केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ) |
| याचिकाकर्ता | हसन अहमद (मृतक कर्मचारी रिफाकत हुसैन के पुत्र) |
| उत्तरदाता | ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार |
| संबंधित नियमावली | UP Recruitment of Dependants of Govt Servants Dying in Harness Rules, 1974 |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | वर्क-चार्ज कर्मचारियों के नियमितीकरण का अधिकार सेवा में मृत्यु के बाद खत्म नहीं होता; वारिस अनुकंपा नियुक्ति व अन्य लाभों के हकदार हैं। |
| अदालत का निर्णय | याचिका स्वीकार; पात्रता तिथि से नियमितीकरण का आदेश, अनुकंपा नियुक्ति पर 2 माह में निर्णय का निर्देश और ₹50,000 की कॉस्ट। |
Dying in Harness Rules: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों के रवैये को “प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण” (Ex-facie Contemptuous) करार देते हुए एक बड़ा आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की एकल पीठ ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को यह आदेश सुनाया। अदालत ने निर्देश दिया है कि ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग (Rural Engineering Department) के एक मृत वर्क-चार्ज कर्मचारी को उसकी पात्रता (Eligibility) की तिथि से नियमित (Regularised) माना जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवा के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाने से नियमितीकरण का उसका अर्जित अधिकार (Accrued Right) समाप्त नहीं होता, और उसके कानूनी वारिस इस अधिकार को आगे बढ़ा सकते हैं।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- अर्जित अधिकार मृत्यु से खत्म नहीं होता:“एक बार जब नियमितीकरण पर विचार किए जाने का अधिकार अर्जित हो जाता है, तो प्रक्रिया पूरी होने से पहले केवल कर्मचारी की मृत्यु हो जाने से वह अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसा अधिकार कानूनी प्रतिनिधियों (Legal Representatives) के माध्यम से बना रहता है।”
- अधिकारियों के रवैये पर सख्त रुख व जुर्माना: अदालत ने पूर्व आदेशों की अवहेलना करने पर अधिकारियों को फटकार लगाई और 17 मार्च 2023 के प्रशासनिक आदेश को बाध्यकारी दिशानिर्देशों के विपरीत माना।लंबे समय तक मुकदमेबाजी में घसीटने और बार-बार आदेशों का उल्लंघन करने के कारण हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को ₹50,000 की लागत (Cost) अधिकारियों से दिलाने का आदेश दिया।
मामला क्या था? (Case Background)
- 27 साल की सेवा और 2012 में मृत्यु
- यह याचिका हसन अहमद द्वारा दायर की गई थी। उनके पिता रिफाकत हुसैन को 1 नवंबर 1985 को हरदोई में ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग में वर्क-चार्ज जूनियर असिस्टेंट के रूप में नियुक्त किया गया था।
- 18 वर्षों से अधिक की सेवा देने के बाद 11 अगस्त 2012 को उनका निधन हो गया था।
- नियमितीकरण के लिए 2005 में तैयार की गई वरिष्ठता सूची (Seniority List) में उनका नाम 58वें स्थान पर था।
- पद स्वीकृत लेकिन प्रक्रिया में देरी
- वर्ष 2012 में दैनिक वेतनभोगी, वर्क-चार्ज और कोर्ट-केस कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए 172 ग्रुप-सी पद स्वीकृत किए गए थे।
- नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही रिफाकत हुसैन का निधन हो गया, जबकि उनके साथ के अन्य समकक्ष कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया था।
- अनुकंपा नियुक्ति और नियमितीकरण से इनकार
- अधिकारियों ने यह कहते हुए उनके बेटे के दावे को बार-बार खारिज कर दिया था कि कर्मचारी का निधन नियमित होने से पहले हुआ था। इस प्रशासनिक आदेश को चुनौती देते हुए बेटे ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- पात्रता तिथि से नियमितीकरण: हाई कोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि रिफाकत हुसैन को उनकी पात्रता की तिथि से नियमित कर्मचारी माना जाए और तदनुसार सभी सेवा/पेंशनरी लाभ दिए जाएं।
- अनुकंपा नियुक्ति पर विचार (Compassionate Appointment): अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता (बेटे) के अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर ‘उत्तर प्रदेश मृतक सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली, 1974’ (Dying in Harness Rules, 1974) के तहत विचार किया जाए।
- समय सीमा: पूरी प्रक्रिया को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के 2 महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया गया है। आदेश की प्रति ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग के सचिव, निदेशक और मुख्य अभियंता को भेजने का आदेश जारी हुआ।

