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मामले की पृष्ठभूमि: हाईकोर्ट के कड़े रुख और पाबंदी की वजह
- करोड़ों रुपये के रियल एस्टेट घोटाले का आरोप:यह मामला गुप्ता प्रॉपर्टी डेवलपर्स के पार्टनर सुभाष गुप्ता द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका से उपजा है। डेवलपर्स और प्रमोटरों पर आरोप है कि उन्होंने रोहतक और आसपास के क्षेत्रों में रियल एस्टेट परियोजनाओं के नाम पर आम खरीदारों से करोड़ों रुपये एकत्र किए, लेकिन न तो कब्जा दिया और न ही पैसे लौटाए।
- जांच और विरोधाभासी जमानत आदेशों पर HC का संज्ञान:पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पाया कि रोहतक एसपी गौरव राजपुरोहित के नेतृत्व वाली विशेष जांच टीम (SIT) द्वारा मामले की जांच किए जाने के बावजूद मुख्य आरोपियों को बचाने की कोशिशें की गईं। हाईकोर्ट ने नोट किया कि एक ही न्यायिक अधिकारी द्वारा:
- एक छोटे कर्मचारी (गुरविंदर जीत सिंह) की जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
- जबकि मुख्य कंपनी DHL इंफ्राटेक के तीन निदेशकों और उसके अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (सिद्धांत) को अंतरिम अग्रिम जमानत दे दी गई, जो कि अन्य घोटालों में भी आरोपी थे।
- रोहतक अदालतों पर रोक और IPS जांच के आदेश:हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की थी कि व्यवस्थित आर्थिक अपराधों और रियल एस्टेट धोखाधड़ी को महज ‘अनुबंधात्मक विवाद’ (Isolated Contractual Disputes) का रूप देकर निपटाने का प्रयास किया जाता है। इसके चलते हाईकोर्ट ने:
- रोहतक की अदालतों को इस मामले में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई से रोक दिया था।
- हरियाणा सरकार को मामले की स्वतंत्र जांच हेतु एक वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए थे।
सर्वोच्च न्यायालय का रुख:
सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जिसने स्थानीय सत्र न्यायालयों के क्षेत्राधिकार को सीमित कर दिया था।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय का विशेष अनुमति अपीलीय क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 227 (उच्च न्यायालय की सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति बनाम वैधानिक ज़मानत क्षेत्राधिकार को पंगु करने की सीमा), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 480 व 482 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 437, 438 व 439 (ज़मानत व अग्रिम ज़मानत पर विचार करने का सत्र न्यायालय का सांविधिक अधिकार), तथा रियल एस्टेट निवेश घोटालों में बिल्डरों-डेवलपर्स के खिलाफ जांच की निष्पक्षता के विधिक मानकों पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice JB Pardiwala) और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की खंडपीठ ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस असाधारण आदेश पर रोक (Stay of Operation) लगा दी है, जिसके तहत रोहतक सत्र प्रभाग (Rohtak Sessions Division) के सभी न्यायिक अधिकारियों को DHL रियल एस्टेट घोटाले से संबंधित किसी भी मामले में अभियुक्तों की नियमित या अग्रिम ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई करने से पूरी तरह रोक दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2026 के आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार और संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए औपचारिक नोटिस जारी किया है।
शीर्ष अदालत का आदेश और न्यायिक हस्तक्षेप
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “नोटिस जारी किया जाता है, जो चार सप्ताह में वापस योग्य (Returnable in four weeks) होगा। इसके अतिरिक्त दस्ती तामील (Dasti Service) की भी अनुमति दी जाती है। इस बीच, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा CRM M-42815/2026 में पारित विवादित आदेश दिनांक 30.09.2026 के संचालन पर रोक (Stay of Operation) रहेगी।”
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का 30 सितंबर 2026 का विवादित आदेश
यह विवाद ‘गुप्ता प्रॉपर्टी डेवलपर्स’ (शिवजी) के भागीदार सुभाष गुप्ता द्वारा दायर अग्रिम ज़मानत याचिका की सुनवाई के दौरान उत्पन्न हुआ था। मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 120-B (आपराधिक षड्यंत्र) और 506 (आपराधिक धमकी) [तत्समान BNS की धारा 318(4), 61 और 351(2)] के तहत दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है।
1. ‘व्यवस्थित धोखाधड़ी को मात्र दीवानी अनुबंध विवाद का चोला पहनाया गया’:
- उच्च न्यायालय ने रियल एस्टेट कंपनियों के कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था:“रियल एस्टेट डेवलपर्स अक्सर समय पर कब्जा देने का झूठा वादा करके घर खरीदारों से करोड़ों रुपये एकत्र करते हैं, यह जानते हुए भी कि प्रोजेक्ट्स पूरे नहीं किए जा सकते, और बाद में उस निवेश राशि को अन्यत्र स्थानांतरित (Siphon off) कर देते हैं।ऐसे व्यवस्थित धोखाधड़ी (Systematic Frauds) को केवल एक पृथक संविदात्मक विवाद (Isolated Contractual Dispute) के रूप में पेश किया जाता है, किंतु जब अदालतें ऐसे विवादों की गहराई से जांच करती हैं, तो यह निर्दोष खरीदारों की जीवन भर की कमाई को लूटने की एक बड़ी साजिश (Larger Conspiracy) का हिस्सा निकलती है।”
2. रोहतक की अधीनस्थ अदालतों के ज़मानत आदेशों में कथित विरोधाभास:
- हाईकोर्ट ने रोहतक की अदालतों में ज़मानत याचिकाओं के निस्तारण के तौर-तरीकों पर गंभीर आपत्ति जताई थी:
- DHL इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक कुलदीप कुमार तहलन को ज़मानत दे दी गई, जबकि गुप्ता प्रॉपर्टी डेवलपर्स के एक साधारण कर्मचारी गुरविंदर जीत सिंह की ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई।
- इसके अलावा, DHL इंफ्राटेक के तीन निदेशकों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (सिद्धांत) को उसी पीठासीन अधिकारी द्वारा अंतरिम अग्रिम ज़मानत दे दी गई, जिसने हाईकोर्ट के समक्ष आए वर्तमान याचिकाकर्ता की ज़मानत खारिज की थी।
- यह भी तथ्य सामने आया कि ये आरोपी अन्य आर्थिक घोटालों में भी कथित रूप से संलिप्त थे।
3. रोहतक की अदालतों को ज़मानत सुनने से रोका गया था:
- जांच और ज़मानत आदेशों में इन विसंगतियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अत्यंत असाधारण कदम उठाते हुए रोहतक सत्र प्रभाग के न्यायिक अधिकारियों को इस मामले में ज़मानत आवेदन सुनने से रोक दिया था और हरियाणा सरकार को निर्देश दिया था कि वह मामले की स्वतंत्र जांच के लिए एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी (Senior IPS Officer) को नियुक्त करे।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मामले का संदर्भ | DHL रियल एस्टेट एवं गुप्ता प्रॉपर्टी डेवलपर्स निवेश घोटाला (रोहतक, हरियाणा)। |
| मूल अपराध व धाराएं | IPC धारा 420 (धोखाधड़ी), 120-B (षड्यंत्र), 506 (धमकी) [तत्समान BNS धारा 318(4), 61, 351(2)]। |
| कथित धोखाधड़ी का स्वरूप | घर खरीदारों और निवेशकों से आवासीय/व्यावसायिक प्रोजेक्ट्स के नाम पर करोड़ों रुपये एकत्र किए गए; न तो भूखंड/फ्लैट का पजेशन दिया गया और न ही मूल रकम लौटाई गई। |
| जांच एजेंसी | रोहतक के पुलिस अधीक्षक (SP) गौरव राजपुरोहित की अध्यक्षता वाली विशेष जांच टीम (SIT)। |
| हाईकोर्ट का आदेश (30.09.2026) | 1. रोहतक सत्र न्यायालय के न्यायिक अधिकारियों को इस मामले में कोई भी ज़मानत याचिका सुनने से प्रतिबंधित किया गया। 2. हरियाणा सरकार को स्वतंत्र जांच हेतु वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी नियुक्त करने का आदेश दिया। |
| सुप्रीम कोर्ट में चुनौती | सुभाष गुप्ता व अन्य द्वारा हाईकोर्ट के आदेश को अधिकार-क्षेत्रीय अतिक्रमण और अधीनस्थ न्यायपालिका के सांविधिक अधिकारों का हनन बताते हुए चुनौती दी गई। |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम अंतरिम आदेश (27.10.2026) | हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2026 के विवादित आदेश के संचालन पर पूर्ण अंतरिम रोक (Stay); चार सप्ताह में जवाब तलब। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अधीनस्थ अदालतों का सांविधिक क्षेत्राधिकार और हाईकोर्ट के अधीक्षण की सीमा’
- सत्र न्यायालयों के वैधानिक क्षेत्राधिकार को कंबल आदेश द्वारा नहीं छीना जा सकता:
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 और 439 (तत्समान BNSS की धारा 482 और 483) के तहत संसद ने सत्र न्यायालय (Court of Sessions) को उच्च न्यायालय के समवर्ती (Concurrent) रूप से ज़मानत और अग्रिम ज़मानत सुनने का मूल सांविधिक अधिकार दिया है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्थापित किया है कि भले ही उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका पर प्रशासनिक और न्यायिक अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति प्राप्त है, किंतु वह किसी पूरे जिले के न्यायिक अधिकारियों को किसी विशिष्ट एफआईआर में वैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने से प्रतिबंधित (Blanket Injunction) नहीं कर सकता।
- व्यक्तिगत आदेशों की न्यायिक समीक्षा बनाम संस्थागत रोक:
- यदि रोहतक की अदालत ने किसी सह-अभियुक्त (जैसे कुलदीप तहलन) को अनुचित आधार पर ज़मानत दी थी, तो राज्य सरकार या पीड़ित पक्ष के पास धारा 439(2) CrPC के तहत उस ज़मानत को रद्द कराने (Cancellation of Bail) की अर्जी दाखिल करने का विधिक उपचार उपलब्ध था।
- एक विशिष्ट आदेश से असंतुष्ट होकर पूरे सत्र प्रभाग के न्यायिक अधिकारियों पर अविश्वास प्रकट करना और उनके न्यायिक कार्य पर रोक लगाना अधीनस्थ न्यायपालिका के मनोबल और उसकी स्वतंत्रता को चोट पहुंचाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का मुख्य आधार यही संतुलन बहाल करना है।
विधिक विवरण एवं संबद्ध प्रावधान
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (विशेष अनुमति अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: सुभाष गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य व अन्य [Special Leave to Appeal (Crl.) No. … / 2026]
- संबद्ध हाईकोर्ट मामला: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ — CRM M-42815/2026 (आदेश दिनांक 30.09.2026)
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: हाईकोर्ट के आदेश के संचालन पर रोक; प्रतिवादियों को 4 सप्ताह का नोटिस।
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका) एवं अनुच्छेद 227 (अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC):
- धारा 438 व 439 — अग्रिम एवं नियमित ज़मानत संबंधी सत्र न्यायालय व उच्च न्यायालय की समवर्ती शक्तियां / BNSS 2023 की धारा 482 व 483
- धारा 439(2) — ज़मानत रद्द करने का प्रावधान
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 318(4) — धोखाधड़ी (पूर्ववर्ती IPC 420)
- धारा 61 — आपराधिक षड्यंत्र (पूर्ववर्ती IPC 120-B)
- धारा 351(2) — आपराधिक धमकी (पूर्ववर्ती IPC 506)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सत्र अदालतों के ज़मानत क्षेत्राधिकार का विधिक मानक: ‘उच्च न्यायालय अपने अधीक्षण क्षेत्राधिकार के तहत सत्र प्रभाग के न्यायिक अधिकारियों को किसी मामले में सांविधिक ज़मानत आवेदनों पर सुनवाई करने से सामान्य रूप से प्रतिबंधित नहीं कर सकता; यदि किसी अधीनस्थ अदालत द्वारा पारित ज़मानत आदेश में विसंगति या वैधानिक त्रुटि हो, तो उचित विधिक उपचार ज़मानत रद्दीकरण की याचिका है, न कि समूची सत्र अदालत के क्षेत्राधिकार पर न्यायिक रोक लगाना।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट द्वारा 30 सितंबर 2026 के आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद, रोहतक सत्र प्रभाग के न्यायिक अधिकारी अब DHL रियल एस्टेट धोखाधड़ी मामले से संबंधित अभियुक्तों की ज़मानत व अग्रिम ज़मानत याचिकाओं पर कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने के लिए पुनः स्वतंत्र हैं; चार सप्ताह बाद सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली विस्तृत सुनवाई होगी।
Court Verdict: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| मामला/साइटेशन | रोहतक रियल एस्टेट (DHL) घोटाला मामला [SLP (Crl) / CRM M-42815/2026 से उद्भूत] |
| चुनौतीपूर्ण आदेश | पंजाब एंड हरियाणा उच्च न्यायालय का 30 सितंबर 2026 का आदेश |
| मूल अपराध दर्ज | IPC की धारा 420, 120-B और 506 (BNS की धारा 318(4), 61 और 351(2)) के तहत मामला दर्ज |
| संबंधित पक्ष/कंपनी | DHL इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड (DHL Infratech Pvt Ltd) एवं गुप्ता प्रॉपर्टी डेवलपर्स |
| अदालत का अंतरिम फैसला | रोहतक अदालतों पर लगाई गई पाबंदी स्थगित; हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए 4 सप्ताह में जवाब तलब किया गया। |

