Sunday, November 8, 2026
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Compulsory Rural Service: एमबीबीएस छात्रों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा पर बने एक समान राष्ट्रीय नीति…केंद्र सरकार सुझाव पर दिशानिर्देश बनाएं

केस एवं कानूनी सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अलोक अराधे
विवादित कानूनKarnataka Compulsory Service Training Act, 2012 & Notification (2023)
मुख्य मुद्दाक्या निजी कॉलेजों से महंगी फीस देकर MBBS करने वाले छात्रों पर भी अनिवार्य ग्रामीण सेवा बॉन्ड लागू होना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट का रुखसंपूर्ण देश के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा पर एक समान राष्ट्रीय नीति (Uniform National Policy) बनाने का प्रस्ताव।
अगली कार्रवाईकेंद्र सरकार 3 सप्ताह के भीतर पूरे भारत के लिए राष्ट्रीय नीति पर अपना रुख स्पष्ट करेगी।

Compulsory Rural Service: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के मेडिकल छात्रों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा (Compulsory Rural Service) को लेकर एक समान राष्ट्रीय नीति (Uniform National Policy) बनाने का सुझाव दिया है।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक अराधे की पीठ कर्नाटक सरकार की एक अधिसूचना को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस अधिसूचना के तहत कर्नाटक मेडिकल काउंसिल के साथ स्थायी पंजीकरण (Permanent Registration) प्राप्त करने के लिए मेडिकल छात्रों को 1 वर्ष की अनिवार्य सार्वजनिक ग्रामीण सेवा पूरी करना अनिवार्य किया गया है। शीर्ष अदालत की इस पहल पर केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल ने पूरे भारत के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार करने पर केंद्र से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करने पर सहमति व्यक्त की है।

सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  1. राष्ट्र निर्माण और राज्य की सब्सिडी का दायित्व: सुनवाई की शुरुआत में न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने विषय के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण में मेडिकल छात्रों का भी महत्वपूर्ण योगदान और दायित्व है:न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की टिप्पणी: “यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण नीति है, क्योंकि राज्यों की सब्सिडी के बिना किसी भी समय मेडिकल शिक्षा पूरी नहीं होती। यदि हम राज्यों की सब्सिडी को छोड़ भी दें, तो भी चिकित्सा का विज्ञान और तकनीक देश की एक ऐसी संपत्ति (Resource) है, जिसका उपयोग जनहित में राज्य द्वारा किया जाना अनिवार्य है।”
  2. निजी सीटों के छात्रों के लिए भी ग्रामीण सेवा क्यों नहीं? मई 2024 में नोटिस जारी करते समय पीठ ने सवाल उठाया था कि निजी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने से छूट क्यों दी जानी चाहिए। पीठ का मानना है कि चिकित्सा के पेशे से जुड़े हर छात्र को राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

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कर्नाटक सरकार के नियम और याचिकाकर्ता का तर्क

  • कर्नाटक का नियम (2012 अधिनियम और 2015 नियम): कर्नाटक सरकार के नियमों के अनुसार सरकारी सीट या सरकारी विश्वविद्यालयों से एमबीबीएस (MBBS), पोस्ट-ग्रेजुएट (MD/MS) और सुपर स्पेशलिटी पूरा करने वाले हर डॉक्टर के लिए 1 साल की अनिवार्य ग्रामीण सेवा देना जरूरी है। इसके बिना ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) और स्थायी रजिस्ट्रेशन जारी नहीं किया जाता।
  • विवादित अधिसूचना (28.07.2023): 28 जुलाई 2023 को जारी अधिसूचना के जरिए राज्य सरकार ने इस अनिवार्य ग्रामीण सेवा के नियम को निजी व डीम्ड यूनिवर्सिटीज की निजी सीटों (Private Seats) पर पढ़ने वाले छात्रों पर भी लागू कर दिया।
  • याचिकाकर्ता की दलील:
    • निजी सीटों पर भारी फीस देकर पढ़ाई करने वाले छात्रों की तरफ से तर्क दिया गया कि वे संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) के तहत एक अलग वर्ग (Intelligible Differentia) में आते हैं। इसलिए उन पर जबरन बॉन्ड या सेवा की शर्त नहीं थोपी जानी चाहिए।
    • याचिकाकर्ताओं ने ‘एसोसिएशन ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी एस्पिरेंट्स बनाम भारत संघ’ मामले के पुराने फैसले का हवाला देते हुए मांग की कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सेवा आयुक्तालय को बिना किसी अनिवार्य ग्रामीण सेवा हलफनामे के उन्हें NOC जारी करने और कर्नाटक मेडिकल काउंसिल को स्थायी रजिस्ट्रेशन देने का निर्देश दिया जाए।

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश और अगला कदम

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पूरे देश में राज्यों द्वारा अलग-अलग और कठोर शर्तें थोपने के बजाय केंद्र सरकार को एक पैन-इंडिया (Pan-India) एक समान नीति बनानी चाहिए।

  • अदालत का आदेश: “विद्वान सॉलिसिटर जनरल ने नीति बनाने की आवश्यकता पर निर्देश प्राप्त करने के लिए मामले को तीन सप्ताह के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया है। मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करें।”

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