मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- 40 साल की फरारी और सरकारी नौकरी: याचिकाकर्ता का पति 1983 में हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। उसे दिसंबर 1983 में पैरोल मिली और 18 मार्च 1984 को वापस जेल में आत्मसमर्पण करना था। हालांकि, वह वापस नहीं लौटा और 40 सालों तक फरार रहा। इस दौरान उसने धोखाधड़ी से सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की, 2004 में ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ (Best Teacher) का पुरस्कार जीता और 2013 में सेवानिवृत्त (Retire) भी हो गया।
- 2024 में गिरफ्तारी: मई 2024 में एक विशेष कार्य बल (Special Task Force) ने उसे गिरफ्तार कर फिर से जेल भेजा।
- जेल प्रशासन पर कोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा कि 40 साल तक किसी दोषी का न पकड़ा जाना और बिना रुकावट सरकारी सेवा देना जेल अधिकारियों की ढिलाई और निगरानी की कमी को दर्शाता है। इससे अन्य कैदियों को भी पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने का बढ़ावा मिल सकता है।
- धोखाधड़ी से प्राप्त किया लाभ: अदालत ने कहा कि दोषी ने जानबूझकर अपनी सजा और पहचान को छिपाया, अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय जेल से बाहर बिताया और सभी सरकारी लाभ उठाए।
- चिकित्सा आधार पर राहत से इनकार: कोर्ट ने मेडिकल ग्राउंड पर पैरोल की मांग को भी खारिज कर दिया और कहा कि जेल में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं।
हैदराबाद: तेलंगाना हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए एक 73 वर्षीय दोषी की नई पैरोल याचिका खारिज कर दी है, जो 1984 में पैरोल मिलने के बाद फरार हो गया था और अगले 40 वर्षों तक गिरफ्तारी से बचता रहा। इस दौरान उसने धोखे से सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की, 2004 में ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड जीता और 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद आखिरकार मई 2024 में पकड़ा गया।
दोषी की पत्नी द्वारा 3 साल तक पैरोल और फर्लो पर लगी रोक के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी की एकल पीठ ने जेल प्रशासन की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की निगरानी के लिए विशेष टास्क फोर्स और सख्त ट्रैकिंग तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियां
पीठ ने जेल प्रशासन और पुलिस निगरानी की विफलता पर टिप्पणी करते हुए कहा: “एक कैदी को 40 वर्षों तक ट्रैक न कर पाना—जिस दौरान वह सरकारी नौकरी हासिल करता है और बिना किसी रुकावट के सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा पूरी करता है—बिना गार्ड के पैरोल दिए जाने पर कैदियों पर नजर रखने के जेल अधिकारियों के प्रयासों पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। इस तरह की लापरवाही अन्य कैदियों को भी पैरोल से अधिक रुकने और इस प्रकार के धोखे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।”
दोषी के आचरण पर अदालत ने कहा: “याचिकाकर्ता का पति अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख समय जेल से बाहर बिताने में सफल रहा और उसने सभी सुविधाओं का लाभ उठाया। उसका सरकारी शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्ति तक काम करना दर्शाता है कि उसने जानबूझकर अपनी सजा और आपराधिक पृष्ठभूमि को छुपाकर धोखे से सरकारी नौकरी हासिल की।”
Best Teacher Truth: मामले की पृष्ठभूमि और 40 साल की फरारी
- 1983 में उम्रकैद व पहली पैरोल: दोषी को 1983 में हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उसे 17 दिसंबर 1983 को 30 दिनों के लिए पैरोल दी गई, जिसे बाद में 17 मार्च 1984 तक बढ़ाया गया।
- 18 मार्च 1984 को समर्पण से इनकार: दोषी को 18 मार्च 1984 को जेल में आत्मसमर्पण करना था, लेकिन वह वापस नहीं लौटा और फरार हो गया।
- सरकारी सेवा और ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड: फरारी के दौरान उसने अपनी पहचान छुपाकर सरकारी शिक्षक की नौकरी प्राप्त की। वर्ष 2004 में उसे ‘बेस्ट टीचर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वह 2013 में बिना किसी कानूनी रुकावट के सेवानिवृत्त हो गया।
- मई 2024 में गिरफ्तारी: फरारी के चार दशक बाद, 16 मई 2024 को विशेष टास्क फोर्स (STF) ने उसे गिरफ्तार कर दोबारा सेंट्रल जेल भेजा।
पैरोल पर रोक और पत्नी की दलीलें
- जेल प्रशासन की दंडात्मक कार्रवाई: आत्मसमर्पण न करने और 40 साल फरार रहने के कारण जेल प्रशासन ने उसकी 27 दिनों की अर्जित छूट (Remission) जब्त कर ली और अगले 3 वर्षों के लिए पैरोल व फर्लो के आवेदन पर प्रतिबंध लगा दिया।
- पत्नी के तर्क: पत्नी ने इस दंडात्मक आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि अधिकारियों ने 40 वर्षों की अत्यधिक और अस्पष्ट देरी के बाद कार्रवाई की है। साथ ही 73 वर्ष की आयु और खराब स्वास्थ्य (Medical Grounds) का हवाला देकर पैरोल की मांग की।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए दलील दी:
- पैरोल कैदियों का कोई पूर्ण या मौलिक अधिकार नहीं है।
- पैरोल की शर्तों का जानबूझकर उल्लंघन करने पर नियमों के अनुसार सजा और पैरोल प्रतिबंध की कार्रवाई पूरी तरह वैध है।
- जेल के भीतर वृद्ध कैदी के इलाज के लिए सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं।
अदालत का अंतिम आदेश और सुधार के निर्देश
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने मेडिकल आधार पर पैरोल की मांग खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि जेल में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं।
अदालत ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए कि:
- पैरोल और फर्लो पर बाहर जाने वाले कैदियों की समय-सीमा पूरी होने पर उनकी वापसी सुनिश्चित करने के लिए विशेष टास्क फोर्स (STF) और व्यापक दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।
- ऐसा सुदृढ़ ट्रैकिंग तंत्र (Tracking Mechanism) बनाया जाए जिससे भविष्य में कोई भी कैदी कानूनी व्यवस्था को धोखा देकर इस तरह पैरोल का दुरुपयोग न कर सके।
तदनुसार, उच्च न्यायालय ने दोषी की पत्नी द्वारा दायर याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की: “बिना गार्ड के पैरोल पर छोड़े गए कैदियों पर नजर रखने में जेल अधिकारियों के प्रयास बेहद कमजोर नजर आते हैं। अदालत राज्य सरकार को निर्देश देती है कि वह पैरोल पर छूटे कैदियों की सख्त निगरानी के लिए आवश्यक दिशानिर्देश और विशेष टास्क फोर्स का गठन करे ताकि समय सीमा समाप्त होने पर उनकी वापसी सुनिश्चित की जा सके।” हाईकोर्ट ने दोषी की पत्नी की याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए जेल नियमों के तहत दी गई सजा को जायज ठहराया।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय (Telangana High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी (Justice T. Madhavi Devi) |
| मामला/अपराध | 1983 के हत्या मामले में उम्रकैद की सजा पाए कैदी का पैरोल जंप करना |
| फरारी की अवधि | 40 वर्ष (मार्च 1984 से मई 2024 तक) |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; पैरोल पर गए कैदियों की निगरानी के लिए दिशानिर्देश और टास्क फोर्स बनाने का आदेश। |

