया था कि जिन मामलों में एससी-एसटी परिवार के किसी सदस्य ने पहले ही कोई संवैधानिक या वरिष्ठ सरकारी पद हासिल कर लिया है, ऐसे व्यक्ति के बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

बिंदुवार समझें: केंद्र का जनहित याचिका का किया विरोध

  • केंद्र ने उन जनहित याचिकाओं का विरोध किया है, जिनमें एससी-एसटी के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ के नियम को लागू करने और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की ज्यादा निष्पक्ष व्यवस्था के लिए आय के आधार पर बदलाव करने की मांग की गई है।
  • सरकार ने कहा कि इन जनहित याचिकाओं में संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों के किसी भी उल्लंघन का जिक्र नहीं है। कहीं भी यह खास तौर पर नहीं कहा गया है कि क्रीमी लेयर का नियम एससी-एसटी पर लागू होता है। क्रीमी लेयर की अवधारणा का जिक्र ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) / एसईबीसी (सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग) के आरक्षण के संबंध में एक सामान्य टिप्पणी जैसा है।
  • सरकार ने अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत केवल अन्य ओबीसी और एसईबीसी के लिए है। एससी-एसटी पर यह लागू नहीं होता। हलफनामे में कहा गया है कि यदि आरक्षण नीति में आय के आधार पर कोई बदलाव करना हो तो उससे पहले सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के आधार पर व्यापक अध्ययन जरूरी होगा। ऐसी नीति बनाना सरकार का अधिकार है और अदालत सरकार को किसी खास तरह की नीति बनाने का आदेश नहीं दे सकती।
  • सरकार ने याचिकाओं को कानून के अनुसार सुनवाई योग्य नहीं बताते हुए उन्हें खारिज करने की मांग की है। साथ ही कहा कि एससी, एसटी और अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण की ज्यादातर सरकारी योजनाओं में पहले से ही आय का मानदंड रखा गया है, ताकि जरूरतमंद लोगों तक लाभ पहुंच सके। हालांकि शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण पर यह नियम लागू नहीं है।
  • बदलाव का अधिकार संसद के पास : केंद्र ने हलफनामे में यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत एससी-एसटी की सूची में बदलाव करने का अधिकार केवल संसद के पास है। कोई राज्य सरकार, अदालत या अन्य संस्था इस सूची में बदलाव नहीं कर सकती।
  • 1992 में बना क्रीमी लेयर नियम : मालूम हो, क्रीमी लेयर का नियम सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में अपने मशहूर मंडल मामले के फैसले में बनाया था। इसके तहत पिछड़े वर्गों के कुछ संपन्न लोगों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले के लिए आरक्षण से बाहर कर दिया गया था।

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