Tuesday, November 3, 2026
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Daughter’s custody: तलाक के वक्त बेटी को पिता के पास छोड़ना त्याग नहीं…एक केस में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणाी

Daughter’s custody: बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने कहा, तलाक के वक्त मां द्वारा अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी पिता को देना यह साबित नहीं करता कि उसने बच्ची को त्याग दिया।

पांच साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी दे दी

जस्टिस एसजी चपलगांवकर ने कहा कि मां, बच्ची की प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते, उसकी कस्टडी की कानूनी हकदार है। जब तक यह साबित न हो कि मां के पास रहने से बच्ची की भलाई को नुकसान होगा, तब तक कस्टडी मां को मिलनी चाहिए। एक अहम फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए मां को पांच साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी दे दी।

2018 में आपसी सहमति से तलाक के वक्त दी थाी कस्टडी

2018 में आपसी सहमति से तलाक के वक्त बच्ची की कस्टडी पिता को दी गई थी। उस समय बच्ची की देखभाल में पिता की मां मदद कर रही थीं। जनवरी 2025 में पिता की मौत के बाद मां ने नांदेड़ जिले के मुखेड़ की जिला अदालत में बच्ची की कस्टडी मांगी, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दादा-दादी ने बच्ची की अभिभावकता के लिए अलग से अर्जी लगाई।

मां ही बच्ची की एकमात्र अभिभावक: वकील

मां के वकील एसआर बागल ने कोर्ट में दलील दी कि अब मां ही बच्ची की इकलौती जीवित प्राकृतिक अभिभावक है और उसकी परवरिश के लिए सबसे उपयुक्त भी। उन्होंने बताया कि दादा-दादी बुजुर्ग हैं, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं और वे एक ग्रामीण इलाके में रहते हैं, जहां शिक्षा की सुविधाएं सीमित हैं।

यह रही दादा-दादी की दलील

दूसरी ओर, दादा-दादी के वकील यूबी बिलोलिकर ने कहा कि बच्ची उनके साथ अच्छी तरह से एडजस्ट हो चुकी है और कस्टडी बदलने से उसकी मानसिक स्थिति पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मां ने तलाक के बाद बच्ची को छोड़ दिया था।

मां के पास आय का श्राेत नहीं, की दलील खारिज

कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि तलाक के वक्त मां के पास आय का कोई स्रोत नहीं था और वह अपने माता-पिता पर निर्भर थी, इसलिए बच्ची को पिता के पास छोड़ना त्याग नहीं माना जा सकता। अब मां खुद का बिजनेस कर रही है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है।

मां की देखभाल की कोई जगह नहीं ले सकता: अदालत

जज ने माना कि दादा-दादी ने बच्ची की देखभाल में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन यह मां के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा, “मां की देखभाल की कोई जगह नहीं ले सकता।” साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि मां को बच्ची की परवरिश के लिए अयोग्य साबित करने वाला कोई सबूत नहीं है। बच्ची और दादा-दादी के भावनात्मक रिश्ते को बनाए रखने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि मां उन्हें हर वीकेंड और छुट्टियों में बच्ची से मिलने का मौका दे।

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