केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति आलोक मेहरा (उत्तराखंड उच्च न्यायालय) |
| संबंधित प्रावधान | दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (CrPC Section 125 / BNSS) – पत्नी का भरण-पोषण |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | पति द्वारा लिए गए पर्सनल लोन या सैलरी डिडक्शन पत्नी को मेंटेनेंस देने से छूट नहीं देते; मेंटेनेंस पति के जीवन स्तर और आय के अनुपातिक होना चाहिए। |
| अदालत का निर्णय | पारिवारिक अदालत का आदेश संशोधित; गुजारा भत्ता ₹10,000 से बढ़ाकर ₹15,000 प्रति माह किया गया। |
Maintenance To Wife: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति द्वारा लिए गए पर्सनल या व्हीकल लोन उसकी अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताएं हैं, जो उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी को गुजारा भत्ता (Maintenance) देने के वैधानिक दायित्व से ऊपर नहीं हो सकतीं।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकल पीठ ने 4 अगस्त 2026 के अपने आदेश में पारिवारिक अदालत (Family Court) के 2021 के आदेश को संशोधित करते हुए महिला का मासिक गुजारा भत्ता ₹10,000 से बढ़ाकर ₹15,000 कर दिया। अदालत ने माना कि पत्नी अपने पति के सामाजिक स्तर और जीवन शैली के अनुरूप सम्मानजनक जीवन जीने की हकदार है।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- व्यक्तिगत लोन कानूनी दायित्वों से बढ़कर नहीं:“उत्तरदाता संख्या 2 (पति) द्वारा दिए गए ऋण/लोन व्यक्तिगत वित्तीय प्रतिबद्धताएं हैं और वे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी का भरण-पोषण करने के उसके वैधानिक दायित्व को समाप्त या कम नहीं कर सकते। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि पत्नी अपने पति की स्थिति, आय और जीवन स्तर के अनुकूल मेंटेनेंस पाने की हकदार है।”
- योग्यता होना कमाने का सबूत नहीं: अदालत ने माना कि यद्यपि महिला पढ़ी-लिखी (MSc, BEd) है, लेकिन वर्तमान में उसके पास आय का कोई स्वतंत्र व स्थिर साधन नहीं है। केवल उच्च शिक्षित होना ही मेंटेनेंस देने से मना करने का आधार नहीं बन सकता।
मामला क्या था? (Case Background)
- शावाहिक विवाद और फैमिली कोर्ट का फैसला
- याचिकाकर्ता महिला का विवाह मई 2017 में हुआ था। वैवाहिक विवादों के कारण उसे ससुराल छोड़ना पड़ा और वह अपनी बहन के साथ रहने लगी।
- महिला ने CrPC की धारा 125 के तहत पारिवारिक अदालत का रुख किया। नवंबर 2021 में फैमिली कोर्ट ने उसे ₹10,000 प्रति माह मेंटेनेंस देने का आदेश दिया, जिसे महिला ने बेहद अपर्याप्त बताते हुए हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) दायर कर चुनौती दी।
- दोनों पक्षों के तर्क
- पत्नी का पक्ष (अधिवक्ता राज कुमार सिंह): पति स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में अधिकारी है और उसकी मासिक सैलरी लगभग ₹83,154 है। पति के पिता पेंशनभोगी (लगभग ₹30,000 पेंशन) हैं और दो भाई सरकारी सेवा में हैं, इसलिए उस पर परिवार का कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं है।
- पति का पक्ष (अधिवक्ता भुवन भट्ट): पति की ग्रॉस सैलरी ₹83,154 है, लेकिन त्यौहार लोन और कार लोन की किस्तों के कटने के बाद उसके पास केवल ₹53,000 इन-हैंड बचते हैं। इसके अलावा उसने दावा किया कि पत्नी शिक्षित है और उसके बैंक खातों में जमा राशि से साबित होता है कि वह कमा रही है।
- बैंक खातों और खर्चों पर कोर्ट का निष्कर्ष
- पत्नी ने स्पष्ट किया कि बैंक खाते में आए पैसे उसके माता-पिता द्वारा दिए गए थे, जो उसकी स्वतंत्र आय नहीं है।
- इसके विपरीत, पति ने फैमिली कोर्ट में खुद स्वीकार किया था कि उसका अपना व्यक्तिगत मासिक खर्च ही लगभग ₹15,000 है।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने माना कि पति की वित्तीय क्षमता, एसबीआई अधिकारी के रूप में उसकी नियमित आय और उसके स्वयं के खर्चों को देखते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय किया गया ₹10,000 का मेंटेनेंस अपर्याप्त था।
अदालत ने पत्नी की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए मासिक गुजारा भत्ता ₹10,000 से बढ़ाकर ₹15,000 प्रति माह कर दिया।

