Thursday, August 13, 2026
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Gender-Neutral: BNS में धारा 377 का न होना विधायी मामला, अदालतें नया अपराध ‘रचित’ नहीं कर सकतीं…लिंग-निरपेक्ष बलात्कार कानून की मांग, जानें

मामला सारांश (Overview Table)

विधिक बिंदुविवरण
माननीय अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठ (Bench)मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया
मुख्य मुद्दाBNS में IPC धारा 377 का न होना और पुरुषों/ट्रांसजेंडरों के लिए लिंग-निरपेक्ष बलात्कार कानून की मांग।
कोर्ट का रुखनया अपराध बनाना संसद का काम है, अदालतें कानून में नई धाराएं नहीं जोड़ सकतीं।
अगली सुनवाईअक्टूबर 2026 (समान याचिकाओं के साथ टैग किया गया)।

Gender-Neutral: दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) से पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 को हटाए जाने के बाद उत्पन्न हुए ‘विधिक शून्य’ (Legal Vacuum) को भरना विधायिका (Legislature) का काम है। अदालतें न्यायिक आदेश (Judges’ Fiat) के जरिए कोई नया अपराध नहीं बना सकतीं।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने BNS के तहत बलात्कार और यौन अपराधों से जुड़ी धाराओं को लिंग-निरपेक्ष (Gender-Neutral) बनाने या संसद को इसमें संशोधन का निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

🏛️ दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां

  1. अपराध परिभाषित करना संसद/विधायिका का क्षेत्राधिकार
    • खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की चिंता से सहमति जताते हुए कहा: “हम आपकी चिंता समझते हैं, लेकिन ये विधायी नीति (Legislative Policy) के मामले हैं… अपराध को परिभाषित करना विधायिका का अधिकार है। क्या हम ऐसा कुछ लागू कर सकते हैं जो संसद ने प्रदान ही न किया हो? क्या हम न्यायिक आदेश से कोई नया अपराध बना सकते हैं?”
  2. महिलाओं के खिलाफ अपराधों का दायरा नहीं बदला जा सकता
    • याचिकाकर्ताओं द्वारा BNS की धारा 63 से 81 (जो महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित हैं) को सभी लिंगों पर लागू करने की मांग पर कोर्ट ने कहा: “IPC की धारा 377 को हटाए जाने के कारण जो समस्या आ रही है, उसे दूर करने के लिए आप महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लक्षित कर रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध हमेशा से महिलाओं के विरुद्ध थे। प्राकृतिक/अप्राकृतिक अपराधों की एक अलग श्रेणी थी जिसे हटा दिया गया है। आप संविधान के अनुच्छेद 14 का उपयोग करके महिलाओं के अपराधों को बदलकर उस गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते।”

⚖️ क्या है मुख्य विवाद? (The Core Legal Controversy)

  1. IPC की धारा 377 का इतिहास
    • IPC धारा 377 पुरुषों, महिलाओं या पशुओं के साथ गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंधों (Non-consensual intercourse/Bestiality) को अपराध मानती थी।
    • नवतेज सिंह जोहर (2018) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन गैर-सहमति से बनाए गए यौन संबंधों, नाबालिगों से जुड़े मामलों और पशुओं के साथ क्रूरता (Bestiality) पर यह धारा लागू रहती थी।
  2. BNS में प्रावधान का न होना
    • 1 जुलाई 2024 से लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) से धारा 377 को पूरी तरह हटा दिया गया।
    • इसके परिणामस्वरूप, पुरुषों, ट्रांसजेंडरों और गैर-द्विआधारी (Non-binary) व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले गैर-सहमति वाले यौन अपराधों/बलात्कार को कवर करने के लिए BNS में कोई कठोर धारा नहीं बची है।

कानूनी विशेषज्ञों और याचिकाकर्ताओं की चिंताएं

  • कानूनी शून्य (Legal Vacuum): याचिकाकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों (जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर) के अनुसार, धारा 377 के हटने से यदि किसी पुरुष या ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ जबरन यौन कृत्य होता है, तो आरोपी पर बलात्कार का मामला दर्ज नहीं हो सकता। पुलिस को साधारण चोट (Hurt or Grievous Hurt) की धाराओं का सहारा लेना पड़ेगा, जिनमें सजा काफी कम होती है।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 की सीमाएं: यद्यपि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में यौन शोषण का प्रावधान है, लेकिन उसमें केवल 6 महीने से 2 साल तक की सजा का ही नियम है, जो बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के लिए अपर्याप्त है।

अदालत का मुख्य निष्कर्ष: न्यायपालिका कानून की व्याख्या कर सकती है, लेकिन जब कानून बनाने वाली संस्था (संसद) ने किसी प्रावधान को हटा दिया हो, तो अदालतें अपनी ओर से कोई नया अपराध ‘रचित’ करके उस खाली जगह को नहीं भर सकतीं। इसके लिए विधायी संशोधन आवश्यक है।

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