Own Wrong: पारिवारिक कानूनों और गुजारा भत्ता के अधिकारों की विधिक व्याख्या करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस एम.एम. साठये की एकल पीठ ने सत्र न्यायालय (Sessions Court) के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें महिला को गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया गया था, जबकि उसके नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा गया। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष और कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य पीड़ित या परित्यक्त पत्नी को सहारा देना है। लेकिन कोई भी पक्षकार अपने ही द्वारा किए गए विधिक कृत्य की गलती (Own Wrong) का अनुचित लाभ उठाने का हकदार नहीं है।
छल-कपट और तथ्यों का छिपाव मंजूर नहीं
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान यह भी टिप्पणी की, यदि किसी महिला ने अपनी पहली सक्रिय शादी की बात छुपाकर दूसरी शादी की है, और इस धोखे के कारण उसकी दूसरी शादी को कोर्ट द्वारा शून्य (Annulled/Void) घोषित कर दिया गया हो, तो वह इस कल्याणकारी कानून के तहत गुजारा भत्ता (Maintenance) का दावा नहीं कर सकती। छल-कपट और तथ्यों का छिपाव पूरे विधिक दावे को ही दूषित कर देता है।
मामला क्या है?: केवल तीन महीने का साथ और पहली शादी का छिपाव
यह विधिक विवाद एक महिला और उसके नाबालिग बेटे द्वारा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दायर भरण-पोषण के दावे से शुरू हुआ था।
पति का तर्क: दूसरे पति ने अदालत में दलील दी कि यह शादी विधिक रूप से शून्य (Void) थी, क्योंकि महिला ने अपनी पहली शादी की बात उससे पूरी तरह छुपाई थी। इसी आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 11 के तहत सक्षम अदालत ने उनकी शादी को पहले ही अमान्य (Nullity) घोषित कर दिया था।
निचली अदालतों के विरोधाभासी फैसले: ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में मां और बेटे दोनों को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पति ने सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सेशंस कोर्ट ने महिला का गुजारा भत्ता रद्द कर दिया, लेकिन बच्चे के हक को बनाए रखा। महिला ने सेशंस कोर्ट के इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: धोखा देने वालों के लिए नहीं है धारा 125
महिला के वकील सचिन ढाकेफालकर ने अदालत में दलील दी कि भले ही शादी शून्य हो गई हो, लेकिन दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रहे थे, इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार है। जस्टिस एम.एम. साठये ने इन दलीलों को खारिज करते हुए बेहद स्पष्ट विधिक सिद्धांत सामने रखे।
कल्याणकारी कानून का दुरुपयोग नहीं: सीआरपीसी की धारा 125 जैसी धर्मनिरपेक्ष और परोपकारी विधायी व्यवस्थाओं के तहत, किसी भी पक्षकार को अपनी खुद की गलती या धोखे का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता महिला द्वारा तथ्यों को छिपाना और किया गया छल-कपट (Concealment and Deceit) उसके पूरे मामले को दूषित कर देता है। जिस महिला ने विवाह के बंधन में बंधते समय ही जानबूझकर धोखाधड़ी की हो, उसके पक्ष में इस सारांशित उपाय (Summary Remedy) का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
लिव-इन रिलेशनशिप की दलील खारिज: महिला ने राहत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों—’चन्मुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा (2011)’ और ‘श्रीमती एन. उषा रानी बनाम मूडुदुला श्रीनिवास (2025)’ का हवाला दिया, जहां लंबी सहवास (Cohabitation) के आधार पर शून्य विवाह में भी महिलाओं को राहत मिली थी।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड्स को खंगालते हुए इस दलील को खारिज कर दिया: रिकॉर्ड से साफ है कि महिला अपने दूसरे पति के साथ 28 जनवरी 2009 से 7 मई 2009 तक रही थी—जो कि मुश्किल से 3 महीने और कुछ दिन का समय है। इसके बाद से दोनों लगातार मुकदमेबाजी कर रहे हैं। इतने कम समय के सहवास को ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ या ‘पति-पत्नी की तरह लंबे समय तक साथ रहना’ (Reasonably long period) नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की नजीर और ‘सख्त सबूत’ का नियम
अदालत ने अपने फैसले को सुदृढ़ करने के लिए देश की शीर्ष अदालत के एक पुराने और महत्वपूर्ण फैसले का संदर्भ लिया।
विमला बनाम वीरास्वामी (1991): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई पति अपनी पत्नी के गुजारे भत्ते के दावे को खारिज करने के लिए यह आरोप लगाता है कि महिला पहले से शादीशुदा थी, तो पति को पहली शादी का ‘सख्त विधिक प्रमाण’ (Strict Proof) देना होगा।
वर्तमान केस में स्थिति: बॉम्बे हाई कोर्ट ने पाया कि इस मामले में न केवल महिला की पहली शादी विधिक रूप से साबित हो चुकी थी, बल्कि यह भी स्थापित हो गया था कि उसने इस तथ्य को अपने दूसरे पति से जानबूझकर छुपाया था। इसलिए ‘एन. उषा रानी’ मामले का लाभ इस महिला को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उस मामले में दूसरे पति को महिला के अतीत की पूरी जानकारी थी, जबकि यहाँ पति को धोखे में रखा गया था।
हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के विवेक को सही मानते हुए महिला की रिट याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के विधिक विवाद या गलतियों की सजा मासूम बच्चे को नहीं दी जा सकती, इसलिए बच्चे को मिलने वाली भरण-पोषण की राशि में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
विधिक फैक्ट शीट: बॉम्बे हाई कोर्ट बनाम शून्य विवाह गुजारा भत्ता वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court), मुंबई |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम.एम. साठये (एकल पीठ) |
| प्रासंगिक विधिक धारा | धारा 125, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 |
| हिंदू विवाह अधिनियम धारा | धारा 11 (सक्षम अदालत द्वारा विवाह को शून्य घोषित किया जाना) |
| सहवास की अवधि (Cohabitation) | मात्र 3 महीने 9 दिन (लिव-इन या लंबे सहवास के दायरे से बाहर) |
| अदालत का अंतिम आदेश | महिला की याचिका खारिज; गुजारा भत्ता देने से अंतिम रूप से इनकार |
लेकिन अदालत ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि यह विधिक सुरक्षा कवच ‘धोखाधड़ी के हथियारों’ से नहीं बनाया जा सकता। यदि विवाह की बुनियाद ही झूठ और छल-कपट पर रखी गई हो, तो उस विवाह के टूटने पर विधिक अधिकारों का महल नहीं खड़ा किया जा सकता। यह निर्णय उन मामलों के लिए एक कड़ा संदेश है जहां वैवाहिक इतिहास को छुपाकर शादियां की जाती हैं।

