Tuesday, September 29, 2026
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Regularise Unauthorised Constructions: अवैध निर्माणों के नियमितीकरण पर कोई ठोस नीति बन सकती है…विचार के दिए आदेश, पढ़ें

मामला सारांश (At a Glance)

विधिक बिंदुविवरण
माननीय अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ (Bench)CJI सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना
याचिकाकर्तासेंटर फॉर लॉ एंड Good Governance
मुख्य मुद्दाअनाधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने और बुलडोजर कार्रवाई/ध्वस्तीकरण के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग
अदालत का फैसलाकोर्ट स्वयं पूरे देश के लिए नीति नहीं बनाएगा; राज्यों/UTs को अपने स्तर पर नीतिगत विचार करने का निर्देश।
मुख्य कानूनी सुरक्षाध्वस्तीकरण से पूर्व न्यूनतम 15 दिनों का नोटिस और कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य।

Regularise Unauthorised Constructions: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने देश भर में वर्षों पुराने अनाधिकृत/अवैध निर्माणों (Unauthorised Constructions) को नियमित (Regularise) करने और उन्हें ध्वस्त करने के संदर्भ में एक समान नीति (Uniform Policy) बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सीधे आदेश देने से इनकार कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट किया कि अवैध निर्माण और ध्वस्तीकरण का मुद्दा मुख्य रूप से राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों (Municipalities) के नीतिगत अधिकार क्षेत्र (Policy Domain) में आता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे इस संबंध में एक उचित नीति बनाने या अपनी मौजूदा नीतियों की समीक्षा करने पर विचार करें।

🏛️ सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष एवं टिप्पणियां

  1. एक समान राष्ट्रीय नीति (Uniform Policy) व्यावहारिक नहीं
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक राज्य की भौगोलिक स्थिति, परिस्थितियां और जमीनी हकीकत अलग-अलग होती हैं। इसलिए पूरे देश के लिए एक ही नीति ढांचा तय करना न तो व्यावहारिक है और न ही बुद्धिमानी।
    • पीठ ने कहा: “अलग-अलग राज्यों में लागू करने के लिए इस अदालत द्वारा एक समान नीति ढांचा तैयार करना कठिन और अनुचित होगा। हालांकि, सक्षम प्राधिकारी अपनी नीतियां बनाते या संशोधित करते समय याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर सकते हैं।”
  2. अदालतें कार्यपालिका के नीतिगत दायरे में अतिक्रमण नहीं कर सकतीं
    • न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहतें अत्यधिक व्यापक हैं और कोर्ट द्वारा इस तरह के निर्देश देना कार्यपालिका (Executive) के अधिकारों में दखल देना होगा।
    • उन्होंने नोट किया कि अवैध निर्माण हमेशा केवल गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से जुड़े नहीं होते; कई बार ये व्यावसायिक या लाभ कमाने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं।
  3. ‘ओल्गा टेलिस’ सिद्धांत और 15 दिनों का नोटिस अनिवार्य
    • मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने ऐतिहासिक ‘ओल्गा टेलिस’ मामले का हवाला देते हुए अदालत के मानवीय दृष्टिकोण को दोहराया: “कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को जो लंबे समय से किसी स्थान पर रह रहा है, उसे बिना उचित कानूनी प्रक्रिया (Due Process) के बेदखल नहीं किया जा सकता।”
    • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी अनधिकृत कब्जे को हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति/परिवार को कम से कम 15 दिनों का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य है ताकि वे अपना पक्ष रख सकें या कानूनी उपाय तलाश सकें।

⚖️ याचिकाकर्ता का पक्ष एवं चिंताएं

  • असंगत दृष्टिकोण और अचानक ध्वस्तीकरण: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि राज्य सरकारें अनाधिकृत कॉलोनियों के प्रति विरोधाभासी रुख अपनाती हैं। नगर निगम वर्षों तक बिजली, पानी की सुविधाएं और टैक्स वसूलते रहते हैं और नियमितीकरण का आश्वासन देते हैं, लेकिन 40-50 साल बाद अचानक बिना किसी पुनर्वास (Rehabilitation) योजना के संपत्तियों को ध्वस्त कर दिया जाता है।
  • अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: याचिका में कहा गया कि ध्वस्तीकरण एक अंतिम और अपरिवर्तनीय कदम है। बिना पुनर्वास योजना के अचानक कार्रवाई करना संविधान के अनुच्छेद 21 (आश्रय, आजीविका और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन है।

जानिए ओल्गा टेलिस (Olga Tellis) मामला (1985)

ओल्गा टेलिस (Olga Tellis) मामला (1985) और सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर/ध्वस्तीकरण दिशा-निर्देश (2024) दोनों ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और निष्पक्ष प्रक्रिया (Due Process) के स्तंभ हैं।

1. ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985)

यह मामला मुंबई की पटरियों और झुग्गियों में रहने वाले लोगों को बिना किसी पूर्व सूचना या पुनर्वास के हटाए जाने के खिलाफ दायर किया गया था।

  • आजीविका का अधिकार (Right to Livelihood): सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ (5 जजों) ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में “आजीविका का अधिकार” भी शामिल है। जीवन केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि सम्मानजनक आजीविका कमाना है।
  • प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (Natural Justice): भले ही अतिक्रमण अवैध हो, लेकिन अधिकारियों को हटाने से पहले प्रभावित लोगों को सुनवाई का अवसर (Opportunity of Hearing) और उचित नोटिस देना अनिवार्य है।
  • मानवीय दृष्टिकोण और पुनर्वास: अदालत ने कहा कि राज्य को गरीबों के साथ मानवीय रवैया अपनाना चाहिए और संभव हो तो पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए।

2. सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर/ध्वस्तीकरण संबंधी दिशा-निर्देश (2024)

नवंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ) ने आरोपी या अपराधी होने के नाम पर बिना कानूनी प्रक्रिया के संपत्तियों को गिराने (तथाकथित ‘बुलडोजर न्याय’) को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया।

चरणसुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य दिशा-निर्देश
कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice)किसी भी संपत्ति को गिराने से पहले मालिक/अधिभोगी को कम से कम 15 दिन पहले पंजीकृत डाक या दीवार पर चिपकाकर नोटिस देना अनिवार्य है।
व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing)प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और अवैध निर्माण को नियमित (Regularize) या ठीक करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा।
कारण सहित लिखित आदेश (Speaking Order)अधिकारी को लिखित रूप में बताना होगा कि निर्माण क्यों अवैध है और गिराना ही एकमात्र विकल्प क्यों है।
अपील का अवसर (Time for Appeal)अंतिम आदेश जारी होने के बाद भी कम से कम 15 दिनों तक कोई ध्वस्तीकरण नहीं होगा, ताकि व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटा सके।
वीडियो रिकॉर्डिंग (Videography)पूरी ध्वस्तीकरण प्रक्रिया की अनिवार्य रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी।
जवाबदेही और मुआवज़ामनमाने तरीके से घर गिराने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के वेतन से हर्जाना वसूला जाएगा और उनके खिलाफ अवमानना (Contempt) की कार्रवाई होगी।

महत्वपूर्ण अपवाद: यदि कोई अवैध निर्माण सार्वजनिक सड़कों, रेलवे लाइनों, फुटपाथों या जल निकायों (Waterbodies) पर हुआ है और यातायात/सुरक्षा के लिए तत्काल खतरा है, या किसी अदालत ने सीधे आदेश दिया है, तो ये समय-सीमा के नियम लागू नहीं होंगे।

मूल निष्कर्ष: दोनों ही फैसलों का मुख्य संदेश यह है कि कार्यपालिका खुद जज या सजा देने वाली संस्था नहीं बन सकती; चाहे फुटपाथ का अतिक्रमण हो या कानून का उल्लंघन, संविधान में ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (Due Process of Law) का पालन करना अनिवार्य है।

अदालत का मुख्य संदेश

अवैध निर्माणों पर कार्रवाई करते समय कानून के प्रवर्तन और नागरिकों के आश्रय/आजीविका के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन होना चाहिए। राज्य सरकारें और नगर निगम नीति बनाने के लिए अधिकृत हैं, लेकिन बिना पूर्व नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के अचानक ध्वस्तीकरण नहीं किया जा सकता।

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