Thursday, June 18, 2026
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Hospitality Sector: ₹151 का सर्विस चार्ज वसूलने पर रेस्टोरेंट को यूं लगा झटका…खबर पढ़कर जागो ग्राहक जागो

Hospitality Sector: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (जालंधर) ने देश के आतिथ्य सत्कार क्षेत्र और रेस्टोरेंट उद्योग में ‘सर्विस चार्ज’ (Service Charge) की विधिक स्थिति को स्पष्ट किया।

ग्राहकों की पूर्व सहमति के बगैर कार्रवाई पर सुनवाई

उपभोक्ता फोरम ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों की पूर्व सहमति (Prior Consent) के बिना फूड बिल में जबरन सर्विस चार्ज या ‘स्टाफ कंट्रीब्यूशन’ जोड़ना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) की श्रेणी में आता है। आयोग की अध्यक्ष हरवीन भारद्वाज और सदस्य ज्योत्स्ना व जसवंत सिंह ढिल्लों की पीठ ने 4 जून 2026 को वकील संजीव दुग्गल द्वारा दायर एक शिकायत पर यह फैसला सुनाया। फोरम ने ‘माया इन्स प्राइवेट लिमिटेड’ (रेस्टोरेंट) को आदेश दिया है कि वह उपभोक्ता को मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में ₹15,000 और वसूला गया सर्विस चार्ज ब्याज सहित वापस करे।

यह रहा आयोग का विधिक निष्कर्ष

उपभोक्ता आयोग ने अपने विधिक निष्कर्ष में कहा, यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि विपक्षी पार्टी (रेस्टोरेंट) ने उपभोक्ता की सहमति के बिना सर्विस चार्ज वसूला। भले ही इसके लिए ‘स्टाफ कंट्रीब्यूशन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए, फिर भी रेस्टोरेंट का यह विधिक कर्तव्य है कि वह ग्राहकों को इसके बारे में पहले से स्पष्ट रूप से सूचित करे। बिना पूर्व सहमति ऐसा कोई भी शुल्क वसूलना अनुचित व्यापार व्यवहार है।”

मामला क्या था? (नवंबर 2023 की डिनर नाइट्स और ₹151 का विवाद)

यह विधिक विवाद जालंधर के एक रेस्टोरेंट और पेशे से वकील संजीव दुग्गल के बीच हुआ।

जबरन वसूली का आरोप: एडवोकेट संजीव दुग्गल नवंबर 2023 में अपने परिवार के साथ बुफे डिनर के लिए रेस्टोरेंट गए थे। बिल आने पर उन्होंने देखा कि रेस्टोरेंट ने उनकी सहमति के बिना दो अलग-अलग बिलों में 3 प्रतिशत की दर से क्रमशः ₹128.13 और ₹23.40 (कुल ₹151.53) सर्विस चार्ज के रूप में जोड़ दिए हैं।

बदतमीजी का दावा: शिकायतकर्ता का आरोप था कि जब उन्होंने इस अनिवार्य शुल्क और गलत बुफे बिलिंग (वयस्क/नाबालिग गणना) पर आपत्ति जताई, तो रेस्टोरेंट के स्टाफ ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, उनकी शिकायत का निवारण नहीं किया और कानूनी रास्ता चुनने पर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी।

रेस्टोरेंट का विधिक तर्क: रेस्टोरेंट के वकील आई.एस. भाटिया ने दलील दी कि यह चार्ज वास्तव में ‘स्टाफ कंट्रीब्यूशन’ (कर्मचारी सहयोग राशि) था, जिसका जिक्र मेन्यू कार्ड में पहले से था और यदि ग्राहक अनुरोध करता, तो इसे हटाया (Waive) जा सकता था।

उपभोक्ता फोरम का विधिक विश्लेषण: ‘मेन्यू कार्ड’ का बहाना खारिज

अदालत ने रेस्टोरेंट के ‘मेन्यू कार्ड प्रकटीकरण’ और ‘स्वैच्छिक छूट’ के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत सामने रखे।

स्पष्ट और अचूक सूचना का अभाव

फोरम ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद पाया कि रेस्टोरेंट यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि ग्राहक को ऑर्डर लेने से पहले ‘अनिवार्य सर्विस चार्ज/स्टाफ कंट्रीब्यूशन’ के बारे में स्पष्ट और असंदिग्ध तरीके (Clear and Unambiguous manner) से सूचित किया गया था। केवल मेन्यू में बारीक अक्षरों में लिख देना विधिक रूप से पर्याप्त नहीं है।

सबूतों का अभाव और दावों की सीमा

याचिकाकर्ता दुग्गल ने बिलिंग में गड़बड़ी, खराब गुणवत्ता के भोजन और स्टाफ द्वारा बदतमीजी के भी आरोप लगाए थे। हालांकि, आयोग ने माना कि इन दावों के समर्थन में शिकायतकर्ता ने कोई स्वतंत्र गवाह या समकालीन शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। इसलिए, फोरम ने अपना फैसला केवल अनिवार्य सर्विस चार्ज की विधिक अवैधता तक ही सीमित रखा।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुजिला उपभोक्ता आयोग, जालंधर का अंतिम विधिक आदेश (जून 2026)
शिकायतकर्ताएडवोकेट संजीव दुग्गल (जिन्होंने अपना केस खुद लड़ा)।
विपक्षी पक्ष (OP)माया इन्स प्राइवेट लिमिटेड (Maya Inns Pvt. Ltd.)।
मुख्य विधिक निष्कर्षग्राहक की सहमति के बिना सर्विस चार्ज या स्टाफ कंट्रीब्यूशन वसूलना ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ है।
मूल धन की वापसीरेस्टोरेंट को ₹151.53 की पूरी राशि शिकायत दर्ज करने की तारीख से लागू ब्याज सहित वापस करनी होगी।
मुआवजा (Compensation)मानसिक तनाव, प्रताड़ना और मुकदमेबाजी के खर्च (Litigation Expenses) के बदले ₹15,000 का एकमुश्त हर्जाना।
कुल राहत और समय सीमारेस्टोरेंट को ब्याज छोड़कर कुल ₹15,151.53 का भुगतान आदेश मिलने के 45 दिनों के भीतर करना होगा।

रेस्टोरेंट उद्योग को एक कड़ा विधिक संदेश

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने 2022 में ही इसके खिलाफ गाइडलाइंस जारी की थीं, जिन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया था (जिसके खिलाफ अपील अभी लंबित है)। इस फैसले ने रेस्टोरेंट उद्योग को एक कड़ा विधिक संदेश दिया है कि वे ‘सर्विस चार्ज’ का नाम बदलकर ‘स्टाफ कंट्रीब्यूशन’ या कोई और तकनीकी नाम रख लें, यदि उसमें ग्राहक की मर्जी और पारदर्शिता शामिल नहीं है, तो कानूनन उन्हें हर्जाना भुगतना ही पड़ेगा।

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