केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय अदालत | अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित कुमार ग्रोवर (जिला एवं सत्र अदालत, चंडीगढ़) |
| संबंधित कानून | BNS (धोखाधड़ी), Prevention of Corruption Act एवं UAPA/Arms Act (मूल केस) |
| आरोपी पर आरोप | हाई कोर्ट जज का फर्जी आदेश दिखाकर ₹10.77 लाख ठगने का आरोप |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | केवल ठगी गई राशि का आंशिक भुगतान या वापसी की पेशकश गंभीर आपराधिक धोखाधड़ी के मामलों में जमानत पाने का आधार नहीं बन सकती। |
| अदालत का निर्णय | जमानत याचिका खारिज (Bail Application Dismissed)। |
Offer By Advocate: चंडीगढ़ की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने कड़े यूएपीए (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत जेल में बंद एक आरोपी को जमानत दिलाने के नाम पर ₹10.77 लाख रुपये ठगने के आरोपी वकील की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) अमित कुमार ग्रोवर ने 3 अगस्त 2026 को याचिका खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने ऑनलाइन माध्यम से प्राप्त ₹5.77 लाख वापस जमा कराने की वकील की पेशकश को ठुकराते हुए कहा कि चूंकि आरोपी खुद एक कानून का जानकार वकील है, इसलिए उसके द्वारा सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने और गवाहों को प्रभावित करने की प्रबल संभावना है।
चंडीगढ़ अदालत की मुख्य टिप्पणियां
- वकील होने के नाते गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम:“चूंकि आरोपी एक पेशेवर वकील है, इसलिए आरोपी द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ करने और अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित करने की पूरी संभावना है।”
- रकम वापसी जमानत का आधार नहीं: अदालत ने आरोपी द्वारा ₹5.77 लाख की ऑनलाइन राशि फिक्स डिपाजिट (FDR) के रूप में जमा करने के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा:“भले ही आरोपी ऑनलाइन प्राप्त ₹5,77,000 की राशि जमा कराने के लिए तैयार हो, लेकिन यह उसे जमानत देने का आधार नहीं बन सकता क्योंकि उस पर कुल ₹10,77,000 हड़पने का आरोप है। इसके अलावा, केवल ठगे गए पैसे वापस करने की पेशकश अपने आप में जमानत पाने का वैधानिक आधार नहीं बन सकती।”
मामला क्या था? (Case Background)
- मामले की पृष्ठभूमि और एफआईआर
- मई 2026 में सेक्टर 39 पुलिस स्टेशन (चंडीगढ़) में पुष्पविंदर बग्गा की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) के तहत लोक सेवक के नाम पर रिश्वतखोरी का मामला दर्ज है।
- आरोपी वकील को 7 जुलाई 2026 को गिरफ्तार किया गया था और वह तब से हिरासत में है।
- ठगी का तरीका और फर्जी आदेश
- शिकायतकर्ता और उसकी बहन (जसप्रीत कौर) का भाई बलजीत सिंह 2024 से बुरैल जेल में बंद है।
- आरोप है कि वकील ने बलजीत को यूएपीए केस में जमानत दिलाने का झांसा देकर उनसे ₹5.77 लाख ऑनलाइन और ₹5 लाख नकद (कुल ₹10.77 लाख) लिए।
- वकील ने अपने मोबाइल फोन पर हाई कोर्ट के जज द्वारा पारित एक कथित ‘जमानत आदेश’ (Bail Order) दिखाया। हालांकि, उस आदेश पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं थी और वह संदिग्ध लगा। बाद में पता चला कि ऐसी कोई जमानत याचिका उस कोर्ट में लंबित ही नहीं थी।
- बचाव पक्ष (Defence) के तर्क
- आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि उसे झूठा फंसाया गया है और ली गई राशि केवल ‘वकील की फीस’ (Counsel Fee) थी।
- उन्होंने कहा कि वकील एक नया प्रैक्टिसिंग एडवोकेट है और उसने अपनी कम अनुभव की बात पहले ही बताई थी, लेकिन शिकायतकर्ता के जोर देने पर उसने केस लिया।
- आरोपी ने बिना शर्त केस के परिणाम तक ₹5.77 लाख ऑनलाइन राशि IO के पास जमा कराने की पेशकश की और दलील दी कि “जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद” (Bail is a rule and jail is an exception)।
- अभियोजन पक्ष (Prosecution) के तर्क
- अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी बेहद चालाक है और उसने माननीय हाई कोर्ट के जजों के नाम का दुरुपयोग करके पैसे ऐंठे हैं।
- आरोपी के पास से 3 मोबाइल फोन और 1 लैपटॉप बरामद किए गए हैं जिन्हें फोरेंसिक जांच (CFSL Sector 36) के लिए भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट आना अभी बाकी है।
⚖️ अदालत का अंतिम निष्कर्ष
अदालत ने माना कि झूठे मामले में फंसाए जाने का दावा मुकदमे (Trial) के दौरान तय किया जाएगा, न कि जमानत के चरण पर। हाई कोर्ट के जजों के नाम पर फर्जीवाड़ा करने, डिजिटल साक्ष्यों की फोरेंसिक रिपोर्ट पेंडिंग होने और गवाहों पर प्रभाव डालने की आशंका को देखते हुए चंडीगढ़ कोर्ट ने आरोपी वकील की जमानत याचिका पूरी तरह खारिज कर दी।

