Tuesday, August 4, 2026
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Principle of Seniority: सीनियरिटी की अनदेखी का आरोप…हिमाचल प्रदेश के न्यायिक अधिकारी कोलेजियम की सिफारिशों के खिलाफ क्यों, समझिए

Principle of Seniority: देश की उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की कोलेजियम प्रणाली (Collegium System) और उसमें वरिष्ठता के सिद्धांत को लेकर एक नया विधिक विवाद खड़ा हो गया है।

धर्मशाला के फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने दायर की याचिका

हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाकर सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा हाल ही में की गई तीन जजों की पदोन्नति (Elevation) की सिफारिशों को विधिक चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि कोलेजियम ने उनसे जूनियर (कनिष्ठ) अधिकारियों के नामों की सिफारिश करके उनके विधिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। यह रिट याचिका धर्मशाला के फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश (Principal Judge) अरविंद मल्होत्रा द्वारा दायर की गई है।

विवाद की पृष्ठभूमि (3 जून की कोलेजियम सिफारिशें)

यह पूरा प्रशासनिक और विधिक विवाद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा हाल ही में लिए गए एक निर्णय के बाद शुरू हुआ है।

कोलेजियम का फैसला: 3 जून (2026) को सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) में जज के रूप में पदोन्नति के लिए तीन न्यायिक अधिकारियों के नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी।

अनुशंसित नाम: कोलेजियम द्वारा अनुशंसित तीन अधिकारियों में चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल के नाम शामिल हैं।

वरिष्ठता की अनदेखी का दावा: याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा का विधिक तर्क है कि वे इन अनुशंसित अधिकारियों से वरिष्ठ हैं, लेकिन कोलेजियम ने उनके नाम पर विचार न करके उनके ‘पदोन्नति के लिए विचार किए जाने के मौलिक/विधिक अधिकार’ (Right of Consideration) का हनन किया है।

सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई की मांग

जब यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ के समक्ष त्वरित सूचीबद्धता (Urgent Listing) के लिए उल्लेखित (Mentioned) किया गया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने गंभीर विसंगति की ओर ध्यान आकर्षित किया।

वकील ने दलील दी कि कोलेजियम द्वारा सीधे तौर पर जूनियर अधिकारियों के नामों को आगे बढ़ाना स्थापित न्यायिक प्रक्रियाओं के खिलाफ है। मामले की गंभीरता और वैधानिक संकट को देखते हुए, CJI सूर्य कांत ने याचिका को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर अपनी सहमति दे दी है।

पुरानी विधिक नजीर: 2024 में भी हुआ था ऐसा ही विवाद

उच्च न्यायपालिका में हिमाचल प्रदेश के ही न्यायिक अधिकारियों द्वारा वरिष्ठता की अनदेखी को चुनौती देने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले वर्ष 2024 में भी ऐसा ही एक बड़ा विधिक विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

2024 का मामला: हिमाचल प्रदेश में तैनात दो जिला जजों (District Judges) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि हाई कोर्ट कोलेजियम ने जजों की पदोन्नति की सिफारिश करते समय उनकी योग्यता और वरिष्ठता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को स्वीकार कर लिया था। शीर्ष अदालत ने तब एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया था कि वे उन वरिष्ठ जिला जजों के नामों पर दोबारा निष्पक्षता से विचार (Reconsider) करें।

विधिक सारांश (Case Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण एवं वर्तमान स्थिति
याचिकाकर्ताअरविंद मल्होत्रा (प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, धर्मशाला)।
प्रतिवादीसुप्रीम कोर्ट कोलेजियम / केंद्र सरकार।
मुख्य विधिक आपत्ति३ जून २०२६ की कोलेजियम सिफारिशों में कनिष्ठ (Junior) अधिकारियों को प्राथमिकता देना।
अनुशंसित अधिकारीचिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल।
अदालत का रुखCJI सूर्य कांत की पीठ ने मामले की तत्काल गंभीरता को देखते हुए इसे लिस्ट करने की मंजूरी दी है।
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