Thursday, November 5, 2026
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Public Health: इलेक्ट्रो-होम्योपैथी कोई थेरेपी नहीं बल्कि विनियमित चिकित्सा पद्धति है, बिना रजिस्ट्रेशन प्रैक्टिस पर क्यों रोक लगाई…यहां जानिए

Public Health: केरल हाईकोर्ट ने चिकित्सा पद्धतियों के विधिक नियमन और जनस्वास्थ्य को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी विधिक व्यवस्था दी है।

त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल की ओर से अपील दायर

हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की खंडपीठ ने अपने विधिक निर्णय में ‘त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल’ द्वारा दायर अपील को मंजूर करते हुए एकल पीठ के पुराने आदेश को पूरी तरह पलट दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने वर्ष 2008 के एक पूर्ववर्ती डिवीजन बेंच के फैसले को कानून की अनदेखी करने के कारण पर इनक्यूरियम (Per Incuriam – असावधानीवश या विधिक भूल में दिया गया फैसला) घोषित कर दिया।

कोई भी व्यक्ति इलेक्ट्रो-होम्योपैथी की प्रैक्टिस नहीं कर सकता

अदालत ने स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी (Electro-Homeopathy) कोई साधारण थेरेपी (जैसे अरोमाथेरेपी या नेचरोपैथी) नहीं है, बल्कि यह चिकित्सा की एक श्रेणी है जो राज्य के वैधानिक कानूनों के तहत पूरी तरह विनियमित (Regulated) है। अदालत ने फैसला सुनाया कि बिना विधिक पंजीकरण (Registration) के कोई भी व्यक्ति इलेक्ट्रो-होम्योपैथी की प्रैक्टिस नहीं कर सकता।

विवाद की पृष्ठभूमि: पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ याचिका

यूपी का डिप्लोमा और केरल में प्रैक्टिस: यह विधिक विवाद कन्नूर के निवासी राजेश के. की एक याचिका से शुरू हुआ था। राजेश के. के पास ‘काउंसिल ऑफ इलेक्ट्रो होम्योपैथिक सिस्टम ऑफ मेडिसिन, कानपुर (उत्तर प्रदेश)’ द्वारा जारी इलेक्ट्रो-होम्योपैथिक चिकित्सा में एक डिप्लोमा सर्टिफिकेट था। उन्होंने केरल में अपनी प्रैक्टिस के दौरान पुलिस और मेडिकल काउंसिल के कथित हस्तक्षेप के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।

एकल पीठ का पुराना रुख: एकल न्यायाधीश ने वर्ष 2008 के एक पुराने अदालती फैसले पर भरोसा करते हुए याचिकाकर्ता को राहत दे दी थी। पुराने फैसले में कहा गया था कि चूंकि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी पर कोई स्पष्ट विधिक प्रतिबंध नहीं है, इसलिए पुलिस इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। ‘त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल’ ने एकल पीठ के इसी फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: वैधानिक ढांचा और कानून की भूल

खंडपीठ ने मेडिकल काउंसिल की विधिक दलीलों को पूरी तरह सही माना और निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।

डिप्लोमा खुद साबित करता है कि यह ‘होम्योपैथी’ का हिस्सा है

अदालत ने याचिकाकर्ता राजेश के. के डिप्लोमा सर्टिफिकेट का विधिक अवलोकन करते हुए कहा कि सर्टिफिकेट पर स्पष्ट रूप से ‘इलेक्ट्रो-होम्योपैथिक मेडिसिन’ लिखा है। चूंकि यह ‘होम्योपैथिक मेडिसिन’ की ही एक शाखा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, इसलिए यह सीधे तौर पर राज्य के चिकित्सा कानूनों के विधिक दायरे में आता है। इसे कोई साधारण ‘मुक्त थेरेपी’ कहकर नियमन से बाहर नहीं रखा जा सकता।

राज्य के इन दो कानूनों के तहत पंजीकरण अनिवार्य

अदालत ने स्पष्ट किया कि केरल में होम्योपैथिक या किसी भी चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को निम्नलिखित अधिनियमों के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है। इसमें त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1953, केरल स्टेट मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 2021 (जो 1953 के अधिनियम का उत्तराधिकारी कानून है)। पंजीकृत सूची में नाम शामिल कराए बिना प्रैक्टिस करना पूरी तरह गैर-कानूनी है।

2008 का पुराना फैसला ‘पर इनक्यूरियम’ (Per Incuriam) घोषित

खंडपीठ ने बताया कि 2008 में जिस पीठ ने इलेक्ट्रो-होम्योपैथी को बिना रोक-टोक के चलाने की अनुमति दी थी, उसने तत्कालीन लागू ‘त्रावणकोर-कोचीन मेडिकल प्रैक्टिशनर्स एक्ट, 1953’ के वैधानिक प्रावधानों पर ध्यान ही नहीं दिया था। कानून की स्थापित धाराओं की अनदेखी कर दिया गया कोई भी अदालती फैसला विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं होता (Per Incuriam है), इसलिए उसे नजीर नहीं माना जा सकता।

‘पूर्ण स्वतंत्रता’ के विचार पर कोर्ट का कड़ा रुख

याचिकाकर्ता की इस दलील पर कि भारत में किसी भी नागरिक को वह सब करने की आजादी है जिस पर कानूनन स्पष्ट प्रतिबंध न हो, खंडपीठ ने बेहद गंभीर और दार्शनिक विधिक टिप्पणी की। कहा, यह विचार कि एक भारतीय नागरिक के पास तब तक कुछ भी करने की ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ (Absolute Liberty) है जब तक कि उसे कानून द्वारा स्पष्ट रूप से मना न किया गया हो, हमारे लिखित संविधान के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है। भारतीय न्यायशास्त्र में पूर्ण स्वतंत्रता जैसी कोई अवधारणा नहीं है। नागरिकों के मौलिक अधिकार और स्वतंत्रताएं हमेशा साथी नागरिकों के प्रति उनके कर्तव्यों और दायित्वों के साथ संतुलित होती हैं।

पीठ ने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) किसी भी पेशे को अपनाने का अधिकार देता है, लेकिन राज्य को जनहित और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पेशेवर योग्यता और आचरण को विनियमित करने का पूरा विधिक अधिकार है। कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा, यदि इस पर नियमन न हो, तो यह देश के लोगों के लिए विनाशकारी होगा, क्योंकि यहाँ मरीजों की जिंदगी दांव पर लगी है।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक निर्णय
केस नंबर / तारीखरिट अपील नंबर 1737/2020; निर्णय तिथि: 17 जून 2026
माननीय न्यायाधीशडॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के.
अपीलकर्ता पक्षत्रावणकोर-कोचीन मेडिकल काउंसिल (TCMC)।
सम्बन्धित वैधानिक कानूनTravancore-Cochin Medical Practitioners Act, 1953 और Kerala State Medical Practitioners Act, 2021.
प्रतिपादित विधिक सिद्धांतचिकित्सा के अभ्यास का अधिकार पूर्ण नहीं है; यह मरीजों के ‘राइट टू लाइफ और उचित स्वास्थ्य सेवा’ के विधिक अधिकार के अधीन है।
अदालत का अंतिम आदेशराजेश के. की रिट याचिका खारिज; केरल में बिना वैध पंजीकरण इलेक्ट्रो-होम्योपैथी प्रैक्टिस पर पूर्ण रोक।
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