मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह (Justice Vivek Kumar Singh) |
| संबंधित कानून | CrPC की धारा 173(8) / BNSS की धारा 528 |
| मूल सिद्धांत | 1. अंतिम रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद भी नए तथ्यों पर आगे की जांच (Further Investigation) हो सकती है। 2. जांच के दौरान आरोपी के पास सुनवाई का अधिकार नहीं होता। |
| अदालत का फैसला | आरोपी की याचिका खारिज; 20 साल पुराने हत्याकांड में आगे की जांच जारी रहेगी। |
Further Investigation: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) द्वारा क्लोजर/अंतिम रिपोर्ट (Final Report) स्वीकार कर लेने के बाद भी पुलिस या जांच एजेंसी के पास दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच (Further Investigation) करने का कानूनी अधिकार सुरक्षित रहता है।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह (Justice Vivek Kumar Singh) की एकल पीठ ने मैनपुरी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। यह मामला लगभग दो दशक पुराने (2005) एक दोहरे हत्याकांड से जुड़ा हुआ है।
हाई कोर्ट की मुख्य और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद भी जांच संभव:“CrPC की धारा 173(2) के तहत प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट (Final Report) स्वीकार किए जाने के बाद भी धारा 173(8) के तहत आगे की जांच (Further Investigation) आयोजित करने पर कानूनन कोई रोक नहीं है। आगे की जांच शुरू करने से पहले अंतिम रिपोर्ट स्वीकार करने वाले आदेश को वापस लेना या उसकी समीक्षा (Review) करना आवश्यक नहीं है।”
- जांच के स्तर पर आरोपी को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं:
- सुप्रीम कोर्ट के केस लॉ (Union of India v. W.N. Chadha 1992) का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस जांच के दौरान किसी भी आरोपी को पहले से नोटिस पाने या सुनवाई का कोई सामान्य अधिकार नहीं है।
- अदालत ने कहा: “यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि जांच के स्तर पर आरोपी को सुने जाने का कोई अधिकार नहीं है, और न ही वह जांच के तरीके पर सवाल उठा सकता है।”
- पुनः जांच (Re-investigation) बनाम आगे की जांच (Further Investigation):
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला ‘पुनः जांच’ का नहीं बल्कि नए तथ्य/साक्ष्य सामने आने पर ‘आगे की जांच’ (Further Investigation) का है, जिसकी कानून में पूरी अनुमति है।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- घटना (6 अगस्त 2005): मैनपुरी में मुखबिर (Informant) के पिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उसकी मां की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई थी।
- 2006 की क्लोजर रिपोर्ट: जांच के दौरान पीड़िता/मुखबिर और उसकी बहन ने दबाव में धारा 164 CrPC के तहत बयान दिया कि उन्होंने घटना नहीं देखी और आरोपियों को गलत फंसाया गया था। सबूत न मिलने पर पुलिस ने 2006 में अंतिम रिपोर्ट लगाई, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
- 20 साल बाद नए तथ्य: दो दशक बाद पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक के समक्ष गुहार लगाई। उसने आरोप लगाया कि घटना के समय वे नाबालिग थे और आरोपियों ने उन्हें बंधक बनाकर जबरन हलफनामों पर दस्तखत करवाए थे।
- सीजेएम का आदेश: नए तथ्य सामने आने पर मैनपुरी के सीजेएम ने 5 अगस्त 2025 को पुलिस को आगे की जांच करने की अनुमति दी, जिसे आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत का अंतिम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपी की याचिका (BNSS की धारा 528 के तहत) को निष्फल और आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सीजेएम के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी। हालांकि, पीठ ने जांच अधिकारी (IO) से अपेक्षा जताई कि वह आगे की जांच को “निष्पक्ष, न्यायसंगत और पारदर्शी” तरीके से पूरा करे।

