Tuesday, June 9, 2026
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Creamy Layer: यदि माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं, तो बच्चों को आरक्षण क्यों मिले?, यह सवाल आर्थिक समृद्ध एक दंपत्ति से पूछा…पढ़िए केस

Creamy Layer: सुप्रीम कोर्ट ने देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के तहत ‘क्रिमी लेयर’ (Creamy Layer / संपन्न वर्ग) की परिभाषा और सामाजिक गतिशीलता को लेकर एक बेहद गंभीर और विचारणीय टिप्पणी की है।

कर्नाटक राज्य के दोनों अधिकारी ने अगली पीढ़ी को आरक्षण देने की मांग की

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भूयान की पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें याचिकाकर्ता को ‘क्रिमी लेयर’ के आधार पर आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के फैसले को सही ठहराया गया था। याचिकाकर्ता के माता-पिता दोनों कर्नाटक राज्य सरकार के कर्मचारी हैं। अदालत ने सवाल उठाया है कि जो परिवार आरक्षण का लाभ उठाकर शैक्षणिक और आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुके हैं, क्या उनकी अगली पीढ़ी को भी आरक्षण मिलना चाहिए? अदालत के मुताबिक, आर्थिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण से सामाजिक प्रतिष्ठा (Social Mobility) अपने आप आ जाती है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने तल्ख लहजे में कहा, यदि माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक गतिशीलता (रुतबा) आती है। यदि इसके बाद भी बच्चों के लिए आरक्षण की मांग की जाती रहेगी, तो हम कभी भी इस व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पाएंगे। यह एक ऐसा मामला है जिस पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा। आखिर इसका औचित्य क्या है? आपने आरक्षण दिया। माता-पिता पढ़े-लिखे हैं, अच्छी नौकरियों में हैं, अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं, और फिर बच्चे दोबारा आरक्षण चाहते हैं। देखिए, अब उन्हें आरक्षण से बाहर आना चाहिए।

क्या था पूरा मामला? (कर्नाटक का कुरुबा समुदाय और ₹19.48 लाख की आय)

उम्मीदवार की स्थिति: यह कानूनी विवाद कर्नाटक में असिस्टेंट इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) पद पर भर्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ‘कुरुबा’ (Kuruba) समुदाय से आता है, जो कर्नाटक के पिछड़ा वर्ग की श्रेणी II(A) के अंतर्गत वर्गीकृत है। उसका चयन आरक्षित श्रेणी के तहत ‘कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ में हुआ था।

सर्टिफिकेट देने से इनकार: जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने उसे ‘जाति वैधता प्रमाण पत्र’ (Caste Validity Certificate) देने से इनकार कर दिया। समिति का निष्कर्ष था कि वह ‘क्रिमी लेयर’ के दायरे में आता है।

पारिवारिक आय: अधिकारियों ने पाया कि उम्मीदवार के माता-पिता दोनों सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी संयुक्त वार्षिक आय लगभग ₹19.48 लाख है, जो तय क्रिमी लेयर की सीमा से अधिक है।

कोर्ट रूम बहस: “वेतन बनाम ग्रुप-A/B स्टेटस” की कानूनी जंग

पदों का स्तर (Status) मुख्य आधार: याचिकाकर्ता के वकील शशांक रत्तू ने अदालत के सामने दलील दी कि सरकारी कर्मचारियों के लिए क्रिमी लेयर तय करने का पैमाना केवल ‘सैलरी’ नहीं हो सकता। वकील ने तर्क दिया कि क्रिमी लेयर का निर्धारण माता-पिता के सेवा स्तर (जैसे कि वे ग्रुप ‘ए’ या ग्रुप ‘बी’ सेवा में हैं या नहीं) के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल उनकी वेतन आय पर। यदि केवल वेतन को ही एकमात्र पैमाना मान लिया गया, तो महंगाई और भत्तों के कारण कई बार क्लर्क, चपरासी या ड्राइवर जैसे निचले स्तर के कर्मचारियों के बच्चे भी आरक्षण से बाहर हो जाएंगे।

कर्नाटक सरकार का स्पष्टीकरण: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि माता-पिता की सैलरी और कृषि से होने वाली आय को क्रिमी लेयर की गणना में नहीं जोड़ा जाना चाहिए, केवल व्यापार या अन्य स्रोतों की आय ही गिनी जानी चाहिए। अगर हर तरह की आय जोड़ी गई, तो ओबीसी (OBC) आरक्षण और ईडब्ल्यूएस (EWS / आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने काउंटर उदाहरण देते हुए कहा कि इस मामले में पिता का मूल वेतन ₹53,900 प्रति माह और मां का मूल वेतन ₹52,650 प्रति माह है। दोनों बेहद अच्छी स्थिति में हैं और जब समाज में उनका स्तर सुधर चुका है, तो इस अपवर्जन (Exclusion) को चुनौती देना कितना सही है, इस संतुलन को ध्यान में रखना होगा।

विश्लेषण: हाई कोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट का रुख

इस मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने पहले उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे डिवीजन बेंच (दो जजों की पीठ) ने पलट दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।

अदालती चरण और नीतियांप्रमुख कानूनी बिंदु व निष्कर्ष
केंद्र बनाम राज्य की नीतिकर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया था कि केंद्र सरकार का 8 सितंबर 1993 का जो कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) है—जो क्रिमी लेयर के निर्धारण के लिए वेतन आय को शामिल न करने की बात करता है—वह केवल केंद्र सरकार की नौकरियों पर लागू होता है, कर्नाटक राज्य की आरक्षण नीति पर नहीं।
राज्य का क्रिमी लेयर दायराहाई कोर्ट ने पाया कि राज्य की नीति के अनुसार याचिकाकर्ता के परिवार की कुल आय तय सीमा से अधिक थी, इसलिए वह क्रिमी लेयर में ही आएगा।
सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान कदमसुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दलीलों को सुनने के बाद इस कानूनी मुद्दे की विस्तृत समीक्षा करने के लिए याचिका पर नोटिस जारी (Issue Notice) कर दिया है
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