केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन एवं न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल (मद्रास हाई कोर्ट) |
| केस साइटेशन | 2026 LiveLaw (Mad) 376 |
| संबंधित निकाय | मदुराई बेंच ऑफ मद्रास हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (MMBA) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | 1. लिखित नियमों में संशोधन किए बिना सदस्यों के वोट देने या चुनाव लड़ने का अधिकार छीना नहीं जा सकता। 2. “Deemed Restriction” या काल्पनिक प्रतिबंध का सिद्धांत वैधानिक अधिकारों पर लागू नहीं होता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका खारिज; चुनाव अधिकारी का फैसला सही ठहराया गया और परिणाम घोषित करने का आदेश। |
One Bar, One Vote: मद्रास हाईकोर्ट ने वकीलों की संस्थाओं और बार एसोसिएशनों के चुनावों के संबंध में एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी बार एसोसिएशन के सदस्य को “एक बार, एक वोट” (One Bar, One Vote) के सिद्धांत का हवाला देकर मतदान करने या चुनाव लड़ने से तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक कि उस एसोसिएशन ने अपने लिखित नियमों (Rules) में संशोधन करके ऐसा प्रतिबंध न लगाया हो।
न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की पीठ ने स्पष्ट किया कि कानूनी अधिकारों पर कोई “काल्पनिक” या “माना गया” (Deemed) प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की, हमारा मानना है कि किसी भी नियम का काल्पनिक (Deemed) अनुप्रयोग नहीं हो सकता। यह काल्पनिक अवधारणा किसी सदस्य के उस अधिकार का उल्लंघन करेगी जो उसे वैधानिक नियमों से मिलता है। किसी नियम को संशोधित किया जा सकता है, संशोधन द्वारा अधिकार को प्रतिबंधित किया जा सकता है; लेकिन जब नियम स्पष्ट रूप से ऐसे अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं करता, तो किसी सदस्य के अधिकार को प्रतिबंधित नहीं माना जा सकता।
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🏛️ हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां
- स्वेच्छा से नियमों में संशोधन न करने का निर्णय
- पीठ ने कहा कि कानून के जानकार होने के नाते बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को यह अच्छी तरह पता होता है कि अधिकारों को सीमित करने के लिए नियमों का संशोधन अनिवार्य है।
- ‘मदुराई बेंच ऑफ मद्रास हाई कोर्ट बार एसोसिएशन’ (MMBA) ने अपने नियमों में “एक बार, एक वोट” का प्रतिबंध न जोड़ने का एक विचारपूर्वक और जानबूझकर फैसला लिया था। जब सदस्य मौजूदा नियमों से संतुष्ट थे और कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया, तो सदस्यों को केवल इसलिए वोट डालने से नहीं रोका जा सकता कि उन्होंने किसी अन्य एसोसिएशन के चुनाव में मतदान किया है।
- एसोसिएशन की सदस्यता और अधिकारों की सुरक्षा
- अदालत ने नोट किया कि प्रतिवादी वकील भले ही डिफ़ॉल्ट रूप से ‘विमेन एडवोकेट एसोसिएशन’ (WAA) के सदस्य बने थे, लेकिन उन्होंने विधिवत शुल्क चुकाकर और प्रक्रिया पूरी करके MMBA की सदस्यता हासिल की थी।
- एक बार जब कोई वकील किसी एसोसिएशन में सदस्य के रूप में शामिल कर लिया जाता है, तो वह उस एसोसिएशन के नियमों के तहत मिलने वाले सभी अधिकारों (वोट देने और चुनाव लड़ने) का हकदार हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- चुनाव याचिका और विवाद
- यह याचिका चित्रादेवी (जो MMBA चुनाव में महासचिव पद की उम्मीदवार थीं) द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने मदुराई बेंच बार एसोसिएशन (MMBA) के चुनावों में कुछ महिला उम्मीदवारों की उम्मीदवारी और मतदान अधिकारों को चुनौती दी थी।
- याचिकाकर्ता का तर्क था कि व्यक्तिगत प्रतिवादी पहले से ही ‘विमेन एडवोकेट एसोसिएशन’ (WAA) में पद धारण किए हुए थीं, इसलिए “एक बार, एक वोट” के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए उन्हें MMBA चुनाव लड़ने या वोट देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।
- बार काउंसिल का रुख
- बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु एंड पुडुचेरी ने याचिकाकर्ता का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि BCI Certificate and Place of Practice (Verification) Rules 2015 के ‘फॉर्म-ए’ में केवल एक ही बार एसोसिएशन का नाम दर्ज किया जा सकता है, इसलिए एक वकील एक से अधिक एसोसिएशन के लिए मतदान नहीं कर सकता।
- अदालत का अंतिम फैसला
- हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि BCI वेरिफिकेशन नियमों के बावजूद, जब तक संबंधित बार एसोसिएशन (MMBA) स्वयं अपने संविधान/नियमों में संशोधन कर प्रतिबंध नहीं लगाती, तब तक चुनाव अधिकारी (Election Officer) द्वारा नामांकन स्वीकार करना पूरी तरह वैध है।
- अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और रोके गए चुनाव परिणामों को तुरंत घोषित करने के निर्देश दिए।

