Wednesday, November 4, 2026
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Waqf Act: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता: 31 दिसंबर 2026 तक पूरी हों सभी दलीलें; 21 जनवरी 2027 को होगी अंतिम बहस

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अदालत द्वारा पूर्व में अंतरिम रोक (15 सितंबर 2025 का ऐतिहासिक आदेश)

  1. कानून पर पूर्ण रोक से इनकार:सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर 2025 को संपूर्ण वक्फ (संशोधन) अधिनियम पर रोक लगाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि किसी भी विधायी कानून के पक्ष में संवैधानिकता की पूर्वधारणा (Presumption of Constitutionality) होती है।
  2. कुछ विवादित प्रावधानों पर अंतरिम स्थगन (Stay):
    • 5 साल इस्लाम का पालन करने की शर्त पर रोक: संशोधित अधिनियम की धारा 3 के क्लॉज (r) के तहत इस शर्त पर तब तक के लिए रोक लगा दी गई थी कि कोई व्यक्ति वक्फ तभी बना सकता है जब वह साबित करे कि वह कम से कम 5 साल से इस्लाम का पालन कर रहा है (जब तक राज्य सरकारें इसके निर्धारण हेतु तंत्र/नियम न बना लें)।
    • कलेक्टर के अधिकारों पर रोक: वक्फ संपत्तियों की स्थिति तय करने के लिए कलेक्टर को दिए गए न्यायिक अधिकारों संबंधी प्रावधान को निलंबित रखा गया।
    • रिपोर्ट लंबित रहने तक रोक: उस प्रावधान पर भी रोक लगाई गई थी जिसके अनुसार नामित अधिकारी की रिपोर्ट आने तक किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा।
  3. गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या पर सीमा:अदालत ने संतुलन बनाते हुए आदेश दिया था कि केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की 20 सदस्यीय संरचना में 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे, तथा राज्य वक्फ बोर्डों (State Waqf Boards) के 11 सदस्यों में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाएंगे।

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. मुकदमों का सुव्यवस्थित प्रबंधन:

शीर्ष अदालत ने याचिकाओं के विशाल आकार को देखते हुए नोडल वकीलों के माध्यम से लिखित तर्कों और मिसालों (Precedents) के संकलन की प्रक्रिया तय की है, ताकि 21 जनवरी से संवैधानिक मुद्दों पर प्रभावी सुनवाई हो सके।

2. अंतरिम संरक्षण की निरंतरता:

अदालत द्वारा पूर्व में वक्फ बोर्डों की संरचनात्मक सीमा और कलेक्टर के एकतरफा अधिकारों पर लगाई गई अंतरिम रोक मुकदमे के अंतिम निस्तारण तक प्रभावी बनी रहेगी।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 25, 26 व अनुच्छेद 30 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता, समानता और अल्पसंख्यकों के सांविधिक अधिकार), वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 (Waqf Amendment Act, 2025) की संवैधानिक वैधता, संसद द्वारा पारित विधियों के पक्ष में ‘संवैधानिकता की विधिक पूर्वधारणा’ (Presumption of Constitutionality), सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए अंतरिम संतुलन (Balancing the Equities—कलेक्टर की न्यायिक शक्तियों पर रोक, गैर-मुस्लिम सदस्यों की अधिकतम संख्या निर्धारण, व ‘5 वर्ष तक इस्लाम का पालन’ वाली शर्त पर अंतरिम स्थगन), तथा वृहद संवैधानिक मुकदमों में केस-मैनेजमेंट व नोडल काउंसिल प्रणाली के विधिक सिद्धांतों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक आदेश पारित किया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) और न्यायमूर्ति पंकज बी. वराले (Justice P.B. Varale) की खंडपीठ ने संसद द्वारा पारित एवं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की संस्तुति प्राप्त वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के विशाल समूह की अंतिम सुनवाई की तिथि 21 जनवरी 2027 निर्धारित कर दी है।

पीठ ने विशाल संख्या में दायर मुकदमों को व्यवस्थित करने हेतु सख्त समय-सीमा तय करते हुए आदेश दिया कि सभी पक्षकार 31 दिसंबर 2026 तक अपनी लिखित दलीलें (Pleadings/Written Submissions) और प्रत्युत्तर अनिवार्य रूप से पूरे करें। अदालत ने उन मध्यवर्ती आवेदकों (Interlocutory Applicants) को दो सप्ताह के भीतर नियमित रिट याचिकाएं दाखिल करने की अनुमति दी, जिन्हें पूर्व में उस रूप में लेने का निर्देश दिया गया था। साथ ही, नोडल काउंसिल को निर्देशित किया कि वे सभी याचिकाओं के संदर्भ में विधि नज़ीरों और तर्कों का एक संयुक्त व संकलित डिजिटल रिकॉर्ड (Convenience Compilation) तैयार करें।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं प्रक्रियात्मक निर्देश

1. ‘दलीलों को 31 दिसंबर 2026 तक अनिवार्य रूप से पूरा करें; 21 जनवरी 2027 को होगी सुनवाई’:

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पंकज बी. वराले की खंडपीठ ने प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “हम उन आवेदकों को, जिन्होंने मध्यवर्ती आवेदन (IA) दायर किए थे और जिन्हें उस क्षमता में विचारित करने का निर्देश दिया गया था, आज से दो सप्ताह के भीतर औपचारिक रिट याचिकाएं (Writ Petitions) दाखिल करने की अनुमति प्रदान करते हैं। याचिका की प्रति नोडल काउंसिल (Nodal Counsel) को तामील कराई जाएगी, जिन्हें याचिकाकर्ताओं द्वारा निर्भर किए गए न्यायिक निर्णयों (Judgments) को संकलित और शामिल करने का निर्देश दिया जाता है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल प्रस्तुत की गई लिखित दलीलों का जवाब दाखिल करेंगे। सभी अभिवचन और दलीलें (Pleadings) अनिवार्य रूप से 31 दिसंबर 2026 तक पूरी कर ली जाएंगी। मामले को अंतिम सुनवाई हेतु 21 जनवरी 2027 को सूचीबद्ध किया जाता है।”

2. केंद्र सरकार का पक्ष: ’17 अप्रैल 2025 के 5 मुख्य याचिकाओं वाले समझौते को बदला न जाए’:

  • केंद्र सरकार की ओर से पेश भारत के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) ने अदालत का ध्यान 17 अप्रैल 2025 के पूर्व आदेश की ओर आकर्षित किया:
    • केंद्र ने दलील दी कि 135 से अधिक याचिकाओं के अनियंत्रित ढेर से बचने के लिए पूर्व में 5 मुख्य याचिकाओं (Five Lead Petitions) की पहचान की गई थी और शेष 135 याचिकाओं को हस्तक्षेप/मध्यवर्ती आवेदनों (IAs) में बदल दिया गया था।
    • सॉलिसिटर जनरल ने बल दिया कि उस पूर्व निर्धारित न्यायिक व्यवस्था को भंग नहीं किया जाना चाहिए, ताकि सुनवाई के दौरान अव्यवस्था उत्पन्न न हो। नोडल काउंसिल ने सहमति जताई कि सभी पक्षों की लिखित दलीलों को संकलित कर एक सुव्यवस्थित फॉर्मेट में अदालत के समक्ष रखा जाएगा।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
पीठन्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) एवं न्यायमूर्ति पंकज बी. वराले (Justice P.B. Varale)
आदेश की तिथि3 नवंबर 2026 (अंतिम सुनवाई 21 जनवरी 2027 को नियत)
केस संदर्भवक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का समूह [W.P.(C) Lead Matters / 2025-2026]
मूल अधिनियमवक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 (The Waqf (Amendment) Act, 2025) — जिसने पूर्ववर्ती वक्फ अधिनियम, 1995 में व्यापक सुधार और परिवर्तन किए।
संसदीय व कार्यकारी पृष्ठभूमिसंसद के दोनों सदनों द्वारा गहन बहस और संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की समीक्षाओं के उपरांत पारित; राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) द्वारा इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून के रूप में अधिसूचित किया गया था।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य संवैधानिक आक्षेप1. अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार): वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को अनिवार्य रूप से शामिल करना मुस्लिम समुदाय के आंतरिक धार्मिक प्रबंधन के स्वायत्त अधिकार में सीधा विधायी हस्तक्षेप है।
2. कलेक्टर की शक्तियां: वक्फ ट्रिब्यूनल की न्यायिक शक्तियों को घटाकर जिला कलेक्टर (कार्यकारी अधिकारी) को यह तय करने का अधिकार देना कि कोई संपत्ति सरकारी है या वक्फ, शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का उल्लंघन है।
3. धारा 3(r) की शर्त: वक्फ सृजित करने के लिए यह साबित करने की बाध्यता कि व्यक्ति कम से कम 5 वर्षों से सक्रिय रूप से इस्लाम का पालन कर रहा है, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 व 25 का उल्लंघन है।
केंद्र सरकार का विधिक रुख• वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाने, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने, और भूमि विवादों के त्वरित निस्तारण हेतु यह सुधार लाया गया है।
• कानून को ‘संवैधानिकता की पूर्वधारणा’ प्राप्त है और विधायिका को सार्वजनिक ट्रस्टों व संपत्तियों के प्रबंधन को विनियमित करने का पूर्ण संप्रभु अधिकार है।
15 सितंबर 2025 का ऐतिहासिक अंतरिम आदेशसर्वोच्च न्यायालय ने पूरे कानून पर रोक लगाने से इनकार किया था, किंतु “पक्षकारों के हितों की रक्षा” और “साम्या के संतुलन (Balancing the Equities)” हेतु विवादित उपबंधों पर अंतरिम रोक लगाई थी।
वर्तमान स्थितिदलीलों को पूरा करने हेतु 31 दिसंबर 2026 की अंतिम समय-सीमा; अंतिम सुनवाई 21 जनवरी 2027 को।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 15 सितंबर 2025 को पारित अंतरिम रोक (Stay) का विधिक विश्लेषण

शीर्ष अदालत ने पूर्व में कानून के पूर्ण स्थगन की मांग को खारिज कर दिया था, किंतु तीन सबसे विवादित प्रावधानों पर प्रभावी अंतरिम रोक लगाकर स्थिति को संतुलित किया था:

  1. धारा 3 के खंड (r) पर आंशिक स्थगन (5 वर्ष तक इस्लाम के पालन की शर्त):
    • संशोधित कानून के खंड (r) में यह शर्त जोड़ी गई थी कि केवल वही व्यक्ति वक्फ बना सकता है जो यह प्रदर्शित या प्रमाणित करे कि वह पिछले कम से कम पांच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा है।
    • शीर्ष अदालत ने इस अंश को तब तक के लिए स्थगित रखा है जब तक कि राज्य सरकारें यह निर्धारित करने की निष्पक्ष प्रक्रिया के नियम (Rules providing a mechanism) तैयार न कर लें।
  2. कलेक्टर द्वारा संपत्ति निर्धारण व ‘डिसिग्नेटेड ऑफिसर’ रिपोर्ट क्लॉज पर रोक:
    • उस प्रावधान पर रोक लगाई गई जिसके तहत जिला कलेक्टर को विवादित भूमि पर वक्फ का दर्जा तय करने का न्यायिक अधिकार दिया गया था, और यह नियम कि जब तक नामित अधिकारी अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देता, तब तक संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा।
  3. वक्फ बोर्डों व परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या पर ‘सीलिंग’:
    • केंद्रीय वक्फ परिषद (कुल 20 सदस्य) में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या को अधिकतम 4 तक सीमित किया गया।
    • राज्य वक्फ बोर्डों (कुल 11 सदस्य) में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या को अधिकतम 3 तक सीमित किया गया, ताकि मूल धार्मिक प्रतिनिधित्व अल्पसंख्यक न बन जाए।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 26, वक्फ अलल औलाद और विधायी विनियमन’

  • ‘संवैधानिकता की पूर्वधारणा’ (Presumption of Constitutionality):
    • भारत के संवैधानिक न्यायशास्त्र में यह नियम सुस्थापित है कि संसद द्वारा पारित किसी भी अधिनियम को न्यायालय द्वारा तब तक वैध माना जाता है जब तक कि याचिकाकर्ता प्रथम दृष्टया यह सिद्ध न कर दे कि वह संविधान के भाग III (मौलिक अधिकार) का स्पष्ट और असंदिग्ध उल्लंघन करता है।
    • इसी सिद्धांत के तहत शीर्ष अदालत ने पूरे वक्फ कानून पर पूर्ण रोक (Blanket Stay) लगाने से इनकार किया था।
  • अनुच्छेद 26 और धार्मिक संस्थाओं का स्वायत्त ढांचा:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने शिरूर मठ मामले [AIR 1954 SC 282] और दरगाह कमेटी, अजमेर बनाम सैयद हुसैन अली [(1961) 3 SCR 383] में यह रेखांकित किया है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में राज्य केवल ‘धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों’ (Secular Activities—जैसे वित्तीय लेखा-जोखा और संपत्ति का प्रशासन) को विनियमित कर सकता है।
    • किंतु धार्मिक अनुष्ठानों, परंपराओं और धार्मिक विश्वास (जैसे वक्फ के धार्मिक उद्देश्य) के मूल ढांचे में ऐसा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जिससे संस्था का मूल धार्मिक चरित्र ही नष्ट हो जाए।
  • शक्तियों का पृथक्करण और वक्फ ट्रिब्यूनल:
    • वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83 के तहत वक्फ ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था, जिसे दीवानी अदालत की शक्तियां प्राप्त हैं और जिसकी अध्यक्षता एक न्यायिक अधिकारी (जिला/सत्र न्यायाधीश स्तर) करता है।
    • नए कानून में कलेक्टर को संपत्तियों के स्वामित्व का निर्णय लेने की शक्ति देना न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कार्यपालिका के अतिक्रमण के रूप में देखा जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस उपबंध को अंतरिम रूप से स्थगित रखना न्यायिक स्वतंत्रता और ‘शक्ति पृथक्करण’ के सिद्धांत की पुष्टि करता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक जनहित रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
  • केस संदर्भ: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएं [Writ Petition (Civil) Group Matters / 2025-2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) एवं न्यायमूर्ति पंकज बी. वराले (Justice P.B. Varale)
  • आदेश की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • दलीलें पूरी करने की समय-सीमा: 31 दिसंबर 2026
  • अंतिम सुनवाई की नियत तिथि: 21 जनवरी 2027

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (Solicitor General Tushar Mehta) एवं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG)।
  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: विभिन्न मुस्लिम संगठनों, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), राज्य वक्फ बोर्डों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के विधिक प्रतिनिधि।
  • समन्वयक प्राधिकारी: अदालत द्वारा नियुक्त नोडल काउंसिल (Nodal Counsel)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 (The Waqf (Amendment) Act, 2025):
      • धारा 3(r) — वक्फ सृजन हेतु 5 वर्ष के इस्लामी पालन की शर्त (वर्तमान में अंतरिम रूप से स्थगित)
      • धारा 3C व 3D — सरकारी भूमि व कलेक्टर की जांच शक्तियां (वर्तमान में अंतरिम रूप से स्थगित)
      • धारा 9 व 14 — केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों की संरचना (गैर-मुस्लिम सदस्यों पर न्यायिक सीमा लागू)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 25 (धर्म के अंतःकरण की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों के अधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • वृहद संवैधानिक मुकदमों में अंतरिम संतुलन और वाद-प्रबंधन का विधिक मानक: ‘जब संसद द्वारा पारित किसी व्यापक विधायी सुधार की संवैधानिक वैधता को सैकड़ों याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी जाती है, तो न्यायालय का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह कानून के पक्ष में संवैधानिकता की पूर्वधारणा (Presumption of Constitutionality) को बनाए रखते हुए पक्षकारों के अधिकारों और साम्या के संतुलन (Balancing the Equities) हेतु विवादित कार्यपालिका शक्तियों पर अंतरिम रोक लगाए; वक्फ जैसी पारंपरिक धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में गैर-मुस्लिम प्रतिनिधित्व को एक तर्कसंगत सीमा तक सीमित रखना और कार्यकारी अधिकारियों द्वारा न्यायिक अधिकारों के अधिग्रहण पर रोक लगाना अंतरिम राहत का आवश्यक घटक है; तथा सुनवाई में अनावश्यक विलंब से बचने हेतु मुख्य याचिकाओं की पहचान, लिखित दलीलों को पूरा करने की सख्त समय-सीमा (31 दिसंबर 2026) और नोडल काउंसिल द्वारा संकलित अभिलेख तैयार कराना समयबद्ध संवैधानिक न्याय प्रशासन का आवश्यक तंत्र है।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: सभी याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार को 31 दिसंबर 2026 तक अपने प्रत्युत्तर, प्रति-शपथपत्र और न्यायिक नज़ीरों के संकलन नोडल काउंसिल को सौंपने होंगे; इसके उपरांत 21 जनवरी 2027 से सर्वोच्च न्यायालय की पीठ इस अधिनियम की मूल संवैधानिक वैधता, अनुच्छेद 26 के दायरे और संसद की विधायी सक्षमता पर अंतिम व निर्णायक सुनवाई शुरू करेगी।

Waqf Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति पी. बी. वराले
मूल विषय/विवादकेंद्र सरकार द्वारा पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती।
याचिकाओं की स्थिति5 मुख्य याचिकाएँ (Lead Petitions) तय की गईं; 135 याचिकाओं को अंतरिम आवेदनों (IAs) में बदला गया।
सॉलिसीटर जनरल का रुखसॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (SG Tushar Mehta) ने 17 अप्रैल 2025 के आदेश का हवाला देकर केवल मुख्य 5 याचिकाओं पर ही केंद्रित सुनवाई जारी रखने का आग्रह किया।
अदालत का अंतिम निर्देश31 दिसंबर 2026 तक दलीलें पूरी की जाएं; मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2027 को होगी।
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