Wednesday, August 12, 2026
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Launch Break: क्या काम के दौरान लंच ब्रेक में हुआ हादसा एम्प्लॉयमेंट कानून के तहत कवर है?…जवाब हैं हां, ₹7.86 लाख मुआवजे का हुआ निर्देश

केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
मुख्य कानूनकर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (Employees’ Compensation Act, 1923)
कानूनी सिद्धांतकार्यस्थल पर भोजन/लंच ब्रेक का समय रोजगार का ही हिस्सा माना जाएगा; केवल पदनाम से कर्मचारी का दर्जा खत्म नहीं होता।
मुआवजा राशि₹7.86 लाख + 22 जुलाई 2010 से 12% वार्षिक ब्याज
अदालत का अंतिम फैसलाबीमा कंपनी की याचिका खारिज; पीड़ित के पक्ष में फैसला बरकरार।

नई Launch Break: दिल्ली हाईकोर्उट (Delhi High Court) ने काम के दौरान सुरक्षा और कर्मचारियों के अधिकारों पर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने 23 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और 16 साल लंबे कानूनी संघर्ष के बाद पीड़ित कर्मचारी (यशपाल) को 12% ब्याज के साथ ₹7.86 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने फैसला सुनाया कि कार्यस्थल पर लंच ब्रेक के दौरान हुआ हादसा भी ‘रोजगार के दौरान और उससे उत्पन्न’ (Arising out of and in the course of employment) माना जाएगा।

हादसे की पृष्ठभूमि (2010 की घटना)

  1. घटना: 22 जून 2010 को दिल्ली के भलस्वा में स्थित एक कंस्ट्रक्शन साइट पर ‘सुपरवाइजर’ के रूप में कार्यरत यशपाल अपने लंच ब्रेक के दौरान खाना खा रहे थे। तभी एक क्रेन से लोहे की भारी छड़ उनके ऊपर गिर गई, जिससे उनका बायां पैर काटना पड़ा।
  2. शुरुआती आदेश (2016): कर्मचारी मुआवजा आयुक्त (Commissioner of Employees’ Compensation), दिल्ली ने 2016 में एम्प्लॉइज कम्पेन्सेशन एक्ट, 1923 के तहत यशपाल के पक्ष में ₹7.86 लाख मुआवजा और 22 जुलाई 2010 से 12% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था।
  3. बीमा कंपनी का विरोध: बीमा कंपनी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी और भुगतान से बचने के लिए कई तर्क दिए—जैसे लंच ब्रेक का काम से संबंध न होना, केवल ‘सुपरवाइजर’ होने के कारण उन्हें कर्मचारी न मानना, और 75% आय क्षमता के नुकसान पर सवाल उठाना।

दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष (High Court’s Key Rulings)

न्यायालय ने बीमा कंपनी के सभी तर्कों को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किए।

  1. लंच ब्रेक रोजगार का हिस्सा है (Nexus with Employment)
    • कोर्ट ने कहा कि भोजन करने के लिए लिया गया एक अस्थायी ब्रेक (Temporary Break) रोजगार और दुर्घटना के बीच के संबंध (Nexus) को समाप्त नहीं करता है। चूंकि हादसा कार्यस्थल (Worksite) पर हुआ और कर्मचारी वहां अपनी ड्यूटी के सिलसिले में मौजूद था, इसलिए इसे रोजगार के दौरान हुआ हादसा ही माना जाएगा।
  2. केवल पद (Designation) तय नहीं करता कि कोई ‘कर्मचारी’ है या नहीं
    • बीमा कंपनी की दलील थी कि ‘सुपरवाइजर’ धारा 2(dd) के तहत ‘कर्मचारी’ (Employee) की परिभाषा में नहीं आते।
    • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ‘सुपरवाइजर’ पदनाम दे देने से कोई व्यक्ति कर्मचारी के दायरे से बाहर नहीं हो जाता। कोर्ट पद के नाम के बजाय वास्तविक काम की प्रकृति (Actual Nature of Work) को देखती है।
  3. 75% विकलांगता और मेडिकल साक्ष्य की स्वीकृति
    • पैर कटने के कारण आय क्षमता में 75% नुकसान के दावे पर बीमा कंपनी की आपत्तियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कमिश्नर द्वारा स्वीकार किए गए मेडिकल साक्ष्यों को पूरी तरह सही माना।

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