Friday, October 30, 2026
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Byju’s Insolvency: Byju’s दिवाला विवाद में हाईकोर्ट में तीखा नाटक; आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग पर जूनियर जज का कड़ा ऐतराज; स्टे आदेश पर खंडपीठ में मतभेद

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हाईकोर्ट में हुए ड्रामे और तकरार का घटनाक्रम

  1. आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग और जजों में मतभेद:27 अक्टूबर को इस पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने नोटिस जारी किया था और अगली सुनवाई 6 नवंबर तय की थी। लेकिन गुरुवार को अचानक मामला बोर्ड पर आने पर जस्टिस जॉन ने नाराजगी जताई। साथ ही, दोनों जजों ने स्वीकार किया कि याचिका स्वीकार (Admit) करने पर तो उनकी सहमति है, लेकिन बायजू की दिवालियापन प्रक्रिया पर अंतरिम रोक (Stay) लगाने के सवाल पर दोनों के बीच मतभेद (Divergent Opinion) हैं।
  2. याचिकाकर्ता के वकील की कड़ी आपत्ति:याचिकाकर्ता वोइज़िट टेक्नोलॉजी के अधिवक्ता पी.सी. ससीधरन ने पीठ के इस रुख पर तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि 27 अक्टूबर को खुली अदालत (Open Court) में दोनों जज स्टे के पक्ष में सहमत थे। उन्होंने तर्क दिया कि जजों का बाद में चैंबर में राय बदलना और मामले को चीफ जस्टिस को भेजना खुली अदालत में दिए गए आदेश को बिना किसी अर्जी के वापस लेने (Recall/Review) के समान है, जो एक गलत मिसाल कायम करेगा।
  3. जस्टिस जॉन का रुख और पूर्व आदेश का स्पष्टीकरण:अधिवक्ता की आपत्तियों को खारिज करते हुए जस्टिस जॉन ने स्पष्ट किया कि वे 27 अक्टूबर को भी स्टे देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा था कि मामले को शांतिपूर्ण तरीके से सुना जाना चाहिए और गुण-दोष पर कोई भी आदेश दिए बिना 6 नवंबर की तारीख दी गई थी।

मुख्य विधिक बिंदु और बायजू दिवालियापन विवाद की पृष्ठभूमि

1. 12 जून 2024 के फैसले की समीक्षा:

वोइज़िट टेक्नोलॉजी ने 12 जून 2024 के उस हाईकोर्ट फैसले को रद्द करने की मांग की है, जिसने इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (IRP) और अमेरिकी कर्जदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘ग्लास ट्रस्ट कंपनी’ (GLAS Trust Company LLC) के आचरण की सीबीआई (CBI) या अन्य केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी।

2. फर्जी दस्तावेजों के आधार पर समिति में दबदबे का आरोप:

  • वोइज़िट का आरोप है कि ‘ग्लास ट्रस्ट’ ने 25 जुलाई 2024 के एक फर्जी दिशा-निर्देश पत्र (Fabricated Letter) के बल पर लेनदारों की समिति (Committee of Creditors – CoC) में 50% से अधिक का वर्चस्व हासिल कर लिया।
  • याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल इकाई के रूप में नियुक्त अर्नस्ट एंड यंग (EY) ने बिना उचित सत्यापन के ग्लास ट्रस्ट को CoC में शामिल होने दिया और अपने हितों के टकराव (Conflict of Interest) को छिपाया।

कोच्चि: दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC, 2016) के तहत कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XLVII नियम 1 व धारा 114 (पुनर्विचार याचिका / Review Jurisdiction), केरल उच्च न्यायालय नियमावली के तहत खंडपीठ के जजों के बीच मतभेद होने पर प्रक्रिया (केरल उच्च न्यायालय अधिनियम की धारा 5(ii) / CPC की धारा 98 — ‘तीसरे जज को संदर्भ’ / Reference to a Third Judge), खुली अदालत में सुनाए गए आदेशों की शुचिता (Sanctity of Open Court Pronouncements), तथा रजिस्ट्री द्वारा ‘आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग’ (Out-of-turn Listing without Consent) की प्रशासनिक सीमाओं पर केरल हाईकोर्ट के कोर्ट रूम 6D में एक असाधारण और तीखा अदालती टकराव देखने को मिला।

केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति के. नटराजन (Justice K Natarajan) और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन (Justice Johnson John) की खंडपीठ के समक्ष एडु-टेक कंपनी Byju’s (थिंक एंड लर्न प्राइवेट लिमिटेड) की दिवाला प्रक्रिया की सीबीआई/एजेंसियों से जांच की मांग खारिज करने वाले 12 जून के फैसले के विरुद्ध दायर पुनर्विचार याचिका (Review Petition) सुनवाई के लिए आई।

सुनवाई के दौरान कनिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन ने खुली अदालत में गंभीर आपत्ति दर्ज कराई कि जब 27 अक्टूबर को मामले की अगली तारीख 6 नवंबर 2026 तय की गई थी, तो उनकी जानकारी के बिना इस मामले को आज अचानक कैसे सूचीबद्ध कर दिया गया। इसके साथ ही खंडपीठ में आक्षेपित निर्णय पर अंतरिम रोक (Stay) लगाने के प्रश्न पर विभाजन (Split Bench / Divergent Opinions) हो गया। अंततः खंडपीठ ने पुनर्विचार याचिका को स्वीकार (Admit) करते हुए स्थगन के बिंदु पर मतभेद के कारण मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे किसी तीसरे न्यायाधीश (Third Judge) की पीठ को संदर्भित किया जा सके।

खुली अदालत में जजों और वकीलों के बीच तीखा संवाद (Courtroom Drama)

1. ‘मुझे नहीं पता कि यह आज कैसे लगा; मेरी जानकारी के बिना लिस्टिंग हुई’: जस्टिस जॉनसन जॉन

कनिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन ने रजिस्ट्री द्वारा बिना पूर्व सूचना के मामले को लिस्ट करने पर गहरी अप्रसन्नता व्यक्त की: “मैं इस पर अधिक स्पष्टीकरण नहीं देना चाहता… मुझे नहीं पता कि यह मामला आज कैसे सूचीबद्ध हुआ। इसे 6 नवंबर के लिए तय किया गया था। सामान्य प्रक्रिया यह है कि रजिस्ट्री को मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए। मेरी जानकारी के बिना इसे आज पोस्ट किया गया है; सही प्रक्रिया केवल रजिस्ट्री को निर्देश देने की है।”

2. ‘स्टे पर मतभेद है, इसीलिए हमने अपील पर रोक नहीं लगाई’: जस्टिस के. नटराजन

  • वरिष्ठ पीठासीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. नटराजन ने खुली अदालत में खंडपीठ के आंतरिक मतभेद को स्पष्ट करते हुए कहा:“हमारी राय अलग-अलग (Divergent opinions) है, यही कारण है कि हमने अपील के आदेश पर अंतरिम रोक नहीं लगाई है।”
  • न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन ने जोड़ा:“स्टे के सवाल पर हमारे बीच राय का मतभेद है। ऐसी परिस्थितियों में मामले को रजिस्ट्री के समक्ष रखा जाना चाहिए, जो इसे माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करेगी।”

3. ‘ओपन कोर्ट का आदेश चैंबर में नहीं बदला जा सकता’: याचिकाकर्ता के वकील की कड़ी आपत्ति

  • वॉयज़िट टेक्नोलॉजी के वरिष्ठ वकील पी.सी. शशिधरन ने इस संदर्भ पर तीव्र विरोध दर्ज कराया। उन्होंने दावा किया कि 27 अक्टूबर को खुली अदालत में दोनों जज स्टे देने पर एकमत थे:“यदि मतभेद था, तो वह उसी समय खुली अदालत में स्वतंत्र आदेश के रूप में आना चाहिए था, बाद में नहीं—अन्यथा यह आदेश को वापस लेने (Recall) या चैंबर में फैसले की समीक्षा करने के समान होगा। खुली अदालत में जो सुनाया गया है, उसे बिना किसी रिकॉल अर्जी के बदला नहीं जा सकता। हमारा यह विरोध आदेश में दर्ज किया जाए।”
  • इस पर न्यायमूर्ति के. नटराजन ने दो-टूक कहा: “कुछ भी दर्ज नहीं किया जाएगा (Nothing will be noted)।”

4. ‘मैंने 27 अक्टूबर को ही स्टे का विरोध किया था’: जस्टिस जॉनसन जॉन का स्पष्टीकरण

  • वकील शशिधरन के इस दावे पर कि दोनों जज पहले सहमत थे, जस्टिस जॉन ने कड़ा रुख अपनाया:“स्टे के प्रश्न पर मेरा मतभेद उसी समय (27 अक्टूबर को ही) व्यक्त कर दिया गया था। जब मैंने अपनी असहमति जताई थी, तब मैंने स्पष्ट कहा था कि इस मामले को शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाया जाए और मामले के गुण-दोष (Merits) को छूने वाला कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं होगा।”
  • न्यायमूर्ति नटराजन ने हस्तक्षेप करते हुए साफ किया:“आज की लिस्टिंग विस्तृत बहस सुनने के लिए नहीं है, बल्कि मामले को तीसरे जज (Third Bench) के पास भेजने हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित करने के लिए है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (जून–अक्टूबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ
मूल कॉर्पोरेट विवादथिंक एंड लर्न प्राइवेट लिमिटेड (Byju’s की मूल कंपनी) के विरुद्ध NCLT में लंबित कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP)।
पुनर्विचार याचिकाकर्तावॉयज़िट टेक्नोलॉजी (Voizzit Technology) — एक लेनदार/दावेदार जिसने Byju’s के स्वामित्व अधिकारों का दावा किया है।
आक्षेपित निर्णय (12 जून 2026)हाईकोर्ट की खंडपीठ का वह फैसला, जिसने अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) और अमेरिकी ऋणदाता ग्लास ट्रस्ट (GLAS Trust Company LLC) के खिलाफ CBI/SFIO जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी।
पुनर्विचार याचिका के मुख्य आधार1. फर्जी दस्तावेज का आरोप: ग्लास ट्रस्ट ने क्रेडिटर्स कमेटी (CoC) में 1.2 बिलियन डॉलर के ऋण के आधार पर प्रमुख वोटिंग शेयर पाने के लिए 25 जुलाई 2024 का ‘मनगढ़ंत/जाली निर्देश पत्र’ (Fabricated Direction Letter) इस्तेमाल किया।
2. IBBI का अनुशासनात्मक आदेश: पूर्व आईआरपी के खिलाफ भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड (IBBI) ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की, जिसे हाईकोर्ट ने पहले अनदेखा किया था।
3. EY पर हितों के टकराव का आरोप: समाधान पेशेवर इकाई (IPE) के रूप में नियुक्त अर्न्स्ट एंड यंग (EY) ने उचित सत्यापन के बिना ग्लास ट्रस्ट को CoC में शामिल कराया।
खंडपीठ का अंतिम आदेश1. पुनर्विचार याचिका को विचारार्थ स्वीकार (Admitted) किया गया।
2. 12 जून के मूल फैसले पर रोक (Stay) लगाने के मुद्दे पर खंडपीठ में मतभेद।
3. मुख्य न्यायाधीश को निर्देश कि वे इस बिंदु पर फैसले हेतु मामले को तीसरे न्यायाधीश (Third Judge) को सौंपें।

विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘खंडपीठ में मतभेद और तीसरे जज का संदर्भ’

  • खंडपीठ के मतभेद पर वैधानिक प्रक्रिया (CPC Section 98 & High Court Act):
    • सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 98(2) और केरल उच्च न्यायालय अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, यदि दो न्यायाधीशों की खंडपीठ किसी अपील या याचिका में किसी विशिष्ट प्रश्न पर एकमत नहीं हो पाती है, तो उस विशिष्ट प्रश्न को तीसरे न्यायाधीश के समक्ष रखा जाता है।
    • तीसरे न्यायाधीश का निर्णय आने के बाद, जिस पक्ष में बहुमत (2:1) होगा, वही अदालत का अंतिम आदेश माना जाएगा। वर्तमान मामले में दोनों न्यायाधीश पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करने पर सहमत हैं, किंतु क्या मूल आदेश पर रोक (Stay) लगाई जाए या नहीं, इस पर मतभेद के कारण अंतिम निर्णय तीसरे जज की राय पर निर्भर करेगा।
  • खुली अदालत में घोषणा बनाम हस्ताक्षरित आदेश:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और विनोद कुमार सिंह बनाम बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में यह स्थापित किया है कि यद्यपि खुली अदालत में सुनाया गया आदेश तब तक पूरी तरह अंतिम नहीं होता जब तक कि वह हस्ताक्षरित और अपलोड न हो जाए, फिर भी यदि न्यायाधीशों ने खुली अदालत में कोई आदेश स्पष्ट रूप से बोला है, तो बिना पक्षों को दोबारा सुने या बिना औपचारिक अर्जी के उसमें कोई सारभूत बदलाव (Substantive Alternation) नहीं किया जा सकता।
    • हालांकि, जस्टिस जॉनसन जॉन के रुख से यह स्पष्ट हुआ कि 27 अक्टूबर को स्टे के बिंदु पर कभी भी दोनों जजों की सहमति नहीं बनी थी, जिसके कारण आज औपचारिक ‘डिसेंट/रेफरल’ आदेश खुली अदालत में डिक्टेट किया गया।
  • आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग की प्रशासनिक विसंगति:
    • उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अगली तारीख 6 नवंबर 2026 प्रदर्शित होने के बावजूद मामले का अचानक कोर्ट रूम 6D में लग जाना रजिस्ट्री की प्रक्रियात्मक विफलता को दर्शाता है।
    • कनिष्ठ न्यायाधीश की यह सार्वजनिक टिप्पणी कि उन्हें इस लिस्टिंग की जानकारी नहीं थी, अदालती प्रशासन और रोस्टर प्रबंधन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: केरल उच्च न्यायालय (कोर्ट रूम 6D – अपीलीय/पुनर्विचार क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: वॉयज़िट टेक्नोलॉजी प्रा. लि. बनाम थिंक एंड लर्न प्रा. लि. (Byju’s) व अन्य [RP No. … / 2026 in WA No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति के. नटराजन एवं न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: पुनर्विचार याचिका एडमिट; अंतरिम रोक (Stay) पर जजों में मतभेद; मामला तीसरे जज को सौंपने हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • पुनर्विचार याचिकाकर्ता (वॉयज़िट टेक्नोलॉजी) की ओर से: अधिवक्ता पी.सी. शशिधरन (Advocate PC Sasidharan)।
  • प्रतिवादी पक्ष (अर्न्स्ट एंड यंग / EY) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष मैथ्यू (Senior Advocate Santosh Mathew)।
  • प्रतिवादी पक्ष (Byju’s / थिंक एंड लर्न व ग्लास ट्रस्ट) की ओर से: संबंधित कॉर्पोरेट विधि फर्मों के अधिवक्ता।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC, 2016) — कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) एवं क्रेडिटर्स कमेटी (CoC) की संरचना
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
      • धारा 114 व आदेश XLVII नियम 1 — उच्च न्यायालय की पुनर्विचार शक्तियां (Review Jurisdiction)
      • धारा 98(2) — खंडपीठ में मतभेद होने पर तीसरे न्यायाधीश को संदर्भ की प्रक्रिया
    • केरल उच्च न्यायालय अधिनियम, 1958 — धारा 5(ii) (डिवीजन बेंच के जजों के बीच मतभेद का निस्तारण)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक मतभेद और प्रक्रियात्मक शुचिता का विधिक मानक: ‘जब खंडपीठ के दो सदस्य अंतरिम राहत (Stay) के प्रश्न पर परस्पर विरोधी दृष्टिकोण रखते हों, तो न्यायिक मर्यादा और सांविधिक प्रक्रिया का यह अनिवार्य तकाजा है कि मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि किसी तीसरे न्यायाधीश की राय प्राप्त की जा सके; इसके साथ ही, अदालती रजिस्ट्री को पूर्व निर्धारित सुनवाई तिथियों की अनदेखी कर किसी भी पीठ के कनिष्ठ या वरिष्ठ न्यायाधीश की पूर्व सहमति के बिना मामलों को आउट-ऑफ-टर्न सूचीबद्ध करने से बचना चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी कदम: केरल उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री अब इस पत्रावली को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करेगी; मुख्य न्यायाधीश द्वारा तीसरे न्यायाधीश की नियुक्ति किए जाने के बाद वह विशेष एकल/खंडपीठ यह तय करेगी कि क्या Byju’s की दिवाला कार्यवाही की सीबीआई जांच खारिज करने वाले जून के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जानी चाहिए या नहीं।

Byju’s Insolvency:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि
पीठन्यायमूर्ति के. नटराजन एवं न्यायमूर्ति जॉन्सन जॉन
मामला/विषयवोइज़िट टेक्नोलॉजी बनाम थिंक एंड लर्न प्रा. लि. (बायजू दिवालियापन विवाद में पुनर्विचार याचिका)
याचिकाकर्तावोइज़िट टेक्नोलॉजी (Voizzit Technology) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता पी.सी. ससीधरन
प्रतिवादी पक्षअर्नस्ट एंड यंग (EY – इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल इकाई) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष मैथ्यू
मूल विवादबायजू की दिवालियापन प्रक्रिया (CIRP) में अनियमितताओं की सीबीआई जांच खारिज करने वाले 12 जून के फैसले पर पुनर्विचार; तथा CIRP पर अंतरिम रोक (Stay) की मांग।
अदालत का फैसलामामला तीसरे जज (Third Bench) को संदर्भित: अंतरिम स्टे (Stay) के प्रश्न पर पीठ में मतभेद होने के कारण फाइल को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास भेजा गया।
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