Sale Deed: निजी संपत्तियों पर राजस्व विभागों द्वारा मनमाने ढंग से बोर्ड लगाने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
ज्योति एस्टेट्स की ओर से रिट याचिका दायर
हाईकोर्ट के जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी की एकल पीठ ने ज्योति एस्टेट्स द्वारा दायर एक रिट याचिका को मंजूर (Allow) करते हुए तेलंगाना सरकार को याचिकाकर्ता की संपत्ति से ‘सरकारी जमीन’ का साइनबोर्ड तुरंत हटाने का निर्देश दिया है। कहा, केवल टाउन सर्वे लैंड रजिस्टर (TSLR) में दर्ज प्रविष्टियों (Entries) के आधार पर सरकार किसी जमीन पर अपना मालिकाना हक (Title) नहीं जता सकती और न ही वहां ‘सरकारी भूमि’ का साइनबोर्ड लगा सकती है। राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) या सर्वे प्रविष्टियां केवल कर और प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए होती हैं, वे किसी भी तरह से मालिकाना हक का कानूनी दस्तावेज नहीं हैं। यदि राज्य को किसी जमीन पर अपना दावा साबित करना है, तो उसे एक आम नागरिक की तरह सक्षम सिविल कोर्ट (Civil Court) जाकर अपनी टाइटल डीड पेश करनी होगी।
मामला क्या है?: 1955 की रजिस्ट्री बनाम सरकारी सर्वे रिकॉर्ड
यह कानूनी विवाद हैदराबाद के पॉश इलाके हिमायतनगर में स्थित 331 वर्ग गज की एक बेशकीमती जमीन के मालिकाना हक को लेकर है।
याचिकाकर्ता का दावा: ज्योति एस्टेट्स ने अदालत को बताया कि इस जमीन का मालिकाना हक साल 1955 के एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Registered Sale Deed) से जुड़ा है। एक लंबी कानूनी लड़ाई और स्पेसिफिक परफॉर्मेंस (Specific Performance) के मुकदमे में डिग्री मिलने के बाद हाई कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
अचानक लगा बोर्ड: जून 2020 में, स्थानीय राजस्व अधिकारियों ने अचानक इस जमीन पर पहुंचकर एक साइनबोर्ड गाड़ दिया, जिस पर लिखा था—’यह सरकार की भूमि है।’ सरकार का दावा था कि टाउन सर्वे लैंड रजिस्टर (TSLR) में इस जमीन को सरकारी वर्गीकृत किया गया है।
1998 का ‘एनओसी’ (NOC) बना सबसे बड़ा हथियार: याचिकाकर्ता ने सरकार के इस कदम को चुनौती देते हुए साल 1998 में खुद राजस्व विभाग द्वारा जारी ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ (No Objection Certificate) कोर्ट के सामने पेश किया। यह एनओसी उस समय निर्माण अनुमति के लिए जारी की गई थी, जिसमें साफ दर्ज था कि इस जमीन पर 40 से अधिक वर्षों से एक पुराना निजी भवन मौजूद है और इसके लिंक दस्तावेज सही हैं।
हाई कोर्ट का रुख: “एक बार सही मानना, एक बार गलत कहना (Approbation and Reprobation) कानूनन गलत”
राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता के पूर्वजों ने कभी आंध्र प्रदेश सर्वे और सीमा अधिनियम, 1923 के तहत टीएसएलआर (TSLR) की प्रविष्टियों को समय पर चुनौती नहीं दी थी, इसलिए अब यह रिकॉर्ड अंतिम (Final) हो चुका है और जमीन सरकार की है। कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए निम्नलिखित मुख्य विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए।
राजस्व रिकॉर्ड टाइटल (मालिकाना हक) का सबूत नहीं हैं
हाई कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले आंध्र प्रदेश राज्य बनाम हैदराबाद पॉटरीज़ प्राइवेट लिमिटेड और जी. सत्यनारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए दोहराया कि टाउन सर्वे रजिस्टर (TSLR) या खतौनी/पटवारी रिकॉर्ड केवल राजस्व संग्रह और सर्वेक्षण के उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं। इनसे न तो किसी का मालिकाना हक पैदा होता है और न ही खत्म होता है।
सरकार का दोहरा रवैया अवैध (Doctrine of Estoppel)
अदालत ने पाया कि जब सरकार ने खुद 1998 में सभी लिंक दस्तावेजों की जांच के बाद एनओसी जारी कर यह स्वीकार किया था कि जमीन पर दशकों से निजी कब्जा है, तो अब वही सरकार अपने ही पुराने फैसले से मुकर नहीं सकती। जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने टिप्पणी की, राजस्व अधिकारियों का यह आचरण कानून के स्थापित सिद्धांत ‘एप्रोबेशन एंड रीप्रोबेशन’ (एक ही समय में किसी बात को सही और गलत कहना) के दायरे में आता है, जिसकी कानून में बिल्कुल भी अनुमति नहीं है।
सरकार के पास कोई विधिक दस्तावेज नहीं
कोर्ट ने नोट किया कि टीएसएलआर (TSLR) की प्रविष्टि के अलावा, राज्य सरकार अदालत के समक्ष ऐसा कोई भी मूल दस्तावेज (जैसे सरकारी अनुदान या लैंड एक्विजिशन के कागजात) पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि जमीन कभी राज्य की मिल्कियत रही थी। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के पास 1955 से लेकर अब तक के वैध टाइटल डॉक्युमेंट्स मौजूद हैं।
अदालत का अंतिम आदेश
तेलंगाना हाई कोर्ट ने सरकार की कार्रवाई को पूरी तरह से अवैध और मनमाना पाते हुए निर्देश जारी किए।
बोर्ड हटाने का आदेश: अधिकारियों को याचिकाकर्ता की निजी संपत्ति पर लगाया गया ‘सरकारी जमीन’ का साइनबोर्ड तत्काल हटाने का आदेश दिया जाता है।
सिविल कोर्ट जाने की छूट: हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि सरकार को अभी भी लगता है कि जमीन उसकी है, तो वह स्वतंत्र है कि वह सक्षम सिविल कोर्ट (Appropriate Civil Forum) में जाकर अपने मालिकाना हक की घोषणा (Declaration of Title) का मुकदमा दायर करे। यदि सिविल कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला सुनाता है, तभी वह कानून के अनुसार आगे बढ़ सकती है।
केस मैट्रिक्स: तेलंगाना हाई कोर्ट का आदेश (2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | तेलंगाना उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | तेलंगाना उच्च न्यायालय, हैदराबाद |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी (एकल पीठ) |
| साइटेशन (Citation) | 2026 LiveLaw (Tel) 95 |
| मुख्य याचिकाकर्ता | ज्योति एस्टेट्स (Jyothi Estates) |
| विवादित जमीन का स्थान | हिमायतनगर, हैदराबाद (331 वर्ग गज) |
| ऐतिहासिक विधिक नजीर | आंध्र प्रदेश राज्य बनाम हैदराबाद पॉटरीज़ प्राइवेट लिमिटेड (Supreme Court) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका मंजूर; सरकारी साइनबोर्ड हटाने का निर्देश, केवल TSLR को मालिकाना हक का आधार मानने से इनकार। |

