Wednesday, November 4, 2026
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Election Reform: चुनाव सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दी सलाह, वह क्या है पढ़ें

Election Reform: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा, वह कुछ ऐसे सक्षमकारी प्रावधान लेकर आए, जिनके तहत चुनावों में निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों को विजेता घोषित होने से पहले न्यूनतम प्रतिशत में वोट प्राप्त करना अनिवार्य किया जाए।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) की वैधता को चुनौती दी गई

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) की वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह धारा उन प्रक्रियाओं से संबंधित है जो मुकाबले वाले और बिना मुकाबले वाले चुनावों में अपनाई जाती हैं। धारा 53(2) के अनुसार यदि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या भरे जाने वाली सीटों के बराबर हो, तो रिटर्निंग अधिकारी सभी उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर देगा। पीठ ने चुनाव आयोग के जवाब का अवलोकन करते हुए कहा कि संसदीय चुनावों में केवल नौ बार ऐसा हुआ है जब उम्मीदवार निर्विरोध विजयी घोषित किए गए।

विदि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से दिया तर्क

याचिकाकर्ता थिंक टैंक विदि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि विधानसभा चुनावों में ऐसी घटनाएँ अधिक सामान्य हैं। वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में केवल एक बार संसदीय चुनाव में कोई उम्मीदवार निर्विरोध विजयी घोषित हुआ है। दातार ने कई काल्पनिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा और पूछा कि यदि कोई उम्मीदवार अपने विरोधियों पर दबाव बनाकर नामांकन वापस करवा देता है तो क्या होगा? जस्टिस सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से कहा कि अगर इस मुद्दे को संबोधित किया जाए तो यह एक बहुत अच्छा सुधार होगा। “यह कोई ऐसा कदम नहीं है जो किसी के लिए असुविधा का कारण बने…यह केवल एक ऐसा तंत्र तैयार करने का प्रश्न है, जिसका कभी इस्तेमाल हो भी सकता है और नहीं भी। राजनीति के बदलते आयामों को देखते हुए यह पूरी संभावना है कि कोई धनवान उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने वालों पर दबाव डालकर या उन्हें प्रभावित करके अंतिम समय पर पीछे हटने को मजबूर कर दे और मैदान में केवल एक उम्मीदवार रह जाए। अब अचानक मतदाताओं के पास एक ही विकल्प बचता है। “मतदाता कभी चुनाव करने का अवसर नहीं पा सकेंगे,” जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा, “क्योंकि मौजूदा व्यवस्था में चुनाव आयोग को ऐसे उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करना ही पड़ेगा।”

भारतीय लोकतंत्र ने अब तक हर चुनौती का समाधान ढूंढा है

द्विवेदी ने तर्क दिया कि यह ऐसे बड़े प्रश्न हैं जिन्हें केवल संसद ही देख सकती है। इस पर पीठ ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र ने अब तक हर चुनौती का समाधान ढूंढा है। “हमें किसी को डिफ़ॉल्ट रूप से संसद में क्यों प्रवेश करने देना चाहिए जो पाँच प्रतिशत वोट भी न जुटा सके? यह केवल एक सक्षमकारी प्रावधान है जिसे आप विचार कर सकते हैं। अगर भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो चुनाव आयोग के पास एक तैयार तंत्र होगा। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि प्रस्तावित “सक्षमकारी” प्रावधान बहुदलीय संस्कृति को बढ़ावा देगा और स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूत करेगा। हालांकि, द्विवेदी ने कहा कि चुनाव आयोग के अनुभव में ‘नोटा’ (NOTA) एक “असफल विचार” रहा है और इसका चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटारमणि ने कहा कि यदि कोई चीज़ वांछनीय हो, तो अदालत उसकी वांछनीयता पर विचार कर सकती है, लेकिन कानून को रद्द नहीं कर सकती। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत किसी भी कानून के प्रावधान को रद्द करने पर विचार नहीं कर रही है, बल्कि केवल चुनाव आयोग से मौजूदा कानून में कुछ जोड़ने पर जोर दे रही है।

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