Tuesday, September 29, 2026
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Electricity Connection: अनाधिकृत कब्जाधारी हैं तो क्या हुआ…बिजली सेवा से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता; यह बात बिजली कंपनी जान लें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति शम्पा सरकार एवं न्यायमूर्ति अर्जुन राय मुखर्जी
संबंधित कंपनीकलकत्ता इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कॉर्पोरेशन (CESC) लिमिटेड
संविधानिक प्रावधानअनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
मुख्य सिद्धांतबेदखली मुकदमे के लंबित रहने के बावजूद कब्ज़ाधारी को बिजली दी जाएगी; हालांकि इससे मालिकाना हक नहीं बनेगा।
अंतिम आदेशCESC को 3 सप्ताह के भीतर महिला को बिजली कनेक्शन देने का निर्देश।

Electricity Connection: कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कलकत्ता इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कॉर्पोरेशन (CESC) लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह एक महिला को तीन सप्ताह के भीतर बिजली का नया कनेक्शन प्रदान करे।

न्यायमूर्ति शम्पा सरकार (Justice Shampa Sarkar) और न्यायमूर्ति अर्जुन राय मुखर्जी (Justice Arjun Ray Mukherjee) की पीठ ने जून 2022 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) के तहत बिजली एक अनिवार्य आवश्यकता (Essential Commodity) है, और जब तक सिविल कोर्ट द्वारा बेदखली (Eviction) का आदेश नहीं दिया जाता, तब तक किसी भी कब्जाधारी को बिजली से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

  1. बिजली और गरिमापूर्ण जीवन (Article 21):“यह कानून में अच्छी तरह से स्थापित है कि एक अनाधिकृत कब्जाधारी (Trespasser) भी बिजली पाने का हकदार है, जो कि एक आवश्यक वस्तु है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है, और बिजली की आपूर्ति गरिमापूर्ण अस्तित्व के साथ मौलिक रूप से जुड़ी हुई है।”
  2. मालिकाना हक (Title/Equity) पर कोई प्रभाव नहीं:
    • अदालत ने स्पष्ट रूप से स्पष्ट किया कि महिला को बिजली कनेक्शन देने से संपत्ति पर उसका कोई कानूनी मालिकाना हक, स्वत्व (Title) या इक्विटी (Equity) स्थापित नहीं होगा।
    • यह कनेक्शन भविष्य में सक्षम सिविल कोर्ट (Civil Court) द्वारा बेदखली मुकदमे में आने वाले अंतिम फैसले के अधीन रहेगा।
  3. जिला मजिस्ट्रेट (DM) के क्षेत्राधिकार का दायरा:
    • सिंगल जज ने महिला को जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने का निर्देश दिया था।
    • डिविजन बेंच ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जिला मजिस्ट्रेट केवल तब हस्तक्षेप कर सकते हैं जब बिजली कंपनी को किसी तीसरे पक्ष की संपत्ति से होकर लाइन बिछानी हो। यहां महिला स्वयं उस संपत्ति पर कब्जे का दावा कर रही थी, इसलिए DM के पास जाने की आवश्यकता नहीं थी।

मामले का बैकग्राउंड (Case Background)

  • विवाद की वजह: महिला ने संपत्ति पर कब्जे के अधिकार का दावा करते हुए CESC से नए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया था। मकान मालिकों/निजी उत्तरदाताओं के कड़े विरोध के कारण CESC ने आवेदन पर कार्रवाई रोक दी थी।
  • मकान मालिक का पक्ष: मकान मालिकों का तर्क था कि महिला जिस ट्रांसफर एग्रीमेंट का हवाला दे रही है, वह कानूनी रूप से अमान्य और फर्जी दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि महिला का संपत्ति पर कोई कानूनी हक नहीं है और उसके खिलाफ बेदखली का मुकदमा लंबित है।
  • महिला का तर्क: महिला के वकीलों (तारक नाथ हलदर, सांगनिक चटर्जी और सायन मुखर्जी) ने तर्क दिया कि फिलहाल संपत्ति का उपयोग न होने के बावजूद बिजली के बिना वहां रहना या उपयोग करना असंभव है, और केवल मकान मालिक के विरोध के कारण बिजली रोकी नहीं जा सकती।

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