Sunday, September 20, 2026
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Cyber Ransom: बच्चों के मेंटल हेल्थ डेटा पर हैकर ने मांगी 7.5 लाख डॉलर की फिरौती…कैसे हुई घटना व केस में आगे क्या हुआ, यहां पढ़ें

Cyber Ransom: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बच्चों के बेहद संवेदनशील डेटा लीक और साइबर फिरौती (cyber ransom) से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में तत्काल एकतरफा अंतरिम राहत (Ex Parte Ad Interim Relief) दी है।

एक चैरिटेबल एजुकेशनल ट्रस्ट के डेटाबेस को हैक करने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर की सिंगल बेंच ने इस मामले को “बेहद परेशान करने वाला” (most disturbing) बताते हुए डेटा के आगे प्रसार और प्रकाशन पर तत्काल रोक लगा दी है। एक चैरिटेबल एजुकेशनल ट्रस्ट के डेटाबेस को हैक कर ‘FulcrumSec’ नाम के हैकर ने 7,50,000 अमेरिकी डॉलर (करीब 6.2 करोड़ रुपये) की रंगदारी मांगी थी। फिरौती न मिलने पर हैकर ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य (mental health) से जुड़े गोपनीय रिकॉर्ड एक पैरेंट को लीक कर दिए।

बच्चों की सुरक्षा पर भारी खतरा: क्या-क्या हुआ लीक?

‘प्रतीक्षा फाउंडेशन चैरिटेबल ट्रस्ट’ (जो कई शैक्षणिक संस्थान चलाता है) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. बीरेंद्र सराफ ने कोर्ट को बताया कि हैक किए गए डेटाबेस में हजारों बच्चों की ऐसी जानकारियां थीं, जो उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल सकती हैं। लीक हुए डेटा में बच्चों के स्कूल आने-जाने का डेली मूवमेंट प्लान (वे कब और कहां से सफर करते हैं), बच्चों के मेडिकल और मेंटल हेल्थ रिकॉर्ड, पेरेंट्स का पेशा, उनकी सालाना आमदनी और अन्य निजी जानकारियां शामिल हैं।

यह है घटनाक्रम

12 मई 2026: हैकर (Defendant No. 1) ने खुद को “साइबर क्रिमिनल” बताते हुए ट्रस्ट को ईमेल भेजा और चरणबद्ध तरीके से डेटा लीक करने की धमकी देकर $750,000 की मांग की।

बातचीत का प्रयास: कानूनी सलाह पर ट्रस्ट ने हैकर की पहचान उजागर करने के लिए उससे बातचीत की और कुछ रकम देने का प्रस्ताव भी रखा (इस पूरी बातचीत का हलफनामा ट्रस्ट दो हफ्ते में कोर्ट में जमा करेगा)।

10 जून 2026 (ट्रिगर पॉइंट): फिरौती न मिलने पर हैकर ने एक पैरेंट को ईमेल भेजकर कई बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की संवेदनशील जानकारियां लीक कर दीं। इसके बाद ट्रस्ट ने तुरंत कोर्ट का रुख किया।

कोर्ट ने बिना नोटिस दिए (Ex Parte) तुरंत एक्शन क्यों लिया?

ट्रस्ट के वकील ने दलील दी कि अगर इस मामले में हैकर या प्रतिवादियों को पहले नोटिस दिया जाता, तो वे पकड़े जाने के डर से सारा डेटा इंटरनेट पर पब्लिक कर देते, जिससे केस का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाता। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील जानकारियों के सार्वजनिक होने से खुद बच्चों पर इसका बेहद गंभीर और घातक असर (grave and deleterious effects) पड़ सकता है। इसके अलावा बच्चों के मूवमेंट और माता-पिता की आय की जानकारी सार्वजनिक होने से बच्चों की शारीरिक सुरक्षा (physical safety) पर भी सीधा खतरा मंडरा सकता है।

अदालती फैसले का विस्तृत विश्लेषण

यह मामला भारत में डिजिटल डेटा सुरक्षा, बच्चों के अधिकारों और साइबर सुरक्षा के मोर्चे पर एक गंभीर अलार्म है। इस आदेश का विश्लेषण 3 प्रमुख बिंदुओं में किया जा सकता है।

‘Ex Parte’ राहत का महत्व

आमतौर पर अदालतें दोनों पक्षों को सुने बिना आदेश जारी नहीं करतीं। लेकिन सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत, यदि कोर्ट को लगे कि देरी होने से अपूरणीय क्षति (irreparable) होगी, तो वह एकतरफा आदेश (Ex Parte Order) दे सकती है। इस मामले में, बच्चों की ‘निजता का अधिकार’ (Right to Privacy) और ‘शारीरिक सुरक्षा’ दांव पर थी, इसलिए कोर्ट का तुरंत एक्शन लेना बेहद जरूरी था।

साइबर अपराध का नया और खतरनाक चेहरा

यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी अब केवल वित्तीय संस्थानों या कंपनियों को नहीं, बल्कि स्कूलों और बच्चों को निशाना बना रहे हैं। बच्चों के मेंटल हेल्थ डेटा का इस्तेमाल कर ब्लैकमेल करना और पेरेंट्स को सीधे टारगेट करना नार्को-टेररिज्म या फिरौती की बेहद खतरनाक और अनैतिक रणनीति है।

आगे क्या होगा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अंतरिम आवेदन की प्रेयर क्लॉज (a), (c-1), और (c-2) के तहत हैकर और इस डेटा से जुड़े अन्य माध्यमों को इसे आगे कहीं भी शेयर करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। आदेश की कॉपी प्रतिवादियों को तामील कराने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 1 जुलाई 2026 को तय की गई है।

फैसले का निष्कर्ष

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह त्वरित कदम यह संदेश देता है कि जब बात बच्चों के संवेदनशील डेटा और उनकी सुरक्षा की आएगी, तो कानून डिजिटल अपराधियों के खिलाफ बेहद सख्त और तत्पर रुख अपनाएगा। हालांकि, यह घटना देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने डिजिटल डेटाबेस को मजबूत करने की एक बड़ी चेतावनी भी है।

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