सीजेआई के भाषण के मुख्य बिंदु और महत्वपूर्ण सुझाव
- जलवायु शरणार्थियों को मिले कानूनी मान्यता: सीजेआई ने कहा कि जब कोई छोटा किसान या मछुआरा परिवार अपनी जमीन या आजीविका खोता है, तो यह केवल एक पर्यावरणीय क्षति नहीं है, बल्कि उनकी गरिमा, आजीविका और समानता पर सीधा हमला है। ऐसे विस्थापितों को दो कानूनों के बीच अधर में छोड़ने के बजाय एक स्पष्ट कानूनी पहचान मिलनी चाहिए।
- क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन निष्पक्ष हो: उन्होंने जोर देकर कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बदलाव निष्पक्ष होना चाहिए। जो देश आज औद्योगिक क्रांति के दौर में हैं, उनसे तेजी से हरित ऊर्जा अपनाने की अपेक्षा की जा रही है, जबकि विकसित देशों ने दो शताब्दियों तक कोयले और तेल के दम पर अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत की है। इसलिए जिम्मेदारी और बोझ का बंटवारा निष्पक्ष होना चाहिए।
- अदालतों में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी: सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े मामलों का निपटारा केवल जजों और वकीलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण’ (NGT) और सुप्रीम कोर्ट की ‘सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी’ (CEC) का उदाहरण देते हुए कहा कि वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों को अदालती प्रक्रियाओं का स्थायी हिस्सा होना चाहिए, न कि केवल एक गवाह।
- विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन: उन्होंने दिल्ली के एक मामले का हवाला दिया जहां अस्पताल तक जाने वाली सड़क चौड़ी करने के लिए संरक्षित पेड़ काटे गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने परियोजना को रोकने के बजाय बड़े पैमाने पर क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) का आदेश दिया और खुद उसकी निगरानी की। सीजेआई ने कहा, “एक पौधा लगाकर उसे भूल जाना कोई उपाय नहीं है।”
- कानूनी शिक्षा में बदलाव की जरूरत: सीजेआई ने कहा कि पर्यावरण कानून अब केवल कुछ छात्रों के लिए एक विशेष विषय बनकर नहीं रह सकता। लॉ स्कूलों (Law Schools) को वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों के साथ मिलकर जलवायु संकट पर व्यावहारिक शिक्षा देने की आवश्यकता है।
लंदन/नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने जलवायु न्याय और पर्यावरण क्षरण पर वैश्विक स्तर पर कानूनी सुधारों की आवश्यकता रेखांकित की है।
इस उच्चस्तरीय संवाद का आयोजन राष्ट्रमंडल सचिवालय (Commonwealth Secretariat) और कॉमनवेल्थ लीगल एजुकेशन एसोसिएशन (CLEA) द्वारा किया गया था। लंदन के मार्लबोरो हाउस में आयोजित राष्ट्रमंडल नीति संवाद (High-Level Commonwealth Policy Dialogue on Climate Justice) को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और भूमि क्षरण के कारण विस्थापित होने वाले लोगों को अपनी एक अलग कानूनी पहचान (Distinct Legal Status) मिलनी चाहिए, क्योंकि मौजूदा शरणार्थी (Refugee) और आव्रजन कानून (Migration Laws) ऐसे संकटों के लिए नहीं बनाए गए थे।
CJI सूर्यकांत की मुख्य टिप्पणियां
1. जलवायु विस्थापितों के लिए नया कानूनी ढांचा मौजूदा अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानूनों की सीमाओं पर बोलते हुए सीजेआई ने कहा: “वे (जलवायु विस्थापित) अपनी एक अलग कानूनी स्थिति/पहचान के हकदार हैं, न कि उन्हें दो ऐसे कानूनी ढांचों के बीच अधर में छोड़ दिया जाए जो कभी उनके लिए डिज़ाइन ही नहीं किए गए थे। यह इस बात की याद दिलाता है कि जलवायु संकट उन कानूनी श्रेणियों की सीमाओं की परीक्षा लेगा जिन्हें हमने लंबे समय से तय मान रखा है। अदालतों और कानूनी संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून ठीक वहीं अनिश्चित न हो जाए जहां लोग सबसे अधिक असुरक्षित और संवेदनशील हैं।”
2. न्यायसंगत ऊर्जा परिवर्तन (Just Clean Energy Transition) विकासशील देशों पर पड़ने वाले भार और ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा: “जो देश अभी औद्योगीकरण के दौर में हैं, उनसे तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ने की अपेक्षा की जा रही है, जबकि ऐसा आग्रह करने वाले राष्ट्रों ने दो शताब्दियों तक कोयले और तेल पर अपनी आर्थिक ताकत बनाई है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने का यह परिवर्तन न्यायसंगत होना चाहिए और विभिन्न क्षेत्रों की भिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिम्मेदारियों का उचित बंटवारा होना चाहिए।”
3. विकास बनाम पर्यावरण: व्यावहारिक संतुलन सीजेआई ने दिल्ली में अर्धसैनिक बलों के अस्पताल के लिए सड़क चौड़ीकरण मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि विकास और पर्यावरण को हमेशा एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए: “केवल पौधा लगाना और फिर उसे भूल जाना कोई समाधान नहीं है (‘A sapling planted and then forgotten is no remedy at all’)।”
न्यायपालिका की बदलती भूमिका और वैज्ञानिक विशेषज्ञता
सीजेआई ने पर्यावरणीय विवादों के समाधान के लिए पारंपरिक न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता जताई:
- न्यायाधीशों की समझ का विस्तार: सीजेआई ने कहा कि स्पष्ट विधायी दिशा-निर्देशों के अभाव में जजों को विकास और पारिस्थितिकीय अस्तित्व के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऐसे में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कानून क्या कहता है, बल्कि उस दुनिया और विज्ञान को समझना भी जरूरी है जिस पर वह कानून लागू हो रहा है।
- वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की भागीदारी: सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:“पर्यावरणीय न्यायनिर्णयन (Environmental Adjudication) केवल न्यायाधीशों और वकीलों का विशेष क्षेत्र बनकर नहीं रह सकता। इसके लिए वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं की कोर्ट रूम में सक्रिय उपस्थिति आवश्यक है, न कि उन्हें केवल फाइलों या एकल गवाहों तक सीमित रखा जाए।”
लीगल एजुकेशन में सुधार का आह्वान
मुख्य न्यायाधीश ने लॉ स्कूलों और विश्वविद्यालयों से अपील की कि वे अपने पाठ्यक्रम को आधुनिक चुनौतियों के अनुसार ढालें:
- पर्यावरण कानून अब कोई गौण या केवल कुछ छात्रों द्वारा चुना जाने वाला ‘स्पेशलिस्ट विषय’ नहीं रह सकता।
- लॉ स्कूलों को क्लिनिकल लीगल एजुकेशन, वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के साथ संयुक्त संवाद तथा वास्तविक पर्यावरणीय विवादों के अध्ययन पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रमुख टिप्पणी
लंदन में राष्ट्रमंडल सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा: “एक न्यायाधीश की भूमिका बदल रही है; अब केवल यह जानना काफी नहीं है कि कानून क्या कहता है, बल्कि हमें उस दुनिया को भी समझना होगा जिस पर वह कानून लागू किया जा रहा है। जलवायु संकट उन सभी कानूनी श्रेणियों की सीमाओं की परीक्षा लेगा जिन्हें हमने लंबे समय से मान लिया है। न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून वहां अनिश्चित न हो जहां लोग सबसे अधिक संवेदनशील हैं।”
Climate Justice: एट ए ग्लान्स (At a Glance of CJI’s Speech)
| विवरण | जानकारी |
| मुख्य वक्ता | भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत |
| कार्यक्रम | राष्ट्रमंडल नीति वार्ता (Commonwealth Policy Dialogue on Climate Justice) |
| आयोजन स्थल | मार्लबोरो हाउस, लंदन |
| मुख्य विषय | जलवायु विस्थापन (Climate Displacement), स्वच्छ ऊर्जा में निष्पक्ष बदलाव (Fair Energy Transition), और पर्यावरण न्यायशास्त्र |

