Tuesday, August 4, 2026
HomeJudgments and Gender: बलात्कार के फैसलों में ‘लाचार महिला’ जैसे शब्दों से...
Array

Judgments and Gender: बलात्कार के फैसलों में ‘लाचार महिला’ जैसे शब्दों से बचें; नैतिक पुलिसिंग न हो…समिति के न्यायाधीशों की यह सलाह पढ़िए

रिपोर्ट एवं सिफारिशें: सारांश तालिका (Overview Matrix)

श्रेणी / विषयसुप्रीम कोर्ट समिति के निर्देश (2026)
समिति के अध्यक्षजस्टिस अनिरुद्ध बोस (पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज)
रिपोर्ट का शीर्षकJudgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments
प्रतिबंधित शब्द (Avoid)Prosecutrix, Helpless woman, Lost chastity, Outraged modesty, Lust, Soul destroyed
अनुशंसित शब्द (Use)Victim, Survivor, Complainant, Bodily autonomy, Sexual assault, Offence
न्यायिक दृष्टिकोणmoral policing और पितृसत्तात्मक सोच पर पूर्ण रोक; सहमति और गरिमा पर ध्यान केंद्रित
कोर्ट रूम निर्देशकपड़ों/चरित्र पर टिप्पणी वर्जित; बिना चोट/देरी के आधार पर प्रतिकूल निष्कर्ष पर रोक; इन-कैमरा सुनवाई

Judgments and Gender: यौन अपराधों के मामलों में न्याय प्रदान करते समय अदालती भाषा को अधिक संवेदनशील, गरिमापूर्ण और निष्पक्ष बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बड़ी रिपोर्ट जारी की गई है।

‘जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कंपैशन इन राइटिंग जजमेंट्स’ (Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments) शीर्षक वाली इस रिपोर्ट का उद्देश्य सुनवाई के दौरान पीड़ितों को पुन: मानसिक आघात (Re-traumatization) से बचाना है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में जजों को यौन अपराध के फैसलों में लैंगिक रूढ़िवादिता, नैतिक पुलिसिंग (Moral Policing) और पीड़ित पर ही दोष मढ़ने वाली शब्दावली से बचने की सख्त सिफारिश की गई है।

समिति का गठन और रिपोर्ट का आधार

  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश: 10 फरवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुपालन में इस समिति का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य यौन अपराधों और संवेदनशील गवाहों से जुड़े मामलों को संभालने वाले न्यायाधीशों में करुणा और संवेदनशीलता पैदा करना था।
  • समिति के सदस्य: जस्टिस अनिरुद्ध बोस (अध्यक्ष), गुजरात हाई कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सोनिया जी. गोकानी, मध्य प्रदेश की पूर्व डीजीपी अनुराधा शंकर, सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ. सूरत सिंह और नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर लूसी टीवी ज़ेहोल। (सहयोग: डॉ. सोनम जैन एवं जिला जज श्रीश कैलाश शुक्ल)।
  • विश्लेषण: समिति ने राज्य न्यायिक अकादमियों की मदद से देशभर के 125 ट्रायल कोर्ट (निचली अदालतों) के फैसलों का गहन विश्लेषण करने के बाद ये सिफारिशें तैयार की हैं।

समिति की प्रमुख सिफारिशें और शब्दावली में बदलाव

रिपोर्ट में एक विस्तृत तालिका प्रस्तुत की गई है, जिसमें फैसलों में अक्सर इस्तेमाल होने वाले आपत्तिजनक/रूढ़िवादी शब्दों को बदलकर लैंगिक-तटस्थ (Gender-neutral) और पीड़ित-केंद्रित (Survivor-centric) शब्दावली अपनाने का निर्देश दिया गया है।

इन पुराने/रूढ़िवादी शब्दों पर रोक और उनके विकल्प:

  • ‘प्रोसैक्यूट्रिक्स’ (Prosecutrix) या ‘लाचार/बेबस महिला’ (Helpless Woman): इनके स्थान पर ‘पीड़ित’ (Victim), ‘सर्वाइवर’ (Survivor) या ‘शिकायतकर्ता’ (Complainant) शब्द का उपयोग हो।
  • ‘अस्मत/शील भंग’ (Lost Chastity/Outraged Modesty) या ‘पवित्रता’ (Sanctity/Chastity): इन शब्दों की जगह ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ (Violated Bodily Autonomy) का उपयोग किया जाए।
  • ‘वासना’ (Lust/Illicit Lust): ऐसे शब्दों के स्थान पर कानूनी रूप से सटीक शब्द जैसे ‘यौन हमला’ (Sexual Assault), ‘यौन हिंसा’ (Sexual Violence) या ‘अपराध’ लिखा जाए।
  • ‘भौतिक संबंध’ (Physical Relationship): जहाँ सहमति न हो या पीड़ित नाबालिग हो, वहाँ इसे ‘शारीरिक संबंध’ न लिखकर ‘यौन हमला’ (Sexual Assault) या ‘बलात्कार’ (Rape) दर्ज किया जाए।

पितृसत्तात्मक सोच और नैतिकता पर प्रहार

समिति ने स्पष्ट किया कि ‘सम्मान’ (Honour), ‘शर्म’ (Shame), ‘पवित्रता’ (Chastity) और ‘लज्जा’ (Bashfulness) जैसे शब्द पितृसत्तात्मक धारणाओं से जुड़े हैं जो महिला के मूल्य को उसकी यौन पवित्रता से जोड़ते हैं। अदालती तर्कों का ध्यान केवल सहमति (Consent), गरिमा (Dignity), शारीरिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों पर केंद्रित होना चाहिए।

सुनवाई और साक्ष्य मूल्यांकन पर महत्वपूर्ण निर्देश

कपड़ों या आचरण के आधार पर कोई टिप्पणी नहीं

रिपोर्ट में सख्त चेतावनी दी गई है- किसी भी सभ्य समाज में किसी महिला का केवल उसके कपड़ों के आधार पर मूल्यांकन करना या उसके चरित्र व लज्जा के बारे में निष्कर्ष निकालना अक्षम्य और अस्वीकार्य है, क्योंकि ऐसे फैसले पितृसत्ता की कठोर धारणाओं में निहित हैं।

देरी, चोट के निशान न होने या विरोध न करने पर प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं

समिति ने कहा कि शरीर पर चोट के निशान न होना, एफआईआर दर्ज कराने में देरी होना या पीड़ित द्वारा शारीरिक विरोध न करना सहमति को नहीं दर्शाता। आघात (Trauma) पर हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है, इसलिए जजों को रूढ़िवादिता के आधार पर गलत निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए।

कोर्ट रूम का माहौल और जिरह (Cross-examination) पर नियंत्रण

  • ट्रायल जजों को निर्देश दिया गया है कि वे सर्वाइवर के यौन इतिहास (Sexual History) से जुड़े अपमानजनक या व्यक्तिगत प्रश्नों को रोकें।
  • गवाही के दौरान अनावश्यक लोगों को कोर्ट रूम से बाहर करने, इन-कैमरा कार्यवाही करने, और पीड़ित को बुनियादी शिष्टाचार (पानी, कुर्सी) प्रदान करने के निर्देश दिए गए हैं।
  • जजों को गवाह सुरक्षा उपायों और पूर्व-सुनवाई परामर्श (Pre-trial Counselling) के लिए पीड़ित के आवेदन का इंतजार किए बिना स्वयं कदम उठाने का दायित्व सौंपा गया है।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
moderate rain
27.4 ° C
27.4 °
27.4 °
84 %
6.2kmh
97 %
Mon
28 °
Tue
33 °
Wed
36 °
Thu
30 °
Fri
32 °