हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
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│SIR के दौरान कटे नाम की पुनर्बहाली (DELHI HC) │
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│आशंका निराधार है │ │ERO/ECI का आधिकारिक│
│ │ │ निर्देश │
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│ ECI के वकील/ERO के निर्देश │ │ चुनाव आयोग के निर्देश पर│
│ पर फॉर्म 6 भरने से झूठी │ │ फॉर्म भरने को अवैध या गलत │
│ घोषणा का अपराध नहीं बनता। ││ नहीं ठहराया जा सकता। │
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1. “झूठी घोषणा का डर बेबुनियाद”:
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की आशंकाओं को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया: “जब यह सुझाव भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के विद्वान स्थायी वकील की ओर से आ रहा है, वह भी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) के निर्देशों के अनुसार, तो याचिकाकर्ता की यह आशंका कि उन पर गलत घोषणा करने का आरोप लगाया जाएगा, पूरी तरह से बेबुनियाद है।”
2. प्रक्रियात्मक सुविधा हेतु फॉर्म 6 का प्रयोग:
- अदालत ने माना कि प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक सुविधा के दृष्टिकोण से, SIR प्रक्रिया में छूटे हुए पते के मतदाताओं को तेजी से पुनः सूची में शामिल करने के लिए ECI द्वारा फॉर्म 6 का सुझाव दिया जाना कानूनी रूप से न्यायसंगत और मतदाताओं के हित में ही है।
नई दिल्ली: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) की धारा 22 एवं धारा 23 (निर्वाचक नामावलियों में प्रविष्टियों का सुधार, स्थानांतरण एवं नए नामों का समावेश), निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के नियम 13 एवं नियम 26 (फॉर्म 6 – नए मतदाता के रूप में पंजीकरण हेतु आवेदन बनाम फॉर्म 8 – निवास परिवर्तन/स्थानांतरण), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 (निर्वाचक नामावली के संबंध में ‘मिथ्या घोषणा’ / False Declaration करने पर दंड का प्रावधान), तथा दिल्ली में संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान आवास परिवर्तन के कारण छूटे मतदाताओं के नाम पुनर्बहाल करने की विधिक प्रक्रिया पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी की खंडपीठ ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित याचिकाकर्ता नीलोत्पल दत्ता एवं एक अन्य मतदाता द्वारा दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट किया कि जब निर्वाचन आयोग के स्थायी वकील और संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) ने खुली अदालत में यह औपचारिक स्टैंड लिया है कि याचिकाकर्ता फॉर्म 6 भरकर अपने वर्तमान पते के अनुसार नए सिरे से मतदाता सूची में नाम शामिल करा सकते हैं, तो याचिकाकर्ता की यह आशंका पूरी तरह निराधार (Misplaced Apprehension) है कि ऐसा करने पर उन पर कानूनन कोई झूठी घोषणा करने या अभियोजन का आरोप लगाया जाएगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘ECI के सुझाव पर फॉर्म 6 भरने से झूठी घोषणा का कोई अपराध नहीं बनता’
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की कानूनी आशंकाओं का समाधान करते हुए दर्ज किया: “पक्षकारों के विद्वान वकीलों को सुनने के बाद, हमारा यह सुविचारित मत है कि जब यह सुझाव स्वयं भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के विद्वान स्थायी वकील की ओर से आ रहा है, और वह भी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) के सीधे निर्देशों के अनुसार, तो याचिकाकर्ता संख्या 1 की यह आशंका कि ‘उस पर झूठी घोषणा (False Declaration) प्रस्तुत करने का आरोप लगाया जाएगा’, पूरी तरह से निराधार और गलत (Misplaced) है।”
2. फॉर्म 8 (स्थानांतरण) बनाम फॉर्म 6 (नया समावेश): प्रशासनिक स्पष्टता:
- याचिकाकर्ताओं का मूल कानूनी तर्क यह था कि वे पहले से ही दिल्ली की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत वैध मतदाता थे।
- केवल इसलिए कि वे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान आवास परिवर्तन के चलते भौतिक गणना (Enumeration Process) पूरी नहीं कर सके और उनका नाम सूची से हट गया, आयोग को उनसे फॉर्म 8 (स्थानांतरण/Transposition) लेना चाहिए था, न कि उन्हें नए मतदाता की भांति फॉर्म 6 भरने के लिए बाध्य करना चाहिए था।
- न्यायालय ने पाया कि चूंकि SIR के तहत अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हो चुकी थी और याचिकाकर्ताओं के नाम रिकॉर्ड में पहले से विलोपित (Deleted) हो चुके थे, इसलिए निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत वर्तमान पते पर नाम शामिल कराने का सबसे त्वरित और तकनीकी रूप से उपयुक्त उपाय फॉर्म 6 ही है।
3. ERO द्वारा फॉर्म भरने में प्रशासनिक सहायता की पेशकश:
- अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि पूर्व सुनवाई के दौरान ECI के निर्देश पर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) ने याचिकाकर्ताओं को उनके वर्तमान निवास क्षेत्र की विधानसभा में फॉर्म 6 भरने और प्रविष्टियों को सुगम बनाने में पूर्ण प्रशासनिक सहायता देने की पेशकश की थी।
- इस आश्वासन के बाद याचिकाकर्ताओं की किसी भी दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) की आशंका का कोई आधार शेष नहीं रह जाता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| याचिकाकर्ताओं की स्थिति | नीलोत्पल दत्ता एवं एक अन्य नागरिक (दिल्ली के स्थायी निवासी ও पूर्व पंजीकृत मतदाता)। |
| विलोपन का कारण | दिल्ली में चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान याचिकाकर्ताओं के पते बदल गए थे। जमीनी सत्यापन के समय संबंधित पते पर न पाए जाने के कारण उनका नाम संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से हटा दिया गया था। |
| हाईकोर्ट में चुनौती | याचिकाकर्ताओं ने ECI के उस प्रशासनिक निर्देश को चुनौती दी जिसमें SIR में छूटे मतदाताओं को फॉर्म 8 (स्थानांतरण/सुधार) के बजाय फॉर्म 6 (नया समावेशन) भरने को कहा गया था। उन्होंने प्रार्थना की कि उनके नाम को बहाल कर वर्तमान सामान्य निवास के विधानसभा क्षेत्र में अंतरित (Transposed) किया जाए। |
| याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत आपत्ति | व्यक्तिगत रूप से पेश होकर नीलोत्पल दत्ता ने दलील दी कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत झूठी घोषणा दंडनीय अपराध है। चूंकि वे पहले से वोटर रहे हैं, इसलिए फॉर्म 6 में यह घोषणा करना कि “वे पहली बार मतदाता बन रहे हैं या उनका नाम कहीं और नहीं है”, तकनीकी रूप से झूठी घोषणा के दायरे में आ सकता है। |
| ECI का पक्ष (अधिवक्ता संजय वशिष्ठ) | ECI के स्थायी वकील ने स्पष्ट किया कि चूंकि रिकॉर्ड से पुराना नाम विलोपित हो चुका है, इसलिए वर्तमान निवास के तहत फॉर्म 6 भरना विधिक रूप से सही प्रक्रिया है। ERO ने खुद यह प्रक्रिया सुझाई है और वे सहायता देने को तैयार हैं। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की शंका को खारिज करते हुए याचिका का निस्तारण किया और उन्हें ECI के सुझाव के अनुसार फॉर्म 6 भरकर मतदाता सूची में शामिल होने की छूट दी। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और नियम 1960
- फॉर्म 6 बनाम फॉर्म 8 का विधिक उपयोग:
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म 8 का उपयोग केवल तभी संभव होता है जब मतदाता का नाम किसी चालू और वैध निर्वाचक नामावली के भाग में सक्रिय रूप से विद्यमान हो और वह उसी राज्य/निर्वाचन क्षेत्र के भीतर अपने विवरण में संशोधन या पते का अंतरण चाहता हो।
- यदि किसी विशेष पुनरीक्षण (SIR) या विलोपन प्रक्रिया के तहत मतदाता का नाम पहले ही सूची से काटा जा चुका है, तो उस विलोपित प्रविष्टि का ‘स्थानांतरण’ तकनीकी और कानूनी रूप से संभव नहीं रहता। ऐसे मतदाता को कानूनी रूप से फॉर्म 6 के माध्यम से अपने वर्तमान पते के आधार पर नए सिरे से नाम दर्ज कराने की अर्जी देनी होती है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 (मिथ्या घोषणा हेतु शास्ति):
- धारा 31 यह प्रावधान करती है कि यदि कोई व्यक्ति निर्वाचक नामावली तैयार करने, पुनरीक्षण करने या उसमें किसी प्रविष्टि को शामिल करने/हटाने के संबंध में ऐसा कोई कथन या घोषणा करता है जो मिथ्या है और जिसे वह मिथ्या जानता है या विश्वास करता है, तो वह 1 वर्ष तक के कारावास या जुर्माने से दंडनीय होगा।
- आपराधिक विधि का मूलभूत सिद्धांत है कि किसी अपराध के लिए ‘आपराधिक मनःस्थिति’ (Mens Rea) और ‘कपटपूर्ण आशय’ (Fraudulent Intent) अनिवार्य है।
- जब कोई नागरिक स्वयं चुनाव आयोग और ERO के आधिकारिक निर्देश, सलाह और अदालती सहमति के तहत अपना वैध मताधिकार प्राप्त करने के लिए फॉर्म 6 प्रस्तुत करता है, तो धारा 31 के तहत किसी भी अपराध का गठन होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: नीलोत्पल दत्ता व अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग (ECI) व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति अदिति चौधरी (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 15-16 अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के उपरांत निर्वाचक नामावली में नाम जोड़ने हेतु फॉर्म 6 की वैधानिकता
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: याचिकाकर्ता संख्या 1 (नीलोत्पल दत्ता) व्यक्तिगत रूप से उपस्थित (In-person)
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: स्थायी अधिवक्ता संजय वशिष्ठ (Standing Counsel Sanjay Vashishtha) सहपठित अधिवक्ता सिद्धार्थ गोस्वामी, आशीष शुक्ला एवं आदित्य सचदेवा
- भारत संघ (Union of India) की ओर से: अधिवक्ता फरमान अली (Advocate Farman Ali)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950) — धारा 22 (नामावली में प्रविष्टियों का सुधार), धारा 23 (नामों का समावेशन) एवं धारा 31 (मिथ्या घोषणा करने हेतु दंड)
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) — नियम 13 (दावे और आपत्तियां), नियम 26 (फॉर्म 6 एवं फॉर्म 8 का उपयोग)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- मताधिकार की बहाली और प्रक्रियात्मक सद्भावना: ‘यदि किसी पुनरीक्षण अभियान (SIR) में नाम कटने के बाद निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) और निर्वाचन आयोग स्वयं मतदाता को फॉर्म 6 भरने का सुझाव देते हैं, तो यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है; सद्भावनापूर्वक अपने मताधिकार की बहाली हेतु यह प्रपत्र भरने से धारा 31 RPA के तहत किसी मिथ्या घोषणा का अपराध नहीं बनता।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका का निस्तारण; ECI और ERO के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिकाकर्ता की आशंकाओं को निराधार घोषित किया गया; याचिकाकर्ताओं को ECI के सुझाव और ERO की सहायता से फॉर्म 6 दाखिल कर निर्वाचक नामावली में अपना नाम शामिल कराने की पूर्ण छूट।
ECI Form: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति दिनेश मेहता एवं न्यायमूर्ति अदिति चौधरी |
| संबंधित संस्था | भारत निर्वाचन आयोग (ECI) |
| संबंधित फॉर्म | फॉर्म 6 (नया नाम जोड़ने/पुनः शामिल करने हेतु) एवं फॉर्म 8 (पते में संशोधन/स्थानांतरण हेतु) |
| मूल विवाद | दिल्ली में विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान निवास बदलने से नाम कटने के बाद, ECI द्वारा फॉर्म 8 के बजाय फॉर्म 6 भरने के निर्देश को चुनौती। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | ERO और निर्वाचन आयोग के स्थायी वकील के आधिकारिक निर्देश पर फॉर्म 6 भरने से मतदाता पर झूठी/गलत घोषणा करने का कोई आरोप नहीं लगेगा। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका का निस्तारण; मतदाता की आशंकाओं को गलत बताते हुए फॉर्म 6 भरकर नाम पुनः जुड़वाने का मार्ग प्रशस्त किया। |

