Wednesday, November 4, 2026
HomeConsumer NewsUP Electricity Act: करंट लगने से पीड़ित को अतिरिक्त मुआवजे पर कोर्ट...

UP Electricity Act: करंट लगने से पीड़ित को अतिरिक्त मुआवजे पर कोर्ट की मुहर; मुआवजा न देना मानवाधिकारों का निरंतर उल्लंघन; MVVNL की याचिका खारिज

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और मुख्य कानूनी बिंदु

  1. समय-सीमा (Limitation Act) संबंधी दलील खारिज:विद्युत निगम (MVVNL) ने तर्क दिया कि मानवाधिकार आयोग में 2024 में दर्ज कराई गई शिकायत समय-सीमा (Limitation Period) से बाहर थी क्योंकि दुर्घटना 2011 में हुई थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पीड़ित को उचित मुआवजा न देना मानवाधिकारों का सतत उल्लंघन (Continuing Violation) है। इसके अलावा, शिकायत दर्ज होने के बाद फरवरी 2025 में निगम द्वारा ₹1 लाख का भुगतान करना परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत देनदारी की स्वीकृति (Acknowledgement) माना जाएगा।
  2. मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की व्याख्या:अदालत ने Protection of Human Rights Act, 1993 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि मानवाधिकार आयोग का क्षेत्राधिकार स्वतंत्र है। अन्य विभागीय नियमों के तहत पूर्व में दी गई अनुग्रह राशि (Ex-gratia) आयोग को अतिरिक्त पीड़ित राहत देने की सिफारिश करने से नहीं रोक सकती।
  3. विद्युत निगम की वैधानिक लापरवाही:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक बिजली लाइनों के रखरखाव में ढिलाई के कारण होने वाली दुर्घटनाएं केवल नागरिक नुकसान नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के मौलिक अधिकार (Article 21) के तहत मानव अधिकारों का हनन हैं।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. ब्याज न लगाने पर टिप्पणी:

हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़ित को यह राशि कई साल पहले मिल जानी चाहिए थी, और बिजली निगम को खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए कि देरी के बावजूद आयोग या कोर्ट ने उस पर कोई ब्याज (Interest) आरोपित नहीं किया है।

2. मानवाधिकारों का दायरा:

यह फैसला स्थापित करता है कि सरकारी/अर्ध-सरकारी संस्थाएं वैधानिक अनुग्रह राशि का छोटा भुगतान करके मानवाधिकार आयोग की जवाबदेही से बच नहीं सकती हैं।

लखनऊ: मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993 – PHRA) की धारा 12 व धारा 18 (मानवाधिकार हनन के पीड़ितों को अंतरिम या अतिरिक्त राहत/मुआवजा दिलाने की आयोग की सिफारिशी शक्तियां), धारा 36(2) (शिकायत प्रस्तुत करने की एक वर्ष की परिसीमा व ‘निरंतर उल्लंघन’ / Continuing Violation of Human Rights का अपवाद), विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) की धारा 68 व केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण विनियमों के तहत पारेषण लाइनों के सुरक्षित संधारण का वैधानिक दायित्व (Statutory Duty of Care), अपकृत्य विधि में ‘पूर्ण दायित्व’ (Absolute Liability) का सिद्धांत, तथा परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 18 (भुगतान द्वारा देनदारी की विधिक स्वीकृति / Acknowledgment of Liability) पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक अत्यंत प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B. Saraf) और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय (Justice Amitabh Kumar Rai) की पीठ ने बिजली वितरण कंपनी मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (MVVNL) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया। विद्युत निगम ने उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग (UPHRC) के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 2011 में करंट लगने (Electrocution) से अपंग/गंभीर रूप से घायल हुए पीड़ित को ₹10 लाख का अतिरिक्त मुआवजा (Additional Compensation) देने की सिफारिश की गई थी।

उच्च न्यायालय ने बिजली निगम के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि 2011 की घटना के लिए 2024 में मानवाधिकार आयोग में दी गई शिकायत परिसीमा (Limitation) से बाधित थी। अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि उचित मुआवजे का भुगतान न करना मानवाधिकारों का एक अनवरत और निरंतर उल्लंघन (Continuing Violation) है। इसके अतिरिक्त, निगम द्वारा 2024 में शिकायत दर्ज होने के बाद फरवरी 2025 में पीड़ित को ₹1 लाख का भुगतान करना परिसीमा अधिनियम के तहत देनदारी की वैध पावती (Acknowledgment) बन गया। पीठ ने कहा कि मानवाधिकार आयोग की मुआवजा सिफारिश करने की शक्ति अन्य वैधानिक उपायों से पूरी तरह स्वतंत्र और अतिरिक्त है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘उचित मुआवजा न देना मानवाधिकारों का निरंतर उल्लंघन; परिसीमा आड़े नहीं आएगी’:

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने परिसीमा की तकनीकी आपत्ति को खारिज करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट दर्ज किया: “पीड़ित को उसके वैध और उचित मुआवजे का भुगतान न किया जाना मानवाधिकारों का एक निरंतर और अनवरत उल्लंघन (Continuing violation of human rights) का गठन करता है। इसके अतिरिक्त, मानवाधिकार आयोग के समक्ष 2024 में शिकायत दर्ज होने के उपरांत विद्युत निगम द्वारा फरवरी 2025 में पीड़ित को ₹1,00,000 की राशि का भुगतान किया जाना, परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 18 के अंतर्गत दायित्व की एक वैध विधिक पावती (Acknowledgment of liability) के समान है। अतः यह शिकायत समय-बाधित नहीं मानी जा सकती।”

2. ‘पारेषण लाइनों का सुरक्षित संधारण वैधानिक कर्तव्य; लापरवाही सीधे मानवाधिकार हनन’:

  • अदालत ने बिजली कंपनियों के सार्वजनिक सुरक्षा दायित्व को रेखांकित करते हुए कहा:“विद्युत वितरण निगमों का यह सांविधिक और अनिवार्य कर्तव्य (Statutory Duty) है कि वे अपनी पारेषण और वितरण लाइनों का संधारण इस प्रकार करें कि आम जनता का जीवन किसी भी प्रकार के खतरे में न पड़े।निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही, जिसके परिणामस्वरूप किसी नागरिक को करंट लगता है और वह शारीरिक रूप से क्षत-विक्षत होता है, सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन (Violation of human rights) है।”

3. ‘मानवाधिकार आयोग की शक्तियां स्वतंत्र व अतिरिक्त; निगम पर ब्याज न लगना उसका सौभाग्य’:

  • अदालत ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा:“मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत आयोग की मुआवजा सिफारिश करने की शक्ति अन्य सभी विधिक उपचारों से पूरी तरह स्वतंत्र और अतिरिक्त (Independent and additional to other legal remedies) है। पूर्व में किसी अन्य योजना या वैधानिक प्रावधान के तहत भुगतान किया गया मामूली मुआवजा, आयोग को आगे उचित राहत देने के क्षेत्राधिकार से रोक नहीं सकता।₹10 लाख का यह अतिरिक्त मुआवजा अविलंब अदा किया जाना चाहिए था। विद्युत निगम वास्तव में भाग्यशाली है कि इतने वर्षों के गंभीर विलंब के बावजूद आयोग द्वारा उस पर कोई ब्याज (No interest imposed) नहीं लगाया गया।”

Also Read; Jail Manuals: जेलों में जातिगत भेदभाव और बोर्ड ऑफ विजिटर्स पर 23 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का केंद्र को जवाब न देना अत्यंत दुखद; सख्त चेतावनी

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2011–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयइलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
पीठन्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B Saraf) एवं न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय (Justice Amitabh Kumar Rai)
निर्णय की तिथि3 नवंबर 2026
केस संदर्भमध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग व अन्य [Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
याचिकाकर्तामध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (MVVNL) — उत्तर प्रदेश सरकार का बिजली वितरण उपक्रम।
प्रतिवादी पक्षउत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग (UPHRC) एवं करंट पीड़ित नागरिक।
मूल दुर्घटना (वर्ष 2011)वर्ष 2011 में बिजली निगम की पारेषण लाइन के ढीले तारों और लापरवाही के कारण पीड़ित गंभीर रूप से करंट की चपेट में आ गया, जिससे उसके शरीर को अपूरणीय क्षति हुई और वह स्थायी रूप से दिव्यांग हो गया।
निगम द्वारा पूर्व में किया गया आंशिक भुगतानविद्युत निगम ने अपने आंतरिक नियमों के तहत:
• वर्ष 2017 में पीड़ित के पिता को केवल ₹65,000 की अनुग्रह राशि दी।
• मानवाधिकार आयोग में शिकायत होने के बाद फरवरी 2025 में पीड़ित को ₹1,00,000 का अतिरिक्त भुगतान किया।
राज्य मानवाधिकार आयोग का आदेशUPHRC ने पाया कि जीवन भर की शारीरिक अक्षमता और आजीविका की हानि के मुकाबले यह भुगतान एक क्रूर मजाक था। आयोग ने विद्युत निगम को निर्देश दिया कि वह पीड़ित को ₹10 लाख का अतिरिक्त मुआवजा (Additional Compensation of Rs 10 Lakh) तुरंत अदा करे।
विद्युत निगम की विधिक आपत्तियां1. परिसीमा (Limitation) का तर्क: मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36(2) के तहत आयोग एक वर्ष से पुराने मामलों का संज्ञान नहीं ले सकता; घटना 2011 की थी और शिकायत 2024 में 13 साल बाद दर्ज हुई।
2. दोहरे मुआवजे का तर्क: पीड़ित को विभागीय नीतियों के तहत पहले ही मुआवजा दिया जा चुका है, अतः आयोग अतिरिक्त राशि नहीं दिला सकता।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयरिट याचिका खारिज (Dismissed); आयोग का ₹10 लाख का आदेश पूरी तरह बहाल; निगम को राशि का तत्काल भुगतान करने का आदेश।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम (PHRA) और परिसीमा का विधिक मानक’

  • मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 का स्वतंत्र स्वरूप:
    • धारा 18(a)(i) राज्य आयोग को यह शक्ति देती है कि यदि जांच से मानवाधिकारों का उल्लंघन साबित होता है, तो वह संबंधित सरकार या प्राधिकारी को पीड़ित या उसके परिजनों को “ऐसी क्षतिपूर्ति या नुकसानी के संदाय की सिफारिश कर सकेगा जिसे आयोग उचित समझे”।
    • उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की यह शक्ति किसी अन्य सांविधिक योजना (जैसे विद्युत अधिनियम की एक्स-ग्रेशिया राशि) से सीमित नहीं होती। यदि कोई अन्य कानून मामूली सहायता देता है, तो मानवाधिकार आयोग वास्तविक पीड़ा और जीवन हानि के आधार पर अतिरिक्त और पर्याप्त राहत दिलाने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
  • धारा 36(2) और ‘निरंतर मानवाधिकार उल्लंघन’ का अपवाद:
    • यद्यपि धारा 36(2) यह कहती है कि आयोग उस तारीख से, जिसको मानवाधिकारों के उल्लंघन का गठित करने वाला कार्य किया गया था, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात किसी बात की जांच नहीं करेगा;
    • किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य में यह स्पष्ट किया है कि जहाँ राज्य की विफलता के कारण किसी पीड़ित का जीवन, स्वास्थ्य या आजीविका लगातार संकट में बनी रहती है और उसे पुनर्वास नहीं मिलता, वहाँ ‘निरंतर उल्लंघन’ (Continuing Cause of Action) का सिद्धांत लागू होता है। जब तक राज्य अपनी वैधानिक क्षतिपूर्ति का दायित्व पूरा नहीं करता, परिसीमा की बाधा मानवाधिकारों के संरक्षण को नहीं रोक सकती।
  • परिसीमा अधिनियम की धारा 18 (Effect of Acknowledgment in Writing):
    • परिसीमा अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, यदि परिसीमा अवधि समाप्त होने से पूर्व या विवाद के दौरान दायित्व स्वीकार करते हुए कोई आंशिक भुगतान किया जाता है, तो उस भुगतान की तिथि से एक नई परिसीमा अवधि (Fresh Period of Limitation) शुरू हो जाती है।
    • विद्युत निगम ने स्वयं फरवरी 2025 में ₹1 लाख देकर अपनी देयता को स्वीकार कर लिया था, जिससे उसका ‘टाइम-बार्ड’ होने का दावा कानूनन निरस्त हो गया।
  • ‘पूर्ण दायित्व’ (Rule of Strict/Absolute Liability):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ और एमपी इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम शैल कुमारी [(2002) 2 SCC 162] में यह स्थापित किया है कि जो उपक्रम अत्यधिक खतरनाक ऊर्जा (विद्युत पारेषण) के संचालन में संलग्न हैं, उनका दायित्व पूर्ण और निरपेक्ष होता है।
    • वे यह बहाना नहीं बना सकते कि लाइन का तार अचानक टूट गया था। यदि कोई नागरिक विद्युत प्रवाह की चपेट में आता है, तो निगम मुआवजे से बच नहीं सकता।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग व अन्य [Writ Petition (Civil) / Miscellaneous Bench / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B Saraf) एवं न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय (Justice Amitabh Kumar Rai)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: विद्युत निगम की रिट याचिका खारिज; उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग का ₹10 लाख के अतिरिक्त मुआवजे का आदेश पूर्णतः बरकरार।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (मध्यांचल विद्युत निगम) की ओर से: विद्युत निगम के स्थायी अधिवक्ता।
  • राज्य व मानवाधिकार आयोग की ओर से: मुख्य स्थायी अधिवक्ता (CSC) एवं आयोग के स्थायी वकील।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993):
      • धारा 12 — आयोग के कृत्य (मानवाधिकार हनन की जांच करना)
      • धारा 18 — जांच के पश्चात पीड़ित को क्षतिपूर्ति/मुआवजे के भुगतान की सिफारिश करने की शक्ति
      • धारा 21 व 29 — राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन व प्रक्रिया
      • धारा 36(2) — एक वर्ष की परिसीमा और उसके अपवाद
    • विद्युत अधिनियम, 2003 (Electricity Act, 2003) — पारेषण और वितरण सुरक्षा मानक
    • परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) — धारा 18 (स्वीकृति और आंशिक भुगतान का प्रभाव) व धारा 22 (निरंतर अपकृत्य और निरंतर उल्लंघन)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • मानवाधिकार आयोग की सिफारिशी शक्तियों और विद्युत दुर्घटना मुआवजे का विधिक मानक: ‘सार्वजनिक उपयोगिता उपक्रमों (विद्युत वितरण निगमों) की लापरवाही के कारण पारेषण लाइनों से होने वाली दुर्घटनाएं सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हनन हैं; पूर्व में किसी प्रशासनिक नियम के तहत मामूली अनुग्रह राशि का भुगतान किया जाना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के तहत पीड़ितों को वास्तविक जीवन हानि के अनुपात में अतिरिक्त और उचित मुआवजा देने के राज्य मानवाधिकार आयोग के क्षेत्राधिकार को सीमित नहीं कर सकता; उचित मुआवजे से वंचित रखना मानवाधिकारों का एक निरंतर उल्लंघन (Continuing Violation) है, जिसे तकनीकी परिसीमा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता; तथा कार्यवाही के दौरान किया गया कोई भी आंशिक भुगतान परिसीमा अधिनियम की धारा 18 के तहत दायित्व की विधिक स्वीकृति माना जाएगा।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: उच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका खारिज किए जाने के साथ ही मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (MVVNL) के पास UPHRC की सिफारिश के अनुपालन के अतिरिक्त कोई विधिक विकल्प शेष नहीं है; निगम को ₹10 लाख की संपूर्ण अतिरिक्त मुआवजा राशि तत्काल पीड़ित के बैंक खाते में जारी करनी होगी।

UP Electricity Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ)
पीठन्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ एवं न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय
याचिकाकर्तामध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (MVVNL)
घटना की तिथि/विषयवर्ष 2011 में पीड़ित को करंट लगने (Electrocution) से हुई गंभीर क्षति।
पूर्व में दिया गया मुआवजा2017 में पीड़ित के पिता को ₹65,000 तथा फरवरी 2025 में पीड़ित को ₹1,00,000 का भुगतान।
UPHRC का आदेशराज्य मानवाधिकार आयोग ने पीड़ित को ₹10 लाख का अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।
अदालत का अंतिम निर्णययाचिका खारिज: हाईकोर्ट ने UPHRC के आदेश को पूरी तरह वैध ठहराया और कहा कि निगम भाग्यशाली है कि देरी के लिए उस पर कोई ब्याज नहीं लगाया गया।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
26.8 ° C
26.8 °
26.8 °
63 %
2.2kmh
68 %
Wed
30 °
Thu
29 °
Fri
29 °
Sat
29 °
Sun
30 °

Recent Comments