Thursday, October 29, 2026
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Free Fight: फ्री फाइट में प्रत्येक व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार…वर्ष 1984 के संघर्ष मामले में 4 महिला बरी, 2 पुरुषों की सजा बरकरार

Free Fight: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, फ्री फाइट के मामलों में प्रत्येक व्यक्ति या पक्षकार केवल अपने द्वारा किए गए व्यक्तिगत कृत्य (Own Act) के लिए जिम्मेदार होता है।

वर्ष 1984 के 42 साल पुराने एक जमीन विवाद और मारपीट का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव कुमार की एकल पीठ ने वर्ष 1984 के 42 साल पुराने एक जमीन विवाद और मारपीट के मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 4 महिलाओं को संदेह का लाभ देते हुए बरी (Acquit) कर दिया, जबकि 2 पुरुषों की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा। अदालत ने कहा, जब साक्ष्यों से यह स्पष्ट न हो सके कि किसी झड़प या संघर्ष में पहला हमलावर (Aggressive party) कौन था, तो कानूनन यह माना जाएगा कि वह एक “फ्री फाइट” (Free Fight – खुला संघर्ष) थी।

मामला क्या था?: 1984 का ललितपुर भूमि विवाद और खूनी संघर्ष

घटना की पृष्ठभूमि: 20 सितंबर 1984 को ललितपुर जिले के बसतगुवा गांव में 6.45 एकड़ विवादित जमीन पर लगी मक्के की फसल काटने को लेकर दो पक्षों के बीच लाठी और हंसिया (Sickles) से खूनी संघर्ष हुआ।

दोनो पक्षों का नुकसान: इस मारपीट में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए। आरोपी पक्ष के 2 लोगों (जालिम और भागीरथ) की मौत भी हो गई थी, जिसके चलते मन्नू लाल पक्ष के 15 लोगों के खिलाफ धारा 302 IPC (हत्या) का क्रॉस केस दर्ज हुआ था।

ट्रायल कोर्ट का फैसला (1988): सत्र अदालत ने आरोपी पक्ष के 12 लोगों को धारा 147 (बलवा), 323/149 (मारपीट) और 324/149 IPC के तहत दोषी ठहराया था और ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1968’ की धारा 4 के तहत 1 वर्ष के अच्छे आचरण के बांड पर रिहा कर दिया था।

अपील की स्थिति: 1988 में निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। 42 वर्षों तक लंबित इस अपील के दौरान 12 में से 6 अभियुक्तों की मृत्यु हो गई, जिसके बाद अपील 6 जीवित लोगों (4 महिलाओं और 2 पुरुषों) तक सीमित रह गई थी।

हाई कोर्ट के मुख्य विधिक और तथ्यात्मक निष्कर्ष

‘फ्री फाइट’ का सिद्धांत (Concept of Free Fight)

हाई कोर्ट ने नोट किया कि विवादित जमीन पर दोनों पक्षों के बीच पुराना मुकदमा चल रहा था। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि पहला हमला किस पक्ष ने किया था और मक्के की फसल वास्तव में किसने बोई थी।

अदालत की मुख्य टिप्पणी: जब अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असमर्थ रहता है कि विवादित जमीन या फसल किसकी थी, तो संपत्ति के निजी बचाव का अधिकार (Right of Private Defence) पैदा नहीं होता। साक्ष्यों से जब यह साफ न हो कि कौन सा पक्ष आक्रामक था, तो इसे ‘फ्री फाइट’ माना जाएगा। फ्री फाइट के मामलों में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने विशिष्ट कृत्य के लिए ही उत्तरदायी होता है।

महिला अभियुक्तों की भूमिका और बरी होना

अदालत ने घायल अभियोजक गवाहों (Prosecution Witnesses) के बयानों में विरोधाभास पाया। जिरह (Cross-examination) के दौरान गवाहों ने स्वीकार किया कि 4 महिला आरोपी घटनास्थल पर मौजूद जरूर थीं, लेकिन उन्होंने कोई हथियार नहीं उठाया था और न ही किसी पर हमला किया था।

गैर-कानूनी जमावड़े का समान उद्देश्य (Common Object – Section 149) साबित न होने के कारण अदालत ने 4 महिलाओं (श्रीमती बड़ी बहू उर्फ कंचन देवी, श्रीमती संझली बहू, श्रीमती मंझली बहू पत्नी बैजनाथ और श्रीमती मंझली बहू पत्नी जालिम) को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।

दो पुरुष अभियुक्तों की सजा बरकरार

अदालत ने पाया कि दो पुरुष अपीलार्थियों भजन लाल और रामानंद के खिलाफ चश्मदीद गवाहों के बयानों से प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी साबित होती है। इसलिए उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया और उन्हें 1 महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश होकर 1 साल के अच्छे व्यवहार का बांड (Probation Bond) भरने का निर्देश दिया गया।

केस मैट्रिक्स: Allahabad High Court Judgment (1984 Clash)

प्रक्रियात्मक और विधिक पहलूविवरण / हाई कोर्ट का निर्णय
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजीव कुमार
मूल मामला वर्ष1984 (ट्रायल कोर्ट का फैसला: जून 1988, ललितपुर)
मुख्य कानूनी सिद्धांत‘Free Fight’ में धारा 149 (Common Object) लागू नहीं होती; व्यक्ति केवल अपने कृत्य के लिए दोषी होता है।
महिला अपीलाथी (4)बरी (Acquitted) — हिंसा या हथियार उठाने के साक्ष्य नहीं मिले।
पुरुष अपीलाथी (2 – भजन लाल, रामानंद)दोषसिद्धि बरकरार (Conviction Upheld) — प्रोबेशन बांड भरने के निर्देश।
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