SBI ATM: महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
एसबीआई की अपील को पूरी तरह खारिज
महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पीठासीन सदस्य मिलिंद एस. सोनावने और सदस्य नागेश सी. कुम्ब्रे की पीठ ने जिला उपभोक्ता फोरम के आदेश के खिलाफ दायर एसबीआई की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने महज ₹400 के एटीएम विवाद को लेकर एक ग्राहक को सालों तक कानूनी लड़ाई में घसीटने के लिए बैंक पर कुल ₹58,700 का भारी जुर्माना (Penalties & Compensation) बरकरार रखा है।
मामला क्या था? (How it all started)
तकनीकी खामी (1 अक्टूबर 2016): यह मामला अक्टूबर 2016 का है। औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) के रहने वाले समाधान भगवान वानखेड़े गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज स्थित एक एटीएम से ₹1,500 निकालने गए। मशीन से राशि तो ₹1,500 कटी, लेकिन नगद केवल ₹1,100 ही बाहर आए (यानी ₹400 कम मिले)।
शिकायत (4 अक्टूबर 2016): ग्राहक ने इसे तकनीकी त्रुटि मानते हुए 4 दिनों के भीतर बैंक में लिखित शिकायत दर्ज कराई और अपने ₹400 वापस मांगे।
लापरवाही का दौर: बैंक प्रशासन, कस्टमर केयर, नोडल अधिकारी और यहां तक कि बैंकिंग लोकपाल (Banking Ombudsman) के चक्कर काटने के बाद भी ग्राहक को राहत नहीं मिली और मामला सालों तक खिंचता चला गया।
RBI का ‘₹100 प्रति दिन’ का नियम बना SBI पर भारी
नियम: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार, यदि कोई एटीएम ट्रांजैक्शन फेल होता है या कम कैश निकलता है, तो बैंक को शिकायत मिलने के 7 कार्य दिवसों (Working Days) के भीतर उसका निपटारा करना होता है। ऐसा न करने पर बैंक को ग्राहक को ₹100 प्रति दिन के हिसाब से हर्जाना देना पड़ता है। इसी नियम ने ₹400 के इस मामूली विवाद को एसबीआई के लिए एक बड़ा वित्तीय झटका बना दिया।
जिला उपभोक्ता फोरम का फैसला: औरंगाबाद जिला फोरम ने पाया कि बैंक ने मामले को सुलझाने में 477 दिनों की देरी की। इसलिए कोर्ट ने 477 दिन के ₹100/दिन के हिसाब से ₹47,700 का मुआवजा और ₹1,000 अदालती खर्च (कुल ₹48,700) देने का आदेश दिया।
राज्य आयोग का अतिरिक्त हर्जाना: जब एसबीआई इस फैसले के खिलाफ राज्य आयोग में अपील करने पहुंचा, तो कोर्ट ने बैंक की इस दलील को पूरी तरह आधारहीन माना और अपील खारिज करते हुए बैंक पर ₹10,000 का अतिरिक्त अदालती खर्च लगा दिया। इस तरह बैंक का कुल नुकसान ₹58,700 तक पहुंच गया।
एसबीआई की दलीलें और कोर्ट द्वारा उन्हें खारिज किया जाना
बैंक की दलील: सुनवाई के दौरान एसबीआई के वकीलों ने मुख्य रूप से दो दलीलें पेश कीं, जिन्हें कोर्ट ने सिरे से नकार दिया।
बैंकों के विलय (Merger) का बहाना: एसबीआई ने तर्क दिया कि 22 फरवरी 2017 को ‘स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद’ (SBH) का विलय एसबीआई में हुआ था। शुरुआती कानूनी नोटिस पुराने बैंक (SBH) को भेजे गए थे, जिसके कारण एसबीआई को जिला फोरम की कार्यवाही का पता नहीं चला।
कोर्ट का जवाब: आयोग ने कहा कि ग्राहक ने अपनी शिकायत विलय होने से कई महीने पहले दर्ज कराई थी। इसके अलावा, कानूनी रूप से जब दो बैंकों का विलय होता है, तो नई संस्था (SBI) पुरानी संस्था की सभी संपत्तियों के साथ-साथ सभी देनदारियों और जिम्मेदारियों (Liabilities) को भी विरासत में लेती है।
सबूतों पर सवाल: बैंक ने यह भी पूछा कि क्या इस बात का पुख्ता सबूत है कि एटीएम से सचमुच कम पैसे निकले थे?
कोर्ट का जवाब: आयोग ने कहा कि ग्राहक ने अपनी तरफ से समय पर हर संबंधित अथॉरिटी को सूचित किया था, जबकि बैंक के पास इस बात का कोई वैध स्पष्टीकरण (Valid Justification) नहीं था कि उन्होंने आरबीआई की 7 दिनों की समयसीमा का उल्लंघन क्यों किया।
राज्य उपभोक्ता आयोग का अंतिम संदेश
20 मई 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए आयोग ने बैंक के रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की। इस अपील में कोई दम नहीं है और यह खारिज किए जाने योग्य है। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से साफ है कि शिकायतकर्ता को बार-बार बैंक और कस्टमर केयर के चक्कर काटने के बावजूद एक खंभे से दूसरे खंभे तक दौड़ाया गया। बैंक आरबीआई के नियमों का पालन न करने की कोई ठोस वजह बताने में पूरी तरह नाकाम रहा।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| उपभोक्ता अदालत | महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग |
| पीठ के सदस्य | मिलिंद एस. सोनावने (Presiding Member) और नागेश सी. कुम्ब्रे (Member) |
| मूल विवादित राशि | ₹400 |
| आरबीआई का नियम | असफल एटीएम ट्रांजैक्शन 7 दिनों में न सुलझने पर ₹100/दिन का जुर्माना। |
| कुल देय राशि | ₹47,700 (देरी का मुआवजा) + ₹1,000 (जिला कोर्ट खर्च) + ₹10,000 (राज्य कोर्ट खर्च) = ₹58,700 |
निष्कर्ष (Takeaway)
2018 से लंबित इस अपील का फैसला आने में भले ही लगभग एक दशक (2016 से 2026) का समय लग गया, लेकिन यह निर्णय देश के आम बैंकिंग उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी जीत है। यह बैंकों को एक सख्त चेतावनी देता है कि वे ग्राहकों की छोटी तकनीकी शिकायतों को हल्के में न लें। आरबीआई के उपभोक्ता-अनुकूल नियम और उपभोक्ता अदालतें यह सुनिश्चित करने के लिए तत्पर हैं कि डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में किसी भी नागरिक को बैंक की सुस्ती या प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा न भुगतना पड़े।

