DM Powers: बिहार में प्रशासनिक शक्तियों (Executive Powers) के दुरुपयोग और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन पर एक बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए पटना हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम के तहत डीएम आदेश को दी थी चुनौती
हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष की खंडपीठ ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024 (BCC Act) के तहत पारित एक जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को पूरी तरह से अवैध और शून्य (Nullity) घोषित कर दिया है। अदालत ने कहा, यदि किसी नागरिक के क्षेत्र का स्थानीय पुलिस थाना उपलब्ध है, तो उसे बिना किसी तार्किक आधार के किसी दूर दराज के पुलिस थाने में जाकर हाजिरी लगाने का निर्देश देना पूरी तरह गैर-कानूनी और मनमाना है।
किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को जिला मजिस्ट्रेट बाधित नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने कहा, कोई भी जिला मजिस्ट्रेट (DM) कानून की मूल भावना के विपरीत जाकर किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) को इस तरह बाधित नहीं कर सकता। प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण यदि किसी नागरिक को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, तो राज्य सरकार इसके लिए मुआवजा देने की हकदार है, और यह राशि दोषी अधिकारियों की जेब से वसूली जानी चाहिए।”
मामला क्या है?: ‘असामाजिक तत्व’ घोषित कर क्षेत्राधिकार से बाहर भेजी हाजिरी
यह मामला नालंदा जिले के एक नागरिक की आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है।
दमनकारी आदेश: नालंदा के जिला मजिस्ट्रेट ने 20 मार्च 2026 को बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम की धारा 3 के तहत एक आदेश पारित किया। इसमें याचिकाकर्ता को ‘असामाजिक तत्व’ (Anti-social Element) घोषित कर दिया गया और उसे एक महीने तक हर सोमवार और शुक्रवार को सिलाओ पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने का निर्देश दिया गया।
विधिक विसंगति: याचिकाकर्ता का मूल निवास गिरियक पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आता था, लेकिन उसे अपने स्थानीय थाने को छोड़कर दूर के थाने में हाजिरी लगाने को मजबूर किया गया।
अधिकारियों की ‘सुपर-फास्ट’ सुस्ती: कोर्ट ने पाया कि गिरियक थाने के एसएचओ (SHO) की रिपोर्ट, सर्किल इंस्पेक्टर, एसडीपीओ (SDPO) राजगीर, एसपी नालंदा से होते हुए जिला मजिस्ट्रेट तक मात्र एक ही दिन (19 जनवरी 2026) के भीतर पहुंच गई और बिना किसी तथ्य की जांच किए इस पर मुहर लगा दी गई।
हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी: प्रणाली की कार्यकुशलता नहीं, बल्कि द्वेष की बू आती है
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष ने पुलिस प्रशासन की इस हड़बड़ी और बिना दिमाग लगाए (Non-application of mind) की गई कार्रवाई की कड़ी निंदा की।
एक ही दिन में फाइलों का दौड़ना: जिस गति से गिरियक थाना प्रभारी की रिपोर्ट सर्किल इंस्पेक्टर, फिर एसडीपीओ, फिर पुलिस अधीक्षक और अंत में जिला मजिस्ट्रेट तक केवल एक ही तारीख (19.01.2026) को पहुंच गई, वह इस पूरी प्रणाली की कार्यकुशलता (Efficiency) पर भरोसा नहीं जगाती। कानून में जल्दबाजी में किया गया ऐसा कार्य तथ्य में न सही, लेकिन कानूनन द्वेषपूर्ण (Malafide in law) जरूर प्रतीत होता है।
कोई नया अपराध नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 2021 के बाद से कोई नया मामला दर्ज नहीं था और न ही उसे किसी मामले में दोषी ठहराया गया था। वह सभी मामलों में जमानत पर था। त्योहारों (सरस्वती पूजा और होली) के बीत जाने के बाद भी शांति भंग होने का कोई पुख्ता सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था।
प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता अनुच्छेद 21 का हिस्सा, अधिकारी भुगतेंगे खामियाजा
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को ‘असामाजिक तत्व’ घोषित करना उसके सामाजिक जीवन पर एक अमिट विधिक और सामाजिक कलंक (Legal and Social Stigma) लगाता है।
गरिमा का अधिकार: ‘सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016)’ और ‘बिहार राज्य बनाम लालकृष्ण आडवाणी (2003)’ जैसे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक की प्रतिष्ठा (Reputation) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
वसूली का आदेश: कोर्ट ने अधिकारियों की मनमर्जी पर लगाम लगाने के लिए ‘के.के. पाठक बनाम रविशंकर प्रसाद (2019)’ मामले का सहारा लिया। कोर्ट ने कहा कि जब कार्यपालिका की शक्तियों के दुरुपयोग के कारण राज्य को मुआवजा देना पड़ता है, तो वह राशि जनता के टैक्स के पैसों से नहीं, बल्कि दोषी अधिकारियों के वेतन/फंड से वसूली जानी चाहिए।
बीसीसी एक्ट (BCC Act) की धारा 2 और 3 की विधिक व्याख्या
अदालत ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024 की बुनियादी कानूनी शर्तों को स्पष्ट किया।
24 महीने का नियम: धारा 2(b) के तहत किसी व्यक्ति को असामाजिक तत्व घोषित करने के लिए कार्रवाई शुरू होने के ठीक पिछले 24 महीनों के भीतर कम से कम दो ऐसे मामलों में पुलिस रिपोर्ट (चार्जशीट) दाखिल होनी चाहिए, जो इस अधिनियम के दायरे में आते हों।
स्थानीय थाने का नियम: बिहार अपराध नियंत्रण नियमावली, 1978 के नियम 6 (राकेश कुमार यादव वाद, 2025 में व्याख्यायित) के अनुसार, हाजिरी हमेशा नागरिक के आवास के निकटतम पुलिस स्टेशन के प्रभारी के समक्ष ही होनी चाहिए।
विधिक फैक्ट शीट: पटना हाई कोर्ट बनाम बिहार राज्य (BCC Act मुआवजा वाद)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्देश |
| संबंधित न्यायालय | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court), बिहार |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष |
| प्रासंगिक कानून | धारा 2 एवं 3, बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम (BCC Act), 2024 |
| लागू हर्जाना और मुआवजा | ₹1,00,000 का मुआवजा + ₹10,000 मुकदमा खर्च |
| भुगतान व रिकवरी की अवधि | याचिकाकर्ता को 1 माह में भुगतान; दोषी अफसरों से 6 माह में रिकवरी अनिवार्य |
| संवैधानिक दायित्व | कोर्ट एक मूकदर्शक (Mute Spectator) बनकर नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन नहीं देख सकता |
अदालत ने यह साफ कर दिया है कि पुलिस अधिकारी की केवल ‘इच्छा या मर्जी’ किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनने का आधार नहीं हो सकती। सबसे ऐतिहासिक बात यह है कि ₹1.10 लाख का यह हर्जाना उन अधिकारियों की जेब से जाएगा जिन्होंने बिना दिमाग लगाए फाइल पर दस्तखत किए थे, यह आदेश भविष्य में नौकरशाही को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करने पर मजबूर करेगा।

