Saturday, August 22, 2026
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President Jurisdiction: राष्ट्रपति को RGNAU कर्मचारी को हटाने का अधिकार…सुप्रीम अदालत में हुई उनके अधिकार की बात, पढ़िए यह केस

President Jurisdiction: केंद्रीय विश्वविद्यालयों में राष्ट्रपति (President of India) की ‘विजिटर’ (Visitor) के रूप में शक्तियों और उनके क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

विवि कर्मचारी पर कार्रवाई करने के अधिकार का मामला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस पुराने फैसले को पूरी तरह से पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि विजिटर और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) के पास विश्वविद्यालय के कर्मचारियों पर कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि भारत के राष्ट्रपति, राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय (RGNAU) के विजिटर होने के नाते, विश्वविद्यालय के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) शुरू करने और उसकी सेवाएं समाप्त (Terminate) करने के लिए पूरी तरह सक्षम (Competent) हैं।

क्या था पूरा मामला? (The Background & Long Litigation)

  • यह मामला RGNAU के “पहले रजिस्ट्रार” जितेन्द्र सिंह की नियुक्ति और उसके बाद शुरू हुए लंबे कानूनी विवाद से जुड़ा है।
  • 2019 में नियुक्ति: जितेन्द्र सिंह को RGNAU अधिनियम के संक्रमणकालीन प्रावधानों (Transitional Provisions) के तहत 2019 में विश्वविद्यालय का पहला रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया था।
  • 2020 में पहली बार बर्खास्तगी: उनकी प्रोबेशन (परिवीक्षा) अवधि के दौरान ही साल 2020 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
  • पुनर्बहाली और तुरंत निलंबन: हाई कोर्ट ने उनकी पहली बर्खास्तगी को “कलंकपूर्ण” (Stigmatic) माना, जिसके बाद दिसंबर 2021 में उन्हें बहाल (Reinstate) तो कर दिया गया, लेकिन उसी दिन एक नई जांच लंबित होने के कारण उन्हें तुरंत निलंबित (Suspend) भी कर दिया गया।
  • राष्ट्रपति द्वारा अंतिम बर्खास्तगी (2022): एक जांच समिति की रिपोर्ट में जितेन्द्र सिंह पर अनुशासनहीनता (Indiscipline) और घोर अवज्ञा (Gross Insubordination) के आरोप सही पाए गए। इसके बाद, अप्रैल 2022 में भारत के राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के विजिटर के रूप में उनकी बर्खास्तगी को मंजूरी दे दी।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला क्यों पलटा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पूर्व में जितेन्द्र सिंह की बर्खास्तगी को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि अनुशासनात्मक शक्ति केवल विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) के पास है, न कि विजिटर या मंत्रालय के अधिकारियों के पास।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस कानूनी व्याख्या से पूरी तरह असहमति जताते हुए कहा:

  • राष्ट्रपति का कदम उचित: वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, विजिटर (राष्ट्रपति) द्वारा शक्ति का प्रयोग पूरी तरह से न्यायसंगत और उचित प्रतीत होता है।
  • हाई कोर्ट की व्याख्या गलत: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के 22 मई 2024 के उस फैसले से सहमत नहीं हो सकता, जिसमें कहा गया था कि पहले रजिस्ट्रार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही में विजिटर की कोई भूमिका नहीं थी।

फैसले का मुख्य सारांश (Key Takeaways at a Glance)

मुख्य कानूनी पहलूसुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का निर्णय
मूल विवादRGNAU के पहले रजिस्ट्रार की अनुशासनहीनता के आधार पर बर्खास्तगी।
विजिटर की शक्तिराष्ट्रपति को केंद्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर के रूप में सर्वोच्च प्रशासनिक और दंडात्मक अधिकार प्राप्त हैं।
हाई कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्टइलाहाबाद हाई कोर्ट का 2024 का आदेश रद्द; राष्ट्रपति द्वारा अप्रैल 2022 में किया गया टर्मिनेशन ऑर्डर बहाल (Upheld)

निष्कर्ष (Analysis Summary)

यह फैसला केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों (Central Educational Institutions) के प्रशासनिक ढांचे के लिए एक बड़ी मिसाल है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही विश्वविद्यालयों के रोजमर्रा के कामकाज के लिए ‘एग्जीक्यूटिव काउंसिल’ जैसी संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन अंतिम और सर्वोच्च प्राधिकारी के रूप में ‘विजिटर’ (राष्ट्रपति) की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब मामला संस्थान के शीर्ष अधिकारियों की घोर अनुशासनहीनता से जुड़ा हो।

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