Wednesday, November 4, 2026
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Cheque Bounce: कंपनी को आरोपी बनाए बिना निदेशक या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ शिकायत Maintainable नहीं, पढ़िए पूरा केस

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुसर्वोच्च न्यायालय का फैसला (अगस्त 2026)
माननीय पीठजस्टिस मनोज मिश्रा एवं जस्टिस विजय बिश्नोई
संबंधित कानूनपराक्रम्य लिखित अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 व 141
मुख्य विधिक नजीरअनीता हाडा बनाम गॉडफ्रे फिलिप्स इंडिया लिमिटेड
मुख्य निर्णययदि चेक कंपनी के खाते का है, तो धारा 138 के तहत कंपनी को मुख्य आरोपी बनाना अनिवार्य है।
परिणामकंपनी को पक्षकार न बनाने के कारण निदेशक के खिलाफ आपराधिक शिकायत व कार्यवाहियां निरस्त (Quashed)।

Cheque Bounce: पराक्रम्य लिखित अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामलों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को सीआरपीसी (CrPC) की धारा 319 के तहत कंपनी को स्वतः संज्ञान लेते हुए आरोपी (Co-accused) बनाने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि चेक किसी कंपनी के बैंक खाते से जारी किया गया है और मुख्य शिकायत में कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया है, तो कंपनी के निदेशक (Director) या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (Authorised Signatory) के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से आपराधिक शिकायत पोषणीय नहीं होगी। अदालत ने आरोपी महिला निदेशक के खिलाफ दर्ज शिकायत और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को पूरी तरह से निरस्त (Quash) कर दिया।

Cheque Bounce: मामला क्या था? (Background)

  • घटना: शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि कंपनी पर सेवाओं के बदले उसका ₹5 लाख का बकाया था। आरोपी महिला ने, जो कंपनी की निदेशक और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थी, शिकायतकर्ता को ₹5 लाख का चेक जारी किया।
  • चेक बाउंस: बैंक में चेक प्रस्तुत करने पर ‘भुगतान दराज द्वारा रोका गया’ (Payment stopped by drawer) की टिप्पणी के साथ चेक अनादरित (Bounce) हो गया।
  • विधिक गलती: शिकायतकर्ता ने आरोपी निदेशक को कानूनी नोटिस भेजा और उसके खिलाफ धारा 138 के तहत व्यक्तिगत शिकायत दर्ज कराई, लेकिन मुख्य अभियुक्त के रूप में कंपनी को पक्षकार (Accused) नहीं बनाया।
  • निचली अदालत और हाई कोर्ट का रुख: मजिस्ट्रेट ने आरोपी महिला को समन जारी कर दिया। जब मामला बयानों के दर्ज होने के चरण में पहुंचा, तो महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने के बजाय ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह ‘धारा 319 CrPC’ के तहत कंपनी को आरोपी नंबर 2 के रूप में शामिल करे।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत

  1. कंपनी एक ‘जुरिस्टिक पर्सन’ (Juristic Person) है: सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि कानून की नज़र में कंपनी एक ‘विधिक/कृत्रिम व्यक्ति’ (Juristic Person) होती है और बैंक खाता कंपनी के नाम पर होता है।सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी: “यदि संबंधित चेक कंपनी द्वारा बनाए गए खाते से जारी किया गया है, तो NI Act की धारा 138 के अपराध की मुख्य दोषी कंपनी स्वयं होगी। ऐसी स्थिति में कंपनी को मुख्य आरोपी बनाए बिना केवल निदेशक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।”
  2. अनीता हाडा (Aneeta Hada) नजीर का पालन: अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘अनीता हाडा बनाम गॉडफ्रे फिलिप्स इंडिया लिमिटेड’ (Aneeta Hada v. Godfrey Phillips India Ltd.) का हवाला देते हुए कहा कि कंपनी को आरोपी न बनाना एक ‘घातक त्रुटि’ (Fatal Defect) है। ऐसी स्थिति में ली गई संज्ञान (Cognizance) प्रक्रिया ही कानूनन गलत थी।
  3. हाई कोर्ट ने अपनी अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) की सीमा लांघी: शीर्ष अदालत ने एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे (आरोपी की ओर से पेश) के तर्कों से सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को धारा 319 CrPC का उपयोग कर कंपनी को स्वतः आरोपी बनाने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था।

Cheque Bounce में अंतिम आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि शिकायत में कंपनी को पक्षकार न बनाना एक ऐसी त्रुटि है जिसे बाद में सुधारा नहीं जा सकता। पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए आरोपी निदेशक के खिलाफ जारी शिकायत और सभी परिणामी कार्यवाहियों को रद्द (Quash) कर दिया।

  • आरोपी की ओर से अधिवक्ता: एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे।

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