Tuesday, August 4, 2026
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Drug News: फार्मा सेक्टर में नकली दवाओं पर हंटर…MEFTAL-SPAS के डुप्लीकेट MEFIAL-SPAS पर लगाया लाइफटाइम बैन

Drug News: देश की जानी-मानी दर्द निवारक दवा ‘MEFTAL-SPAS’ (मेफ्टाल-स्पास) के ट्रेडमार्क और पैकेजिंग की हुबहू नकल करने के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।

ब्लू क्रॉस लैबोरेट्रीज को ₹10 लाख का हर्जाना

हाईकोर्ट के जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर ने ऑल्टो हेल्थकेयर की इस हरकत को पूरी तरह से “बेईमानी और दुर्भावना” से प्रेरित बताते हुए पीड़ित कंपनी ब्लू क्रॉस लैबोरेट्रीज को ₹10 लाख का हर्जाना (कॉस्ट) देने का भी आदेश दिया है। अदालत ने गोरखपुर की एक फार्मा कंपनी ‘ऑल्टो हेल्थकेयर’ (Alto Healthcare) पर इस ब्रांड नाम और इसके पेटेंट डिजाइन का इस्तेमाल करने पर स्थायी रोक (Permanent Injunction) लगा दी है।

सिर्फ ‘T’ की जगह ‘I’ बदला— कोर्ट ने कहा ‘यह तो सरासर चोरी है’

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने दोनों दवाओं के नाम और रैपर (स्ट्रिप) की तुलना की। कोर्ट ने पाया कि विपक्षी कंपनी ने जालसाजी करने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया था।

मूल ब्रांड: MEFTAL-SPAS

नकली ब्रांड: MEFIAL-SPAS

जस्टिस डॉक्टर ने आदेश में लिखा कि आरोपी कंपनी ने मूल ट्रेडमार्क के ‘T’ अक्षर को ‘I’ से बदलकर पूरा नाम हुबहू कॉपी कर लिया। इसके अलावा दवा के पत्ते (Stripe) पर दिखने वाले नीले और लाल रंग के कॉम्बिनेशन, उसकी जियोमेट्रिक बॉर्डर और ओवरऑल लुक (ट्रेड ड्रेस) की भी इतनी सटीक नकल की गई थी कि आम जनता, केमिस्ट और यहां तक कि डॉक्टर भी गच्चा खा जाएं और दोनों को एक ही कंपनी का प्रॉडक्ट समझ लें।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘दवाओं के मामले में भ्रम जानलेवा’

ब्लू क्रॉस लैबोरेट्रीज ने कोर्ट में अपनी गवाही, सेल्स डाक्यूमेंट्स और एफिडेविट के जरिए साबित किया कि ‘MEFTAL’ और ‘MEFTAL-SPAS’ उनके रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क और कॉपीराइट हैं, जिनका देश-विदेश में सालों से बड़ा मार्केट है। अदालत ने माना कि इस तरह की हुबहू नकल से बाजार में भ्रम (confusion) पैदा हो रहा था, जिससे न केवल ब्लू क्रॉस को आर्थिक नुकसान हो रहा था, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ होने का अंदेशा था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि समन मिलने के बाद भी ऑल्टो हेल्थकेयर का कोई प्रतिनिधि कोर्ट की कार्यवाही में शामिल होने नहीं आया, जो यह साबित करता है कि उनकी नीयत शुरू से ही पूरी तरह खोट से भरी थी।

अदालती फैसले का विस्तृत विश्लेषण

फार्मास्यूटिकल सेक्टर में बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights – IPR) और मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से यह फैसला बेहद अहम है:

‘Phonetic and Visual Similarity’ का सिद्धांत

ट्रेडमार्क कानून में ‘ध्वन्यात्मक और दृश्यात्मक समानता’ (Phonetic & Visual Similarity) एक बड़ा पैमाना है। जब दो दवाओं के नाम सुनने में एक जैसे लगें (मेफ्टाल और मेफियाल) और दिखने में भी उनके रैपर समान हों, तो इसे कानूनन ‘पासिंग ऑफ’ (Passing Off) और ट्रेडमार्क का उल्लंघन माना जाता है। कोर्ट ने इसी सिद्धांत के तहत सख्त फैसला सुनाया।

फार्मा कंपनियों को कड़ा संदेश

आमतौर पर ट्रेडमार्क के दीवानी (Civil) मामलों में इतनी भारी-भरकम पेनल्टी (10 लाख रुपये) नहीं लगती, लेकिन दवाओं के मामले में कोर्ट ने कोई ढिलाई नहीं बरती। कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी कंपनी के प्रत्येक प्रतिवादी (Defendant) को 8 हफ्तों के भीतर ब्लू क्रॉस को ₹5-5 लाख (कुल 10 लाख) का भुगतान करना होगा। यदि वे ऐसा करने में नाकाम रहते हैं, तो इस राशि पर 8% सालाना की दर से ब्याज लगेगा।

उपभोक्ताओं (Consumers) की सुरक्षा

यह फैसला इस बात को पुख्ता करता है कि दवा बाजार में ब्रांड की प्रामाणिकता कितनी जरूरी है। अगर कोई कंपनी किसी स्थापित दवा के नाम से मिलती-जुलती नकली दवा बाजार में उतारती है, तो वह सीधे तौर पर उपभोक्ता के जीवन से खिलवाड़ करती है।

कोर्ट में पैरवी: ब्लू क्रॉस लैबोरेट्रीज की ओर से एडवोकेट सिद्धांत गुप्ता, प्राची शाह, अपेक्षा मेहता, राशि ठाकुर और विनोद ए. भगत अदालत में पेश हुए।

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