केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति (अगस्त 2026) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | मनीष कुमार सोलंकी (अधिवक्ता रिज़वान अहमद के माध्यम से) |
| मुख्य विषय | Gen Z छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस लेने का विरोध व आयोजकों की जवाबदेही |
| कोर्ट का रुख | युवाओं के साथ संयम और परामर्श (Counselling) की आवश्यकता; याचिका मुख्य मामले के साथ टैग। |
CJP Protest: हालिया छात्र आंदोलनों के दौरान दर्ज आपराधिक मामलों को राजनीतिक समझौतों के आधार पर वापस लेने का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मनीष कुमार सोलंकी द्वारा दायर इस याचिका को छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मुख्य मामलों के साथ टैग (संलग्न) कर दिया है। इससे पहले, 3 अगस्त को शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर (FIRs) को वापस लिया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने चेतावनी दी है कि हिंसक प्रदर्शनों पर दर्ज मामलों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के वापस लेना भविष्य के आंदोलनों के लिए एक खतरनाक नजीर (Dangerous Precedent) सेट करेगा।
CJP Protest: सुनवाई की मुख्य बातें एवं याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता रिज़वान अहमद ने कोर्ट के समक्ष दलीलें रखते हुए आयोजकों की जवाबदेही तय करने और मामले वापस लेने के फैसलों पर सवाल उठाए:
- “कल Gen Alpha, Beta और Delta आएंगे”: अधिवक्ता रिज़वान अहमद ने चेतावनी दी कि यदि सरकार राजनीतिक दबाव में आकर मामलों को वापस लेती है, तो भविष्य में अन्य समूह भी संसद और सरकारी तंत्र को घेरेंगे। अधिवक्ता की दलील: “कल जनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा आएंगे। शंभू बॉर्डर वाले कल ट्रैक्टर लेकर संसद आ जाएंगे? कल शाहीन बाग वाले संसद आएंगे। अगर 500 लोग संसद में घुस जाते और कोई अनहोनी हो जाती तो क्या होता? सिर्फ इसलिए कि सरकार बैकफुट पर आ गई है, पत्थरबाज़ों को खुलेआम छूट नहीं दी जा सकती।”
- आयोजकों की जवाबदेही (Accountability of Organisers): याचिका में NEET 2026 पेपर लीक को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आह्वान करने वाले संगठनों (जैसे कॉकरोच जनता पार्टी) का जिक्र करते हुए कहा गया कि आंदोलन के आयोजक चैनलों पर भड़काऊ बयान दे रहे हैं। कानूनन किसी भी सभा के दौरान हुई अप्रिय घटना के लिए आयोजकों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
- सामुदायिक सेवा (Community Service) की मांग: याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि वे कठोर आपराधिक सजा नहीं मांग रहे हैं, बल्कि पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों के खिलाफ अभद्र व अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाले नाबालिगों और वयस्कों से सार्वजनिक स्थानों या धार्मिक स्थलों पर स्वच्छता/सामुदायिक सेवा कराने का आदेश देने की मांग कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट और CJI का रुख: संयम और परामर्श (Counselling) की जरूरत
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत ने कहा कि राज्य की अत्यधिक शक्ति का प्रयोग स्थिति को और बिगाड़ सकता है और युवाओं को मुख्यधारा में रखने के लिए सतर्कता से काम लेने की आवश्यकता है।
CJI सूर्या कांत का अवलोकन: “ये युवा (Youngsters) हैं। इन्हें बहुत अधिक परामर्श और सलाह (Counselling) की आवश्यकता है। राज्य (State) की ओर से की गई कोई भी अत्यधिक आक्रामकता स्थिति को अनावश्य रूप से बिगाड़ सकती है और आगे की हिंसा को बढ़ावा दे सकती है। इससे बचा जाना चाहिए। सबसे बेहतर रास्ता यह है कि उन्हें समझाया जाए और शांत किया जाए कि देश का सबसे शक्तिशाली तंत्र उनकी बात सुन रहा है।”
सीजेआई ने यह भी रेखांकित किया कि पुलिस को अत्यधिक संयम बरतने की आवश्यकता है ताकि कोई अप्रिय घटना नियंत्रण से बाहर न हो।
याचिका में की गई मुख्य मांगे (Key Prayers)
- राजनीतिक छूट पर रोक: केंद्र और राज्य सरकारों को केवल राजनीतिक समझौतों या समझ के आधार पर दंगा और विरोध से जुड़े मामलों को पूरी तरह माफ करने या वापस लेने से रोकने का निर्देश दिया जाए।
- पहचान और सामुदायिक सेवा: वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पुलिसकर्मियों को गाली देने/अपमानित करने वालों की पहचान की जाए और उनसे अनिवार्य पर्यवेक्षित सामुदायिक सेवा (Cleanliness/Sanitation work) कराई जाए।
अंतिम आदेश
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने याचिकाकर्ता के तर्कों को सुनते हुए इस जनहित याचिका को पूर्व में लंबित अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ टैग कर दिया है, जिस पर आगे विस्तृत सुनवाई होगी।

