Wednesday, August 5, 2026
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Arrest Memo: गिरफ्तारी के कारणों को आरोपी की भाषा में लिखना अनिवार्य…उड़ीसा डीजीपी को क्यों सर्कुलर जारी करने के लिए कहा

Arrest Memo: उड़ीसा हाईकोर्ट ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और आपराधिक न्याय प्रणाली के बीच संतुलन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी विधिक निर्णय सुनाया है।

तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर किसी बड़े अपराधी को राहत नहीं दी जा सकती

हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. संजीब कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने यह ऐतिहासिक विधिक निर्देश जारी किया है। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में भारी मात्रा में गांजा तस्करी के आरोपी की गिरफ्तारी और रिमांड को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकहित (Public Interest) की कीमत पर तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर किसी बड़े अपराधी को राहत नहीं दी जा सकती।

ओडिशा के सभी थानों को यह मिला निर्देश

अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे पूरे ओडिशा के सभी पुलिस थानों के लिए एक आधिकारिक सर्कुलर (Circular) जारी करें। इस सर्कुलर के तहत, अब से गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) में गिरफ्तारी के लिखित कारणों को अनिवार्य रूप से ऐसी भाषा में दर्ज करना होगा जिसे आरोपी व्यक्ति (Arrestee) अच्छी तरह समझता हो।

गांजा तस्करी का मामला और आरोपी की विधिक चुनौती

210 किलो गांजे की जब्ती: यह मामला भुवनेश्वर के मांचेस्वर पुलिस स्टेशन का है। पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए वाणिज्यिक मात्रा (Commercial Quantity – जो कि 20 किलो है) से कहीं अधिक, यानी 210 किलोग्राम और 410 ग्राम गांजा जब्त किया था। इस मामले में एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धारा 20(b)(ii)(C) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

गिरफ्तारी और रिमांड: जांच अधिकारी ने 15 मई 2025 को याचिकाकर्ता (आरोपी) को अरेस्ट मेमो जारी कर गिरफ्तार किया। अगले दिन उसे खुरदा (भुवनेश्वर) के सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) के सामने पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में भेज दिया गया।

तकनीकी आड़ में रिहाई की मांग: निचली अदालत और हाई कोर्ट से जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद, आरोपी ने धारा 420 CrPC (अब BNSS की धारा 528) के तहत एक नई याचिका दायर की। उसने सुप्रीम कोर्ट के प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य और विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए दलील दी कि उसे गिरफ्तारी के स्पष्ट और विस्तृत कारण नहीं सौंपे गए, बल्कि केवल “यांत्रिक और अस्पष्ट” (Vague & Mechanical) कारण दिए गए थे। इसलिए उसकी गिरफ्तारी और रिमांड को पूरी तरह अवैध घोषित कर रद्द किया जाए।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया और महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए।

तकनीकी आधार पर वैध अभियोजन को विफल नहीं किया जा सकता

जस्टिस पाणिग्रही ने आपराधिक न्याय प्रणाली में तकनीकी आपत्तियों के दुरुपयोग पर गंभीर टिप्पणी की। कहा, यह एक स्थापित विधिक सिद्धांत है कि ‘कानून की अज्ञानता को बहाना नहीं बनाया जा सकता’ (Ignorance of law is no excuse)। यदि इस तरह की दलीलों को नियमित रूप से स्वीकार किया जाने लगा, तो यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया को पूरी तरह से निष्प्रभावी और व्यर्थ (Otiose) बना देगा। इससे ऐसी स्थिति पैदा होगी जहां अपराधी कानूनी हिरासत से बचने के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों (Procedural Safeguards) का दुरुपयोग करेंगे, जिससे न्याय का मार्ग अवरुद्ध होगा और व्यापक जनहित प्रभावित होगा।”

अनुच्छेद 22(1) और गिरफ्तारी मेमो की विधिक अनिवार्यता

अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देने का मूल उद्देश्य यह है कि वह उन आरोपों से अवगत हो सके। वर्तमान मामले में, पुलिस द्वारा दिए गए अरेस्ट मेमो में आरोपों का पर्याप्त सार (Substance of Accusations) मौजूद था, जिसे आरोपी को सौंप दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए अरेस्ट मेमो से अलग कोई दूसरा दस्तावेज देना अनिवार्य नहीं है, और इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों का पर्याप्त रूप से अनुपालन हुआ है।

डीजीपी को कड़ा विधिक निर्देश: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाई कोर्ट ने नोट किया कि हाल के दिनों में तकनीकी आधार (जैसे गिरफ्तारी के कारण सही से न बताना या भाषा समझ न आना) का हवाला देकर मुकदमों और गिरफ्तारियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की बाढ़ आ गई है। इस विधिक विसंगति को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) का हवाला देते हुए ओडिशा के डीजीपी को निम्नलिखित आदेश दिया। कहा, ओडिशा के पुलिस महानिदेशक (DGP) तुरंत राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों और थानों के लिए एक अनिवार्य सर्कुलर जारी करें। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए, तो अरेस्ट मेमो के भीतर ही गिरफ्तारी के ठोस विधिक कारणों को ऐसी भाषा (क्षेत्रीय भाषा/मातृभाषा) में लिखा जाए जिसे वह आरोपी स्पष्ट रूप से समझता हो।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुउड़ीसा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय (2026)
साइटेशन (Citation)2026 LiveLaw (Ori) 59
माननीय न्यायाधीशडॉ. जस्टिस संजीब कुमार पाणिग्रही।
संबंधित विधिक धाराएंसंविधान का अनुच्छेद 22(1), एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(b), और धारा 47 BNSS (पूर्व में CrPC)।
मूल कानूनी मुद्दाक्या अरेस्ट मेमो में विस्तृत कारण न होने या भाषा समझ न आने पर 210 किलो गांजे के तस्कर की गिरफ्तारी रद्द हो सकती है?
अदालत का अंतिम निर्णयआरोपी की तकनीकी याचिका पूरी तरह खारिज। गिरफ्तारी और रिमांड विधिक रूप से वैध बरकरार।
सर्कुलर का निर्देशसुप्रीम कोर्ट के Mihir Rajesh Shah (2025) केस के तहत, आरोपियों को उनकी अपनी भाषा में लिखित कारण देना अब अनिवार्य।
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