Wednesday, November 4, 2026
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BAIL-PROVISIONS: अब मौत या उम्रकैद वाले मामलों में भी मिल सकेगी अग्रिम जमानत…बीएनएसएस में ऐसी कोई रोक नहीं

BAIL-PROVISIONS: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, अब ऐसे मामलों में भी अग्रिम जमानत दी जा सकती है, जिनमें मौत या उम्रकैद की सजा हो सकती है।

यह फैसला अब्दुल हमीद की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका पर सुनाया

कोर्ट ने कहा कि 1 जुलाई 2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 482 में ऐसी कोई रोक नहीं है, जैसी पहले सीआरपीसी की धारा 438(6) में थी। इसलिए अब यूपी संशोधन कानून, 2019 के तहत लगाई गई रोक लागू नहीं मानी जाएगी। यह फैसला जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने 3 जुलाई को सुनाया। उन्होंने यह फैसला अब्दुल हमीद की दूसरी अग्रिम जमानत याचिका पर सुनाया, जिसे 2011 के एक हत्या के मामले में ट्रायल का सामना करने के लिए समन किया गया था, लेकिन जांच के दौरान उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की गई थी।

पहली याचिका सीआरपीसी के तहत खारिज हुई थी

हमीद की पहली अग्रिम जमानत याचिका फरवरी 2023 में हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने खारिज कर दी थी। उस समय सीआरपीसी की धारा 438(6) के तहत मौत या उम्रकैद वाले मामलों में अग्रिम जमानत पर रोक थी, जो यूपी संशोधन कानून, 2019 के तहत लागू की गई थी।

बीएनएसएस लागू होने के बाद दोबारा याचिका दायर की

बीएनएसएस लागू होने के बाद हमीद ने 482 बीएनएसएस के तहत दोबारा अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की। सत्र न्यायालय ने मार्च में इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद वह हाईकोर्ट पहुंचे।

राज्य सरकार ने कहा- अपराध 2011 का है, इसलिए पुराना कानून लागू होगा

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि अपराध 2011 में हुआ था और चार्जशीट भी सीआरपीसी के तहत दाखिल हुई थी। इसलिए बीएनएसएस के प्रावधानों को पुराने मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा- बीएनएसएस में रोक हटाना संसद का सोच-समझकर लिया गया फैसला

कोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 482 में सीआरपीसी की धारा 438(6) जैसी कोई रोक नहीं है। यह संसद का सोच-समझकर लिया गया फैसला है, जिससे साफ है कि अब यूपी संशोधन कानून की रोक लागू नहीं होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि बीएनएसएस के लागू होने से कानून और तथ्यों में बड़ा बदलाव आया है, जिससे अब मामले की दोबारा सुनवाई जरूरी हो गई है।

पहली याचिका मेरिट पर नहीं, तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी

कोर्ट ने यह भी कहा कि हमीद की पहली याचिका मेरिट पर नहीं, बल्कि तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी। अब जब कानून बदल गया है, तो नई याचिका स्वीकार्य है।

कोर्ट ने 2024 के एक अन्य फैसले का भी हवाला दिया

कोर्ट ने अपने फैसले में हाईकोर्ट के ही 2024 के एक अन्य फैसले (दीपू व अन्य बनाम राज्य उत्तर प्रदेश) का हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि 1 जुलाई 2024 के बाद दाखिल याचिकाएं बीएनएसएस के दायरे में आएंगी और उन्हें इसके उदार प्रावधानों का लाभ मिलेगा।

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