Wednesday, August 5, 2026
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Seized Property: क्या मजिस्ट्रेट शर्तों के उल्लंघन के बिना और बिना नोटिस दिए पहले जारी अंतरिम रिहाई आदेश रद्द कर सकता है?…जवाब यहां पर है

Seized Property: उड़ीसा हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में जब्त संपत्तियों की अंतरिम कस्टडी या जिम्मा सौंपने और उसे रद्द करने के मजिस्ट्रेट के विधिक अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी है।

धारा 362 CrPC की न्यायिक व्याख्या

हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. संजीब कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि अंतरिम रिहाई के आदेश को केवल उसी स्थिति में रद्द किया जा सकता है जब जिम्मादार ने रिहाई की विधिक शर्तों (Conditions) का उल्लंघन किया हो या अदालत के साथ कोई धोखाधड़ी की हो। इसके अलावा किसी अन्य आधार पर आदेश बदलना आपराधिक अदालत पर लागू होने वाली धारा 362 CrPC (अपने ही फैसले की समीक्षा पर विधिक रोक) का सीधा उल्लंघन है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने कहा है कि यदि किसी मजिस्ट्रेट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 457 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 515) के तहत किसी पक्ष के पक्ष में वाहन या संपत्ति को अंतरिम रूप से रिहा करने का आदेश जारी कर दिया है, तो वह बाद में बिना जिम्मादार (Zimadar) को सुनवाई का उचित मौका दिए, एकतरफा ढंग से उस आदेश को रद्द या वापस (Cancel/Recall) नहीं कर सकता।

विवाद की पृष्ठभूमि: जेसीबी (JCB) मशीन का मालिकाना हक

यह पूरा मामला एक जेसीबी खुदाई मशीन (JCB Excavator) की खरीद-बिक्री और उसके बाद शुरू हुए आपराधिक मुकदमों से जुड़ा है।

सौदा और धोखाधड़ी का आरोप: प्रतिवादी नंबर 2 (OP-2) ने अपनी जेसीबी मशीन ₹13 लाख में याचिकाकर्ता (क्रेता) को बेची और कब्जा सौंप दिया। चूंकि याचिकाकर्ता को मशीन चलाने का अनुभव नहीं था, इसलिए दोनों के बीच सहमति बनी कि OP-2 ही इसे मैनेज करेगा और ₹50,000 मासिक किराया देगा। लेकिन OP-2 ने न तो किराया दिया और न ही मशीन लौटाई।

क्रॉस FIR और जब्ती: इसके बाद याचिकाकर्ता ने OP-2 के खिलाफ धोखाधड़ी (धारा 420/406 IPC) की एफआईआर दर्ज कराई, जिसके तहत पुलिस ने जेसीबी जब्त कर ली। इसके जवाब में OP-2 ने भी याचिकाकर्ता के खिलाफ जालसाजी और धोखाधड़ी की एक क्रॉस-एफआईआर दर्ज करा दी।

मजिस्ट्रेट का विरोधाभासी विधिक आदेश: शुरुआत में मजिस्ट्रेट (SDJM, कामाख्यानगर) ने 21 अगस्त 2023 को याचिकाकर्ता के पक्ष में कुछ शर्तों के साथ जेसीबी को अंतरिम रूप से रिहा (जिम्मा) करने का आदेश दिया। इसके बाद जांच अधिकारी (IO) ने मजिस्ट्रेट के सामने दो प्रार्थनाएं कीं। पहली, याचिकाकर्ता से जेसीबी का कब्जा लेकर OP-2 को सौंपना, और दूसरी, याचिकाकर्ता के पक्ष में जारी जिम्मा आदेश को रद्द करना।

मजिस्ट्रेट ने कब्जे वाली पहली मांग तो ठुकरा दी, लेकिन अजीबोगरीब ढंग से बिना याचिकाकर्ता को कोई नोटिस जारी किए या उसकी बात सुने, उसी दिन एक अलग आदेश (2 जनवरी 2025) जारी कर पहले दिया गया जिम्मा (Zimanama) रद्द कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में धारा 482 CrPC (अब BNSS की धारा 528) के तहत याचिका दायर की।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: प्राकृतिक न्याय और धारा 362 की लक्ष्मण रेखा

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट के इस कदम को पूरी तरह अधिकार-क्षेत्र से बाहर (Without Jurisdiction) और अवैध पाते हुए निम्नलिखित विधिक टिप्पणियां कीं।

‘ऑडी अल्टरम पार्टम’ (Audi Alteram Partem) का उल्लंघन

जस्टिस पाणिग्रही ने नोट किया कि 21 अगस्त 2023 को वाहन रिहा करने का आदेश एक अंतिम न्यायिक आदेश (Final Judicial Order) था, जिसे याचिकाकर्ता ने शर्तें पूरी कर प्राप्त किया था। कहा, “मजिस्ट्रेट ने बिना कोई नोटिस जारी किए, बिना याचिकाकर्ता से जवाब मांगे और यह पाए बिना कि याचिकाकर्ता ने रिहाई की किसी शर्त का उल्लंघन किया है, सीधे आदेश रद्द कर दिया। यह प्राकृतिक न्याय के सबसे बुनियादी सिद्धांत ‘दूसरे पक्ष को भी सुनो’ (Rule of Hearing) का गंभीर उल्लंघन है।”

अपने ही फैसले की समीक्षा (Review/Revision) पर विधिक रोक

अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने शर्तों के उल्लंघन के आधार पर आदेश रद्द नहीं किया, बल्कि जांच अधिकारी के कहने पर पूरे मामले के तथ्यों, सेल डीड, टैक्स इनवॉइस और एनओसी का दोबारा मूल्यांकन (Re-appreciate) करना शुरू कर दिया, जो कि एक तरह का ‘मिनी-ट्रायल’ था। कोर्ट ने कहा, “यह गुण-दोष (Merits) के आधार पर अपने ही पिछले अंतिम आदेश की समीक्षा और संशोधन करने जैसा है, जिसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 (Section 362 CrPC) के तहत स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित (Expressly Prohibited) किया गया है। केवल आवेदन का नाम ‘जिम्मा रद्द करने का आवेदन’ रख देने से कानून की इस वैधानिक रोक से नहीं बचा जा सकता।”

अदालत का अंतिम विधिक आदेश

उड़ीसा उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट (SDJM) द्वारा 2 जनवरी 2025 को पारित किए गए जिम्मा रद्दीकरण के आदेश को पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस मूल आदेश को पुनः बहाल (Resuscitated) कर दिया जिसके तहत जेसीबी मशीन याचिकाकर्ता को अंतरिम अभिरक्षा में सौंपी गई थी।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुउड़ीसा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय
माननीय न्यायाधीशडॉ. जस्टिस संजीब कुमार पाणिग्रही।
सम्बन्धित विधिक धाराएंधारा 457 और धारा 362 CrPC (अब क्रमशः धारा 515 और धारा 403 BNSS)।
विवाद का विषयक्या मजिस्ट्रेट शर्तों के उल्लंघन के बिना और बिना नोटिस दिए पहले जारी अंतरिम रिहाई आदेश रद्द कर सकता है?
प्रतिपादित विधिक सिद्धांतAudi Alteram Partem — जिम्मादार को सुने बिना कस्टडी रद्द करना अवैध है। एक बार आदेश होने पर स्वामित्व के विवाद को लेकर मजिस्ट्रेट स्वयं उसका रिव्यू नहीं कर सकता।
अदालत का अंतिम निर्णयमजिस्ट्रेट का रद्दीकरण आदेश अवैध घोषित; मूल जिम्मा आदेश बहाल।
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