Saturday, August 8, 2026
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Arrears of Land Revenue: नगर निकाय किराए की बकाया राशि को भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल नहीं कर सकते…दीवानी मुकदमा में जाएं

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
प्रासंगिक कानूनयूपी नगर पालिका अधिनियम, 1916 (धारा 173-A) एवं यूपी पब्लिक मनी एक्ट, 1972
मुख्य कानूनी सिद्धांतकिराए की बकाया राशि एक ‘अनुबंधात्मक देनदारी’ (Contractual Due) है, ‘कर’ (Tax) नहीं; इसलिए इसे भू-राजस्व के बकाए की तरह वसूल नहीं किया जा सकता।
अदालत का आदेश14 सितंबर 2009 का रिकवरी साइटेशन रद्द (Quashed); नगर पालिका को दीवानी मुकदमे (Civil Suit) के जरिए वसूली का विकल्प खुला रखा।

Arrears of Land Revenue: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई नगर पालिका परिषद अपने किरायेदारों से किराए की बकाया राशि (Arrears of Rent) को ‘भू-राजस्व के बकाए’ की तरह वसूल नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने यह फैसला रामपुर की ‘नगर पालिका परिषद, तहसील स्वार’ के एक किरायेदार द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। अदालत ने कहा कि किराए का बकाया एक अनुबंधात्मक देनदारी (Contractual Due) है, कोई ‘कर’ (Tax) नहीं।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  1. दुकान का आवंटन और कब्जा
    • रामपुर की स्वार तहसील स्थित नगर पालिका परिषद की एक दुकान याचिकाकर्ता को 1998 में 15 साल के पट्टे (Lease) पर आवंटित की गई थी, लेकिन दुकान का कब्जा नवंबर 2006 में दिया गया।
    • नगर पालिका ने बोर्ड के प्रस्ताव से तय किया कि किराया नवंबर 2006 से लागू होगा और याचिकाकर्ता ने हर महीने नियमित रूप से किराया जमा करना शुरू कर दिया।
  2. जिलाधिकारी के निर्देश पर रिकवरी नोटिस
    • जिलाधिकारी (DM) के आदेश पर नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी (Executive Officer) ने याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर नवंबर 2006 से पहले की अवधि (जब कब्जा नहीं मिला था) का ₹1,07,800 किराया जमा करने को कहा।
    • इसके बाद तहसीलदार स्वार (रामपुर) ने 14 सितंबर 2009 को भू-राजस्व के बकाए के रूप में राशि वसूलने के लिए रिकवरी साइटेशन (Recovery Citation) जारी कर दिया।

हाई कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत

  1. यूपी नगर पालिका अधिनियम, 1916 की धारा 173-A का दायरा
    • पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 173-A के तहत केवल ‘कर’ (Tax) के बकाए को ही भू-राजस्व के बकाए की तरह वसूलने के लिए कलेक्टर से अनुरोध किया जा सकता है।
    • न्यायालय का रुख:“यदि यह मान भी लिया जाए कि संबंधित किराया नगर पालिका का बकाया था, तो भी 1916 के अधिनियम की धारा 173-A के स्पष्ट प्रावधानों को देखते हुए इसे भू-राजस्व के बकाए के रूप में वसूल नहीं किया जा सकता।”
  2. ‘पब्लिक मनी रिकवरी एक्ट, 1972’ लागू नहीं होता
    • नगर पालिका ने तर्क दिया था कि यह राशि ‘यूपी पब्लिक मनी (रिकवरी ऑफ ड्यूज) एक्ट, 1972’ की धारा 3 के तहत वसूली योग्य है।
    • कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नगर पालिका न तो राज्य सरकार है और न ही इस अधिनियम के तहत परिभाषित कोई निगम। किराए का बकाया पूरी तरह से एक संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) राशि है, न कि ‘सार्वजनिक धन’ (Public Money)।
  3. पुराने मिसाल (Precedent) का हवाला
    • पीठ ने इसी नगर पालिका से जुड़े नंद किशोर बनाम कलेक्टर/जिलाधिकारी, रामपुर मामले का हवाला दिया, जिसमें खंडपीठ ने तय किया था कि अधिनियम की धारा 166 से 173 के तहत किराए के बकाए को भू-राजस्व के रूप में वसूलने की अनुमति नहीं है।
  4. दीवानी मुकदमा ही एकमात्र कानूनी विकल्प
    • अदालत ने माना कि यूपी ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (UP ZA & LR Act) की धारा 279/280 के तहत रिकवरी साइटेशन जारी करना कानूनी रूप से गलत था।
    • हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नगर पालिका यदि चाहे तो मियाद कानून (Limitation Act) की सीमाओं के भीतर सिविल कोर्ट में दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर कर इस राशि की वसूली कर सकती है।

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