FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- खातों का निलंबन और ₹1,000 करोड़ का दावा:अगस्त 2026 में मेटा ने डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी ब्लिंक डिजिटल के 4 मुख्य बिजनेस मैनेजर खातों और लगभग 9,000 संबद्ध विज्ञापन खातों को अचानक बंद कर दिया। इसके खिलाफ ब्लिंक डिजिटल ने भारी नुकसान का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में ₹1,000 करोड़ का व्यावसायिक मुकदमा (Commercial Suit) दायर किया।
- कैलिफोर्निया स्थानांतरित करने की मेटा की अर्जी:मेटा इंक (यूएस) ने सीपीसी के ऑर्डर 7 रूल 10 के तहत अर्जी देकर मुकदमे को वापस लौटाने और वादी को कैलिफोर्निया (अमेरिका) की अदालत में जाने का निर्देश देने की मांग की। मेटा का तर्क था कि उसके कमर्शियल टर्म्स और सेवा शर्तों में विवादों के निपटारे के लिए कैलिफोर्निया अदालतों का विशेष क्षेत्राधिकार तय है।
- फेसबुक इंडिया का रुख:मुकदमे में पहली प्रतिवादी ‘फेसबुक इंडिया’ (मेटा की भारतीय शाखा) का पंजीकृत कार्यालय मुंबई में है। फेसबुक इंडिया ने हाईकोर्ट के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) को चुनौती देने वाला कोई लिखित आवेदन या आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. “वैधानिक कानून हमेशा निजी अनुबंधों से ऊपर होते हैं”:
न्यायामूर्ति संदीप वी. मारणे ने मेटा की याचिका को खारिज करते हुए फैसला सुनाया: “अदालतों के विशेष क्षेत्राधिकार और विदेशी कानून की प्रयोज्यता के संबंध में पक्षों के बीच किया गया कोई निजी अनुबंध भारत के वैधानिक कानूनों के प्रावधानों को निरस्त नहीं कर सकता। भारत में वैधानिक कानून हमेशा निजी संविदाओं पर भारी पड़ते हैं, और पक्षकार किसी भी अपरिवर्तनीय कानून (Non-derogable Statutes), सार्वजनिक नीति या अनिवार्य स्थानीय कानून से बाहर अनुबंध नहीं कर सकते।”
2. “कैलिफ़ोर्निया कोर्ट भारतीय IT नियमों का निर्धारण नहीं कर सकते”:
- अदालत ने नोट किया कि दोनों पक्षों ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Intermediary Rules, 2021) के उल्लंघनों के आरोप लगाए हैं।
- मेटा की मानक शर्तें टकराव-कानून (Conflict-of-law) प्रावधानों को बाहर करती हैं। इसलिए, कैलिफ़ोर्निया की अदालतें केवल कैलिफ़ोर्नियाई कानूनों के तहत अनुबंध का फैसला करेंगी और भारतीय IT अधिनियम के उल्लंघन पर फैसला देने में कानूनी रूप से असमर्थ होंगी।
मुंबई: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VII नियम 10 (वादपत्र की वापसी / Return of Plaint), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) तथा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021), भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 28 (न्यायिक कार्यवाहियों पर प्रतिबंध लगाने वाले करारों का शून्य होना), अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार खंड (Exclusive Foreign Jurisdiction Clause), तथा ‘अनिवार्य स्थानीय विधि के विरुद्ध संविदा न करने’ (Inability to Contract Out of Mandatory Statutes) के विधिक सिद्धांतों पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने (Justice Sandeep V. Marne) की एकल पीठ ने अमेरिकी टेक दिग्गज मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. (Meta Platforms Inc.) द्वारा दायर उस अंतरिम आवेदन को खारिज कर दिया है, जिसमें भारतीय डिजिटल विज्ञापन एजेंसी ब्लिंक डिजिटल (Blink Digital) द्वारा दायर ₹1,000 करोड़ के वाणिज्यिक मुकदमे को कैलिफोर्निया (अमेरिका) की अदालत में स्थानांतरित करने या क्षेत्राधिकार के अभाव में वादपत्र वापस करने की मांग की गई थी।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि निजी अनुबंधों में विदेशी अदालतों के अनन्य क्षेत्राधिकार (Exclusive Jurisdiction) और विदेशी कानून लागू करने की शर्तें भारत के अनिवार्य सांविधिक कानूनों और लोक नीति (Public Policy) को निष्प्रभावी नहीं कर सकतीं। अदालत ने विशेष रूप से दर्ज किया कि मेटा की भारतीय सहायक कंपनी फेसबुक इंडिया ऑनलाइन सर्विसेज प्रा. लि. (Facebook India) ने बॉम्बे हाईकोर्ट के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार पर कोई लिखित आपत्ति नहीं जताई है, और किसी एक पक्ष के संदर्भ में वादपत्र को टुकड़ों में (Piecemeal) वापस नहीं किया जा सकता।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘निजी अनुबंध भारतीय सांविधिक कानूनों और लोक नीति को ओवरराइड नहीं कर सकते’
न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने विदेशी क्षेत्राधिकार खंड की सीमाओं की समीक्षा करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी: “अदालतों के अनन्य क्षेत्राधिकार (Exclusive Jurisdiction) और विदेशी कानून की प्रयोज्यता के संबंध में पक्षों के बीच किया गया निजी अनुबंध भारत के सांविधिक कानूनों के प्रावधानों को दरकिनार (Override) नहीं कर सकता। भारत में सांविधिक कानून हमेशा निजी अनुबंधों पर प्रभावी होते हैं। पक्षकार किसी निजी समझौते के माध्यम से गैर-अपमार्जनीय कानूनों (Non-derogable statutes), लोक नीति (Public Policy) या अनिवार्य स्थानीय कानूनों (Mandatory Local Laws) से बाहर संविदा (Contract out) नहीं कर सकते।”
2. ‘टेक दिग्गज भारत में मुनाफा कमाकर भारतीय कानूनों की जवाबदेही से नहीं बच सकते’:
- अदालत ने टेक कंपनियों द्वारा भारतीय नियामक ढांचे से बचने की प्रवृत्ति पर तल्ख टिप्पणी की:“आईटी अधिनियम और मध्यवर्ती नियमों (Intermediary Rules) के प्रावधानों का उद्देश्य ऐसी स्थिति को रोकना है, जहां कोई महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यवर्ती (SSMI) भारत में अपने संचालन से भारी मुनाफा कमाए, और साथ ही भारतीय कानूनों के तहत अपने वैधानिक दायित्वों से बचने का प्रयास करे।”
- पीठ ने रेखांकित किया कि यह विवाद केवल एक सामान्य संविदात्मक उल्लंघन नहीं है, बल्कि इसमें दोनों पक्षों ने आईटी रूल्स, 2021 के सांविधिक उल्लंघनों के आरोप लगाए हैं।
3. कैलिफोर्निया की अदालतें भारतीय IT नियमों पर विचार करने में असमर्थ:
- न्यायालय ने नोट किया कि मेटा की सेवा शर्तों में ‘कानूनों के टकराव’ (Conflict-of-law) के प्रावधानों को बाहर रखा गया है।
- परिणामस्वरूप, कैलिफोर्निया की अदालतें केवल अनुबंध की शर्तों और कैलिफोर्नियाई कानून को लागू करके ही फैसला कर सकती हैं। वे भारत के आईटी मध्यवर्ती नियम, 2021 के उल्लंघन से जुड़े विवादों का न्यायिक निर्धारण करने में कानूनी रूप से असमर्थ होंगी। इसलिए वादी को ऐसे फोरम में नहीं भेजा जा सकता जहां भारतीय वैधानिक अधिकारों का उपचार ही उपलब्ध न हो।
4. फेसबुक इंडिया ने कोई आपत्ति नहीं उठाई; मेटा उसके बदले दलील नहीं दे सकती:
- अदालत ने रेखांकित किया कि मुकदमे में मुख्य प्रतिवादी संख्या 1 ‘फेसबुक इंडिया’ (मुंबई कार्यालय) है।
- पीठ ने दर्ज किया:“वर्तमान में, प्रतिवादी संख्या 1 (फेसबुक इंडिया) की ओर से मुकदमे में लिखित रूप में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि उसे इस न्यायालय के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार पर कोई आपत्ति है।प्रतिवादी संख्या 2 (मेटा) प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से पैरवी नहीं कर सकता… प्रतिवादी संख्या 1 का कार्यालय इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में स्थित है, अतः अनुबंध के जरिए पक्षकार इस अदालत के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं कर सकते।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अगस्त–अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| वादी (Plaintiff) | ब्लिंक डिजिटल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड — भारत स्थित प्रमुख डिजिटल विज्ञापन एवं मार्केटिंग एजेंसी। |
| प्रतिवादी संख्या 1 | फेसबुक इंडिया ऑनलाइन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड — मेटा की भारतीय अनुषंगी (जिसका कॉर्पोरेट कार्यालय मुंबई में स्थित है)। |
| प्रतिवादी संख्या 2 (आवेदक) | मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. (Meta Platforms Inc.) — अमेरिका स्थित मूल बहुराष्ट्रीय टेक कंपनी। |
| विवाद का मूल कारण | अगस्त 2026 में मेटा ने बिना किसी पर्याप्त पूर्व सूचना के ब्लिंक डिजिटल के 4 बिजनेस मैनेजर अकाउंट्स और उनसे जुड़े लगभग 9,000 विज्ञापन खातों (Advertising Accounts) को अचानक निष्क्रिय (Disabled) कर दिया, जिससे वादी का संपूर्ण व्यावसायिक संचालन ठप हो गया। |
| दायर वाद की प्रकृति | बॉम्बे हाईकोर्ट के मूल क्षेत्राधिकार में दायर ₹1,000 करोड़ का वाणिज्यिक वाद (Commercial Suit), जिसमें आईटी अधिनियम, 2000 और मध्यवर्ती नियमावली, 2021 के उल्लंघन तथा संविदात्मक क्षतिपूर्ति की मांग की गई। |
| मेटा की कानूनी अर्जी | सीपीसी के आदेश 7 नियम 10 के तहत आवेदन, जिसमें तर्क दिया गया कि ‘कमर्शियल टर्म्स’ के तहत सभी विवाद कैलिफोर्निया अदालतों के अनन्य क्षेत्राधिकार में कैलिफोर्नियाई कानून द्वारा ही तय होने चाहिए। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | मेटा का आवेदन पूर्णतः खारिज; बॉम्बे उच्च न्यायालय में वाणिज्यिक वाद की नियमित सुनवाई जारी रखने का आदेश। |
विधिक एवं क्षेत्राधिकार विश्लेषण: ‘विदेशी क्षेत्राधिकार खंड बनाम CPC व IT कानून’
- अनिवार्य स्थानीय कानून (Mandatory Local Laws) और लोक नीति:
- भारत में अनुबंध की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 23 और धारा 28 के तहत कोई भी अनुबंध लोक नीति के विपरीत नहीं हो सकता और न ही वह किसी भारतीय नागरिक/कंपनी को भारतीय कानूनों के तहत प्राप्त वैधानिक उपचारों से पूरी तरह वंचित कर सकता है।
- चूंकि भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मध्यवर्ती संस्थाओं (Intermediaries) पर उपयोगकर्ताओं के खातों को निलंबित या समाप्त करने के संबंध में पारदर्शी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय लागू किए हैं, इसलिए कोई भी विदेशी प्लेटफॉर्म सेवा शर्तों का हवाला देकर इन नियमों को बाईपास नहीं कर सकता।
- वादपत्र की अविभाज्यता (Indivisibility of Plaint):
- सर्वोच्च न्यायालय ने डी. रामचंद्रा रेड्डी और कई अन्य मामलों में स्पष्ट किया है कि सीपीसी के आदेश VII नियम 10 या आदेश VII नियम 11 के तहत वादपत्र का आंशिक या टुकड़ों में (Piecemeal rejection or return) निस्तारण नहीं किया जा सकता।
- चूंकि फेसबुक इंडिया मुंबई में स्थित है और उसने क्षेत्राधिकार पर कोई आपत्ति नहीं उठाई है, इसलिए पूरे वाद को कैलिफोर्निया भेजने का सवाल ही नहीं उठता।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मूल वाणिज्यिक दीवानी क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. बनाम ब्लिंक डिजिटल (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड व अन्य [Commercial Suit / Interim Application under Order VII Rule 10 CPC]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- परिणाम: मेटा का अंतरिम आवेदन पूर्णतः खारिज (Dismissed)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- आवेदक / प्रतिवादी संख्या 2 (मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक.) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास (Senior Advocate Janak Dwarkadas), साथ में अधिवक्ता अमेय गोखले, रितीश देसाई, अमी राणा, राधिका रॉय, हरित लखानी, तन्वी रैना एवं अभिषेक मुखर्जी (शार्दुल अमरचंद मंगलदास द्वारा ब्रीफ किए गए)।
- प्रतिवादी संख्या 1 (फेसबुक इंडिया ऑनलाइन सर्विसेज) की ओर से: अधिवक्ता ऋषभ जैसानी (शार्दुल अमरचंद मंगलदास द्वारा ब्रीफ किए गए)।
- वादी (ब्लिंक डिजिटल इंडिया) की ओर से: अधिवक्ता कुणाल द्वारकादास, सिद्धार्थ जोशी, अनिकेत खरोटे, नवल शर्मा, नबील मलिक, निकिता शर्मा, सार्थक शर्मा एवं अखिला डी.वी. (तुली एंड कंपनी द्वारा ब्रीफ किए गए)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश VII नियम 10 (वादपत्र की वापसी हेतु प्रक्रिया) एवं धारा 20 (अदालत का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) — धारा 79 (मध्यवर्ती दायित्व की सीमाएं)
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021
- भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 — धारा 23 (विधि विरुद्ध उद्देश्य) एवं धारा 28 (अदालती कार्यवाहियों के अवरोधक करार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और क्षेत्राधिकार का विधिक मानक: ‘सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की मानक सेवा शर्तों में उल्लिखित विदेशी अनन्य क्षेत्राधिकार खंड भारत के अनिवार्य सांविधिक कानूनों (IT Act/Rules) को निष्प्रभावी नहीं कर सकते; वैश्विक टेक कंपनियां भारत में व्यावसायिक लाभ कमाकर स्थानीय कानूनों की जवाबदेही से बचने के लिए अनुबंधात्मक आवरण का सहारा नहीं ले सकतीं; जहां सह-प्रतिवादी भारतीय क्षेत्राधिकार में मौजूद है, वहां वादपत्र को विदेशी अदालत हेतु वापस नहीं किया जा सकता।’
- वर्तमान स्थिति: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मेटा की याचिका खारिज कर दी है; ब्लिंक डिजिटल द्वारा दायर ₹1,000 करोड़ का हर्जाना और खाता बहाली का मुकदमा बॉम्बे हाईकोर्ट में नियमित ट्रायल के रूप में जारी रहेगा।
Commercial Suit: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे (Justice Sandeep V Marne) |
| मामला/साइटेशन | मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक बनाम ब्लिंक डिजिटल इंडिया प्रा. लि. व अन्य (Meta Platforms Inc. v. Blink Digital & Anr.) |
| वादी (Plaintiff) | ब्लिंक डिजिटल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (विज्ञापन एजेंसी) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता कुणाल द्वारकादास |
| प्रतिवादी | 1. फेसबुक इंडिया ऑनलाइन सर्विसेज (प्रतिवादी 1) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता ऋषभ जैसानी 2. मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक – US (प्रतिवादी 2) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास |
| मूल विवाद | अगस्त 2026 में मेटा द्वारा ब्लिंक डिजिटल के 4 बिजनेस मैनेजर अकाउंट और ~9,000 विज्ञापन खाते निलंबित करने से हुआ ₹1,000 करोड़ का नुकसान। |
| मेटा का तर्क | सेवा शर्तों (Terms of Service) के तहत विवादों का निपटारा कैलिफ़ोर्निया की अदालत और वहां के कानूनों के तहत ही हो सकता है। |
| अदालत का फैसला | अर्जी खारिज; भारतीय आईटी नियम निजी संविदाओं से ऊपर हैं। कैलिफोर्निया कोर्ट भारतीय IT नियमों के उल्लंघन का निपटारा नहीं कर सकते। |

